Thursday, June 24, 2021
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केंद्र सरकार ने की अपनी हद पार , हलफनामा देते हुए सुप्रीम कोर्ट को अपने दायरे में रहने की नसीहत दी

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केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हलफनामे में टीकाकरण नीति का बचाव करते हुए कहा कि इस मामले में न्यायिक हस्तक्षेप ना करें।

दरअसल टीकाकरण नीति और कोरोना से निपटने की तैयारी को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना बचाव किया है। रविवार को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना हलफनामा दायर करते हुए कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की जगह नहीं है। 

केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में लिखा कि वैश्विक महामारी के संदर्भ में न्यायिक हस्तक्षेप की बहुत कम जरूरत है। आगे केंद्र ने लिखा कि 18-44 साल के लोगों को वैक्सीन लगाने की मंजूरी सिर्फ इसलिए दी गई है क्योंकि राज्य उसकी मांग कर रहे थे।

बता दे कि केंद्र सरकार ने अपने व्यापक टीकाकरण अभियान के लिए वैक्सीन के बड़े-बड़े ऑर्डर दिए है। और इसलिए इसका सीधा असर कीमत पर पड़ रहा है। हालांकि केंद्र ने यह भी कहा कि इससे जनता की जेब पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि सभी राज्यों ने मुफ्त में वैक्सीन देने का एलान कर दिया है।

केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि उसे वैक्सीन की कीमत इसलिए कम देनी पड़ रही है क्योंकि केंद्र ने बड़ी संख्या में टीके का ऑर्डर दिया है।

बहुत जरूरी हो तभी आरोपी को गिरफ्तार करे पुलिस- सुप्रीम कोर्ट

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देश में बढ़ते कोरोना संक्रमण के बीच सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को अपराधियों की गिरफ्तारी के महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि अगर बहुत ज्यादा जरूरी न हो तो पुलिस आरोपी को गिरफ्तार न करे।

सुप्रीम कोर्ट ने जेल में कैदियों की संख्या कम करने और संक्रमण रोकने के उद्देश्य से यह जरूरी दिशा निर्देश जरुरी किये हैं। शीर्ष अदालत ने देश के सभी राज्यों की पुलिस से कहा है बहुत ज्यादा जरूरी न हो तो गिरफ्तारी न करें।

चीफ जस्टिस(CJI) एनवी रमना, जस्टिस एल नागेश्वर राव और सूर्यकांत की बेंच ने जेल में कैदियों की संख्या घटाने के लिए ये निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने इसके साथ ही राज्यों से कहा कि ‘हमारे पुराने आदेश के अनुसार जिन्हें पैरोल दी गयी थी उन्हें 90 दिन की फरलो पुनः दे दी जाए इसमे कोई देर न करें।’

EC के वकील मोहित डी राम का इस्तीफा, बोले यहाँ काम करना मेरे मूल्यों के खिलाफ

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सुप्रीम कोर्ट(SC) में निर्वाचन आयोग(ECI) की पैरवी करने वाले अधिवक्ता मोहित डी राम ने आयोग के वकीलों के पैनल से इस्तीफा देते हुए कहां है कि यहां पर काम करना मेरे मूल्यों के खिलाफ है इसलिए मैं अपने पद से त्यागपत्र दे रहा हूं। वह 2013 से सुप्रीम कोर्ट में आयोग के लिए काम कर रहे थे।

मोहित के अनुसार उनके मूल्य चुनाव आयोग के मौजूदा कामकाज के अनुरूप नहीं है इसलिए मैं सुप्रीम कोर्ट के समक्ष इसके पैनल के अधिवक्ता की जिम्मेदारियों से अपने आप को मुक्त करता हूं।

आपको बता दें कि मोहित चुनाव आयोग की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में खड़े होने वाले अधिवक्ता पैनल के सदस्य थे उनका इस्तीफा ऐसे समय आया है जब बीते दिनों ही मद्रासी हाइकोर्ट ने चुनाव आयोग के खिलाफ सख्त टिप्पणी की थी जिसके खिलाफ आयोग सुप्रीम कोर्ट से रहम की गुहार लगाने पहुँचा था।

दरअसल मद्रास हाईकोर्ट ने पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में आयोग की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किए थे और कहा था ECI पर “शायद हत्या का मामला चलाया जाना चाहिए” क्योंकि राजनीतिक दलों ने रैलियों में COVID प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ा दीं थी।

Center has to supply 700 MT oxygen everyday to Delhi: SC

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New Delhi: No relief to the Center even from the Supreme Court. The central government has to supply 700 metric ton of medical oxygen to Delhi everyday till further order, said supreme court on Friday. As the situation deteriorates and the hospitals in the national capital continue to combat rise in Covid-19 cases.

Justice DY Chandrachud commenting on the petition filed by Tushar Mehta said, “We want 700 MT oxygen to be supplied to Delhi on daily basis and we mean business. It has to be supplied and we don’t want to be coercive. Our order will take time to be uploaded by 3 pm. But you proceed and arrange the oxygen.”

Earlier the Delhi High Court on Tuesday issued a show cause notice to the Central Government asking Why it should not entertain contempt proceedings against the government ? When they have failed to comply with the judicial order to supply oxygen for the treatment of covid-19 patients of the national capital.

Against the contempt notice of the Delhi High Court,Tushar Mehta, Solicitor General, Government of India, took up the matter in front of the bench headed by Chief Justice NV Ramana, as Justice DY Chandrachud’s bench was not available on Wednesday.

On which the Chief Justice directed to list the petition of the Center for hearing to the bench headed by Justice DY Chandrachud.

The Supreme Court agreeing with the Delhi High Court order said, “If nothing is to be hidden, let it come before the nation how allocation and distribution is done transparently by the centre. The centre continues to be in contempt for not supplying 700 MT of oxygen to Delhi.”

Justice D Y Chandrachud has also turned down the Central government’s plea to stay the Karnataka high court order directing it to increase the supply of medical oxygen to the state to 1,200 MT per day.

“We don’t want to leave the citizens of Karnataka in the lurch. The order of the High Court is a careful, calibrated and judicial exercise of power. We see no reason to entertain the SLP,” said a bench headed by Justice D Y Chandrachud.

दिल्ली High Court की अवमानना के खिलाफ Supreme Court की शरण मे पहुँची केंद्र सरकार

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देश में बढ़ते Corona virus संक्रमण की वजह से ऑक्सीजन को लेकर संकट (Oxygen Crisis) गहराता जा रहा है. दिल्ली हाईकोर्ट ने इसी विषय में केंद्र सरकार को कोविड मरीजों के इलाज के लिए ऑक्सीजन आपूर्ति पर दिए गए निर्देश का अनुपालन नहीं करने को लेकर अवमानना नोटिस जारी किया था जिसके खिलाफ केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट(Supreme Court) की शरण मे पहुँची है।

केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में लगाई गई याचिका में राष्ट्रीय राजधानी में कोविड-19 मरीजों के इलाज के लिए ऑक्सीजन आपूर्ति का अनुपालन नहीं करने को लेकर जारी अवमानना के नोटिस और केंद्र के अधिकारियों की व्यक्तिगत उपस्थिति के निर्देश को चुनौती दी गई है. जिसपर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) सहमत हो गया है।

आपको बता दें कि दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने मंगलवार को केंद्र सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा था कि कोविड-19 मरीजों के उपचार के लिए ऑक्सीजन की आपूर्ति के बारे में उसके आदेश का अनुपालन करने में विफल रहने पर उसके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों नहीं की जाए?

दिल्ली हाईकोर्ट के अवमानना नोटिस के खिलाफ भारत सरकार के सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने इस मामले को प्रधान न्यायाधीश एनवी रमणा की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष उठाया, क्योंकि देश में कोविड-19 प्रबंधन पर स्वतं: संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ की पीठ बुधवार को उपलब्ध नहीं थी।

जिसपर प्रधान न्यायाधीश ने केंद्र की याचिका को न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया. तुषार मेहता इस मामले पर बुधवार को ही सुनवाई चाहते थे, लेकिन पीठ ने इसे न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की सहूलियत पर छोड़ दिया।

कोरोना पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र सरकार से सवाल- आपका नेशनल प्लान क्या है?

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बढ़ते कोरोना संक्रमण में लगातार फैल रही अव्यवस्थाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मौजूदा स्थिति पर कंट्रोल पाने के लिए नेशनल प्लान मांगा है। आज हुई सुनवाई में कोर्ट ने सरकार से वैक्सीनेशन पर भी जवाब तलब किया है।

देशभर में हो रही ऑक्सीजन की किल्लत और दूसरी अन्य परेशानियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई हुई। कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि संकट से निपटने के लिए आपका नेशनल प्लान क्या है? क्या वैक्सीनेशन ही मुख्य विकल्प है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा, ‘हमें लोगों की जिंदगियां बचाने की जरूरत है। जब भी हमें जरूरत महसूस होगी, हम दखल देंगे। राष्ट्रीय आपदा के समय हम मूकदर्शक नहीं बने रह सकते हैं। हम हाईकोर्ट्स की मदद की जिम्मेदारी निभाना चाहते हैं। इस मामले में उन अदालतों (HCs) को भी अहम रोल निभाना है।’

इस मामले की अगली सुनवाई 30 अप्रैल को होगी जिसमें केंद्र जवाब पेश करेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने दिए केंद्र को निर्देश


1. SC ने केंद्र से पूछा- ऑक्सीजन की सप्लाई को लेकर केंद्र को मौजूदा स्थिति स्पष्ट करनी होगी। कितनी ऑक्सीजन है? राज्यों की जरूरत कितनी है? केंद्र से राज्यों को ऑक्सीजन के अलॉटमेंट का आधार क्या है? राज्यों को कितनी जरूरत है, ये तेजी से जानने के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई गई है?

2. गंभीर होती स्वास्थ्य जरूरतों को बढ़ाया जाए। कोविड बेड्स भी बढ़ाए जाएं।

3. वो कदम बताइए जो रेमडेसिविर और फेवीप्रिविर जैसी जरूरी दवाओं की कमी को पूरा करने के लिए उठाए गए।

4. अभी कोवीशील्ड और कोवैक्सिन जैसी दो वैक्सीन उपलब्ध हैं। सभी को वैक्सीन लगाने के लिए कितनी वैक्सीन की जरूरत होगी? इन वैक्सीन के अलग-अलग दाम तय करने के पीछे क्या तर्क और आधार हैं?

5. 28 अप्रैल तक जवाब दें कि 18+ आबादी के वैक्सीनेशन के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े क्या मामले हैं।

हालांकि केंद्र सरकार के बचाव में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि प्रधानमंत्री खुद समस्याओं पर ध्यान दे रहे हैं वो लोगों की परेशानियां दूर करने और हालात को सावधानी से संभालने में सिद्धहस्त हैं।

सुप्रीम कोर्ट के जज की कोरोना से मौत, प्रमोशन में आरक्षण मामले पर दिया था जजमेंट

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सुप्रीम कोर्ट(Supreem Court) के जज जस्टिस मोहन एम शांतनागोदर की कोरोनावायरस संक्रमण के कारण गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में मौत हो गई। केरल हाईकोर्ट(kerala Highcourt) के चीफ जस्टिस रह चुके जस्टिस मोहन एम शांतनागोदर 17 फरवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के तौर पर पदोन्नत हुए थे।

जस्टिस शांतनागोदर 62 वर्ष के थे और कोरोना संक्रमण से प्रभावित थे। उन्होंने गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में आखिरी सांस ली है जिसकी पुष्टि सुप्रीम कोर्ट के एक अधिकारी ने की है।

जस्टिस मोहन एम शांतनागोदर का जन्म 5 मई 1958 को कर्नाटक में हुआ था। 5 सितंबर 1980 से उन्होंने वकालत की शुरूआत की थी और 17 फरवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के तौर पर पदोन्नत हुए थे। इससे पहले वह केरल हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस भी रहे।

सरकारी अधिकारियों के बहुप्रतीक्षित मसले प्रमोशन में आरक्षण की सुनवाई जस्टिस शांतनागोदर ने ही कि थी इसके पहले कर्नाटक हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस रहते हुए उन्होंने कहा था प्रमोशन में आरक्षण तभी दिया जाए जब कर्मचारी उस पद लायक हो। इसका परीक्षण होना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस समय को कहा ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ , केंद्र सरकार से मांगा है जवाब

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कोरोना संकट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, देश में इमरजेंसी जैसे हालात

देश में फैले कोरोना संक्रमण(Corona) पर सुप्रीम कोर्ट(Supreem Court) ने सख्त टिप्पणी की है SC ने कहा कि देश मे इमरजेंसी जैसे हालात हो गए हैं।

देश के बिगड़ते हालात पर सर्वोच्च न्यायालय ने स्व संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार को नोटिस भी जारी किया है। कोर्ट ने मोदी सरकार से पूछा है कि ऑक्सीजन सप्लाई को लेकर केंद्र के पास क्या प्लान है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को ऐसे समय में नोटिस जारी किया है जब दिल्ली हाईकोर्ट,मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने बेड़ों की कमी,ऑक्सीजन की कमी को लेकर राज्य और केंद्र सरकारों को बुरी तरह लताड़ लगा चुके हैं।

भारत के मुख्य न्यायाधीश(CJI) एस ए बोबड़े की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायधीशों की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को कोविड-19 पर राष्ट्रीय स्तर की योजना बनाकर पेश करने के लिए कहा है।

कोर्ट ने केंद्र के वकील को दिए दिशानिर्देशों में कहा है कि आप केंद्र की तरफ से ऑक्सीजन की आपूर्ति, आवश्यक दवाओं की आपूर्ति, वैक्सीनशन का तरीका और राज्यों में लॉकडाउन के फैसले पर अपना जवाब पेश करे। सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले की अगली सुनवाई 23 अप्रैल को करेगी।

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना से मचे हाहाकार पर ऐसे समय टिप्पणी की है जब कल ही दिल्ली हाईकोर्ट ने ऑक्सीजन की कमी को लेकर केंद्र सरकार को बुरी तरह लताड़ा था। कल देर शाम एक याचिका पर सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि केंद्र चाहे भीख मांगे, उधार ले या चोरी करे, बस ऑक्सीजन लाकर दे। न्यायालय ने केंद्र को फटकार लगाते हुए कहा कि हम ऑक्सिजन की कमी से इस तरह लोगों को मरता नहीं देख सकते।

कोर्ट की अवमानना के मामले में प्रशांत भूषण दोषी करार, 20 को सजा पर फैसला करेगा सुप्रीम कोर्ट

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Prashant Bhushan
Prashant Bhushan

अदालत की अवमानना मामले में आज सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर वकील प्रशांत भूषण को दोषी करार दिया है। न्यायपालिका के प्रति अपमानजनक ट्वीट करने को लेकर वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के खिलाफ स्वत: शुरू की गई अवमानना कार्यवाही में आज कोर्ट ने यह फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने इस मामले में अधिवक्ता प्रशांत भूषण को दोषी करार देते हुए 20 अगस्त को सज़ा पर सुनवाई करने की बात कही।

इससे पहले न्यायालय में 5 अगस्त को हुई सुनवाई में अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अपने उन दो ट्वीट का बचाव किया था। कोर्ट ने आज हुई सुनवाई में यह माना है कि इससे अदालत की अवमानना हुई है।

गौरतलब है कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) एसए बोबड़े और चार पूर्व सीजेआई को लेकर प्रशांत भूषण की ओर से किए गए दो अलग-अलग ट्वीट्स पर स्वत: संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू की थी। सुप्रीम कोर्ट ने प्रशांत भूषण को नोटिस भेजा था।

नोटिस के जवाब में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कहा था, ‘सीजेआई की आलोचना सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को कम नहीं करता। बाइक पर सवार सीजेआई के बारे में ट्वीट कोर्ट में सामान्य सुनवाई न होने को लेकर उनकी पीड़ा को दर्शाता है। इसके अलावा चार पूर्व सीजेआई को लेकर ट्वीट के पीछे मेरी सोच है, जो भले ही अप्रिय लगे, लेकिन अवमानना नहीं है।’

कोर्ट की अवमानना अधिनियम की धारा 12 के तहत तय किए गए सजा के प्रावधान के मुताबिक, दोषी को छह महीने की कैद या दो हजार रुपए तक नकद जुर्माना या फिर दोनों हो सकती है। अब सजा पर बहस 20 अगस्त को होगी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट सजा सुनाएगी।

कोरोना वायरस के चलते विश्वविद्यालय परीक्षाओं पर रोक लगाने पर सुप्रिम कोर्ट ने सुनाया फैसला

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image of supreme court of india building india
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विश्वविद्यालयों द्वारा कोरोना वायरस के चलते परीक्षाओं पर रोक लगाने का अंतरिम आदेश देने से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया है। कोर्ट में दायर एक याचिका में यूजीसी के उस गाइडलाइन को चुनौती दी गई है, जिसमें विश्वविद्यालयों से 30 सितंबर तक अंतिम वर्ष के परीक्षा का आयोजन कर लेने को कहा गया है।
कोर्ट ने मामले पर सुनवाई 10 अगस्त तक के लिए टालते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय से मसले पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा। साथ ही, महाराष्ट्र में राज्य डिज़ाइनर मैनेजमेंट कमेटी की तरफ से जारी किए गए आदेश की कॉपी भी रिकॉर्ड पर रखे जाने के लिए कहा।


दरअसल कई छात्र, अध्यापक, सामाजिक और राजनैतिक संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि देश में कोरोना के मद्देनजर यूजीसी के निर्देश गलत हैं। अभी परीक्षा कराने से छात्रों के स्वास्थ्य को गंभीर खतरा हो सकता है। जिस तरह से सीबीएसई की परीक्षा में एवरेज मार्किंग के जरिए रिजल्ट घोषित करने का आदेश दिया गया था, वैसा ही इस मामले में हो।

पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर यूजीसी से जवाब देने को कहा था। यूजीसी ने कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा है कि अंतिम वर्ष की परीक्षा के आयोजन का फैसला छात्रों के हित में ही लिया गया है। छात्रों को ऑनलाइन और ऑफलाइन परीक्षा का विकल्प दिया जा रहा है। उनके स्वास्थ्य को बिना किसी खतरे में डाले परीक्षा ली जाएगी।

सुनवाई के दौरान सिंघवी ने यह दलील भी दी कि कई विश्वविद्यालय ऑनलाइन परीक्षा कराने में सक्षम नहीं है। उनके पास इतनी सुविधा नहीं है। इस पर कोर्ट ने कहा कि छात्रों को ऑफलाइन परीक्षा का भी विकल्प दिया जाएगा। सिंघवी का जवाब था, “स्थानीय हालात और बीमारी के चलते कई लोग ऑफलाइन परीक्षा भी नहीं दे पाएंगे। यूजीसी का हलफनामा कहता है कि उन्हें बाद में परीक्षा देने का मौका मिलेगा। लेकिन इन सभी बातों से सिर्फ भ्रम बढ़ेगा। बेहतर हो कि परीक्षा को रदद् ही कर दिया जाए।”