fbpx
Wednesday, December 2, 2020
Home Tags Ravish Kumar

Tag: Ravish Kumar

सबकुछ काफी ठीक है बस अर्थव्यवस्था में नौकरी, सैलरी और सरकार के पास पैसे नहीं है।

0

जून में निर्यात का आंकड़ा 41 महीनों में सबसे कम रहा है। आयात भी 9 प्रतिशत कम हो गया है। जो कि 34 महीने में सबसे कम है। सरकार मानती है कि दुनिया भर में व्यापारिक टकरावों के कारण ऐसा हुआ है।

सरकार ने 2018-19 और 2019-20 के दौरान पेट्रोलियम उत्पादों पर सरचार्ज लगाकर 17000 करोड़ वसूले हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड लिखता है कि सरकार इस पैसे का दूसरे मद में इस्तमाल करेगी। जिन चीज़ों के लिए सरजार्च लिया गया था उसमें नहीं। कायदे से यह पैसा राषट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को जाना चाहिए था, खासकर एक ऐसे समय में जब हाईवे के लिए पैसे की तंगी हो रही है। अपना पैसा कहीं और खपा कर परिवहन मंत्रालय निजी आपरेटरों की तलाश में लगा है।

सरकार संप्रभु बॉन्ड के ज़रिए विदेशों से कर्ज़ उठाने की तैयारी में है। बजट में घोषणा हुई है। बिजनेस स्टैंडर्ड की ख़बर है कि सरकार धीरे धीरे कर्ज़ लेने की दिशा में कदम उठाएगी। हांगकांग, न्यूयार्क, सिंगापुर और लंदन में ये बान्ड लांच होंगे। 20 साल के लिए यह बान्ड जारी होगा। शुरूआती चरण में सरकार 3-4 अरब डॉलर का कर्ज़ उठाने की कोशिश करेगी। भारत जीडीपी का मात्र 5 प्रतिशत संप्रभु बान्ड के ज़रिए विदेशों से कर्ज़ लेता है। जो कि कम है। भारत सरकार अपने बजट को पूरा करने के लिए सात लाख करोड़ का कर्ज़ लेगी। इसे लेकर बिजनेस अख़बारों में बहस चल रही है कि ठीक है या नहीं। उम्मीद है हिन्दी के कूड़ा और चमचा अख़बार और चैनल आप दर्शक और पाठकों को इस महत्वपूर्ण विषय के बारे में जानकारी दे रहे होंगे।

आटोमोबिल सेक्टर में उत्पादन ठप्प होने और बिक्री काफी घट जाने के कारण कितनों की नौकरियां गईं हैं, इसकी ठोस जानकारी नहीं है। कभी किसी अखबार में 25,000 छपता है तो कभी 30,000। इस तिमाही में बिक्री की हालत पिछले दस साल में सबसे बदतर है। पंतनगर में अशोक लेलैंड ने अपनी फैक्ट्री 9 दिनों के ए बंद कर दी है क्योंकि मांग ही नहीं है। पिछले महीने भी एक हफ्ते के लिए प्लांट बंद था। इसका असर स्टील निर्माताओं पर भी पड़ रहा है। मांग कम होने के कारण हालत खराब है। टाटा स्टील के टी वी नरेंद्ररन ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा है कि ओला और ऊबर के कारण युवा पीढ़ी कम कारें खरीदेगी। इसके कारण भी मांग घट रही है।

IHS Markit India ने एक बिजनेस सर्वे कराया है। इस सर्वे मे यह निकल कर आया है कि बिजनेस सेंटीमेंट तीन साल में सबसे कम है। प्राइवेट कंपनियों ने अपना आउट पुट ग्रोथ अब 18 प्रतिशत की जगह 15 प्रतिशत ही देख रही हैं। डॉलर के सामने रुपया कमज़ोर हो रहा है इसलिए आयात महंगा होता जा रहा है। मांग कम होने के कारण सरकार की नीतियां भी ज़िम्मेदार हैं।

कर्ज़ न मिलने के कारण रियल स्टेट सेक्टर की भी हालत ख़राब है। 20 प्रतिशत ब्याज़ पर लोन लेने पड़ रहे हैं।

कारपोरट की कमाई घट गई है। भारत की चोटी की कंपनियों ने बताया है कि कर्ज़ का अनुपात बढ़ता ही जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की भी हालत खराब है। जिस अनुपात में कर्ज़ बढ़ रहे हैं उस अनुपात में शेयरधारकों की कमाई नहीं हो रही है। जिसके कारण उनका बैलेंसशीट कमज़ोर हो गया है।

महेश व्यास ने लिखा है कि 2017-18 मे कंपनियों में रोज़गार वृद्धि दर 2.2 प्रतिशत ही रही। 2016-17 में 2.6 प्रतिशत थी। जबकि यह बेहतर आंकड़ा है पिछले वर्षों की तुलना में। रोज़गार घटा है। लेकिन मज़दूरी थोड़ी बढ़ी है। महेश लिखते हैं कि मात्र 46 प्रतिशत कंपनियों ने ही रोज़गार वृद्धि दर्ज की है। 41 प्रतिशत कंपनियों में रोज़गार घटे हैं। 13 प्रतिशत कंपनियों में रोज़गार में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

महेश व्यास लिखते हैं कि नौकरी मिलने और सैलरी बढ़ने का स्वर्ण युग 2003-04 से 2008-09 ही था। 2013-14 तक कोरपोरेट सेक्टर में रोज़गार बढ़ता रहा। जब भी जीडीपी 7 प्रतिशत थी। मज़दूरी 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी और रोज़गार 3.5 प्रतिशत की दर से। यानि 7 प्रतिशत जीडीपी का असर दिखता था। इसकी तुलना मौजूदा सरकार की 7 प्रतिशत जीडीपी दौर में ऐसा नहीं लगता है। रोज़गार घट रहा है और मज़दूरी काफी कम बढ़ रही है। महेश व्यास ने बिजनेस स्टैंडर्ड में लिखा है।

इसके अलावा भारत में सब ठीक है।

जियो का भी गांवों में ग्रोथ सबसे अधिक है। वोटाफोन और एयरटेल ने लाखों उपभोक्ता बढ़ा दिए हैं।

ठीक होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है।

2019 का चुनाव दुनिया का लैंडमार्क चुनाव था। 45साल में सबसे अधिक बेरोज़गारी का मुद्दा पिट गया। बेरोज़गारों ने बेरोज़गारी के सवाल को ही ख़ारिज कर दिया। उन्हें बेरोज़गार रहना पसंद था मगर मोदी का हारना नहीं। बीजेपी को शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि युवा उनसे नौकरी नहीं मांगते हैं। ऐसी किस्मत दुनिया में किसी भी पार्टी को नसीब नहीं हुई है। सारे गठबंधन हवा में उड़ गए। बेरोज़गारी मज़ाक का मुद्दा है। ऐसा सिर्फ नरेद्र मोदी की प्रचंड लोकप्रियता और उनके नेतृत्व में गहरी आस्था के कारण हो सका।

Source

चौकीदारों से मोदी संवाद के कवरेज़ को लेकर चैनलों की चतुराई भी देखे चुनाव आयोग: रविश कुमार

0

प्रधानमंत्री मोदी ने रेडियो के ज़रिए चौकीदारों से बात की। कार्यक्रम रेडियो का था मगर उसे टीवी के लिए भी बनाया गया। इसे सभी न्यूज़ चैनलों पर लगातार दिखाया गया। सभी चैनलों पर एक ही कवरेज़ रहा और एक ही एंगल से सारे वीडियो दिखे। किसी चैनल ने अपने दर्शकों को नहीं बताया कि स्क्रीन पर जो वीडियो आ रहा है, वो किसका है। बीजेपी की तरफ से प्रसारित हो रहा है या न्यूज़ एजेंसी ए एन आई की तरफ से। क्या ए एन आई विपक्ष के कार्यक्रम को भी इसी तरह से कवर करता है और चैनल दिखाते हैं?

यही नहीं जो चौकीदार खड़े दिख रहे हैं वो किसकी कंपनी के हैं। उन कंपनियों का क्या बीजेपी से क्या नाता है। एक कंपनी है एस आई एस जिसके संस्थापक आर के सिन्हा हैं, जो भाजपा के राज्य सभा सांसद हैं। क्या चैनलों ने बताया कि विजुअल में जो गार्ड दिख रहे हैं को वो एस आई एस के हैं और इनके संस्थापक बीजेपी के सांसद हैं? चैनलों ने आपको नहीं बताया। क्या चुनाव आयोग को इसकी जांच नहीं करनी चाहिए कि प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के लिए कहीं एस आई एस के गार्ड को आदेश तो जारी नहीं किया गया। बाकी गार्ड किस कंपनी के थे और क्या उनका संबंध बीजेपी नेताओं से था, दर्शक नहीं जान सका।

एंकर बार बार कहते रहे कि प्रधानमंत्री ने 25 लाख चौकीदारों से संवाद किया। मगर किसी ने नहीं बताया कि वे यह बात किस आधार पर कह रहे हैं। प्रधानमंत्री के संबोधन के दौरान चैनलों के स्क्रीन पर गार्ड दिखाए गए, उनकी कुल संख्या 500 भी नहीं होगी। हर जगह पचीस तीस गार्ड बैठे हुए नज़र आए। तो मीडिया को कहना चाहिए कि यह बीजेपी का दावा है कि 25 लाख चौकीदारों को संबोधित किया गया। हमने अपनी तरफ से संख्या की पुष्टि नहीं की है।

पहला सवाल यही था कि ” सर मेरा एक सवाल था आपसे, हम गांव के गरीब परिवार से आते हैं, इज्जत ही हमारी पूंजी है। कई महीनों की मेहनत से सम्मान और भरोसा जीतते हैं। राजनीति के चलते हुए हमें चोर कहा गया है। हम जहां काम करते हैं, वहां हमें शक की नज़र से देखा रहा है। देश के सारे जवान भी चौकीदार हैं, क्या वे भी चोर हैं। मन बहुत दुखी हो रहा है, इसलिए आपसे ये सवाल की हूं।”

यूपी के फर्रूख़ाबाद की रेणु पीटर ने यह सवाल किया था। सवाल की बनावट से ज़ाहिर होता है कि पूछने वाले को लिख कर दिया गया था। जिसे हम पत्रकारों की भाषा में प्लांट कहते हैं। पिछले दो दिनों से सिक्योरिटी गार्ड अपने कम वेतन, निम्न जीवन स्तर की बात कर रहे है। सरकारी चौकीदार समय से वेतन न मिलने की शिकायत कर रहे हैं। किसी ने अपने मुद्दे की बात नहीं रखी। क्या वाकई ऐसा हो सकता है।

( डिस्क्लेमर: यह लेख पत्रकार रविश कुमार के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है. लेख में दिए विचार लेखक के नीजी विचार है )

अमरीका में 90 दिनों में मिल जाती है सरकारी नौकरी, क्या भारत के नौजवानों को नहीं चाहिए नौकरी : रविश कुमार

0

व्हाट्स एप पर एक मित्र कुलदीप से बात हो रही थी । उन्होंने अमरीका के पत्रकार स्टीवन ब्रिल की किताब टेलिस्पिन का हवाला देते हुए बताया कि अमरीका में सरकारी नौकरी की प्रक्रिया काफी जटिल और थका देने वाली है। मुझे लगा कि वहां भी तीन चार साल में भर्ती पूरी होती है। मगर ब्रिल ने कोफ्त जताते हुए लिखा है कि औसतन एक सरकारी नौकरी की प्रक्रिया पूरी होने में 90 दिन लग जाते हैं. जबकि प्राइवेट कंपनियों में 23 दिन। स्टीवन ब्रिल 90 दिन को ही थका देने वाला और जटिल मान रहे थे। सोचिए भारत में हम लोग क्या करें। जहां कोई इम्तहान ही समय पर नहीं होता है।

भारत के नौजवान भी यह जान कर स्तब्ध रह जाएंगे। उन्हें पता है कि कुछ नहीं होने वाला है क्योंकि उनका अनुभव बार बार उन्हें साबित कर देता है। ऐसी बात नहीं है कि नौजवानों ने नेताओं पर दबाव नहीं डाले या धरना प्रदर्शन नहीं किए, नेताओं ने भी वादे किए मगर सत्ता में आने या चले जाने के बाद भी चयन आयोगों की हेंकड़ी और नकारेपन में कोई कमी नहीं आई। ऐसा अपने आप से नहीं होता है बल्कि अब लगने लगा है कि सरकारों ने नौकरी समय पर न देने बल्कि नहीं देने की अच्छी तरकीब निकाल ली।

एक दिन कुछ नौजवान मिलने आए। पूरी फाइल तैयार कर लाए थे और कहा कि बिहार में 17 साल में बिहार लोक सेवा आयोग 7 परीक्षाएं भी नहीं करा सका है। इन परीक्षाओं के चक्कर में फंसे युवाओं की जवानी बर्बाद हो चुकी है। झारखंड का भी यही हाल है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और मध्य प्रदेश का भी वही हाल है। इन आयोगों के हवाले से अगर आप हिन्दुस्तान के युवाओं को समझेंगे तो बहुत आसानी से देख पाएंगे कि सरकार चाहे तो नौजवानों को जैसे मर्ज़ी उल्लू बना सकती है और नौजवान बनकर दिखा भी देते हैं। उनमें से आधे से ज्यादा सरकार को सरकार की तरह नहीं बल्कि अपने धर्म, अपनी जाति के नेताओं की सरकार के रूप में देखते हैं। इसीलिए उनका आंदोलन होता है तो उसी में से कुछ लोग उसकी धार कम करने में लगे रहते हैं। सबकी लड़ाई अकेले की हो गई है। सब मिलकर कर लड़ते तो शायद एक ईमानदार व्यवस्था भी हासिल कर लेते।

आज किसी ने लिखा है कि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की सीबीआई जांच 6 महीने से चल रही है मगर अभी तक कोई नतीजा नहीं आया है। लोक सेवा आयोग का वार्षिक परीक्षा कैलेंडर भी ध्वस्त हो गया है। इस साल की अपर सर्बोडिनेट परीक्षा का प्रीलिम्स 19 अगस्त 208 को होनी थी। लेकिन उसकी तारीख़ बढ़ते-बढ़ते 28 अक्तूबर 2018 पहुंच गई है। यही नहीं अपर सर्बोडिनेट परीक्षा 2016 के नतीजे भी अभी तक नहीं आए हैं।

जम्मू कश्मीर लोक सेवा आयोग के छात्र मुझे लिख रहे हैं कि आयोग ने परीक्षा की प्रणाली में बदलाव तो कर दिया लेकिन नए पैटर्न के हिसाब से तैयारी करने का सबको मौका नहीं दिया। जम्मू कश्मीर कंबाइंड कॉम्पिटिव परीक्षा 2018 का प्रीलिम्स 2 सितंबर को होने जा रहा है। जबकि 2017 की मेन्स की परीक्षा 12 अगस्त को ख़त्म हुई है। 2017 की परीक्षा में शामिल होने वाले दस हज़ार छात्रों को नए पैटर्न के साथ तैयारी के लिए वक्त नहीं दिया जा रहा है। उनके पास मात्र 24 दिन है। करीब 10,000 छात्र इस फैसले से प्रभावित हैं।

किसी ने पटना से सिटी भास्कर की क्लिपिंग भेजी है। उस ख़बर में लिखा है कि बिहार स्पेशल टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (BSTET) पास होने के बाद भी 53, 500 अभ्यर्थी स्कूलों में नियुक्ति का इंतज़ार कर रहे हैं। 2019 तक इनकी नियुक्ति नहीं हुई तो इनकी वैधता समाप्त हो जाएगी। इन्हें फिर से BSTET की परीक्षा देनी होगी। जुलाई 2011 में BSTET की परीक्षा निकली थी। 12 लाख अभ्यर्थियों ने 60 रुपये देकर फार्म भरे थे। नवंबर 2011 में परीक्षा हुई। जून 2012 में रिजल्ट निकला। एक साल निकल ही गया। 68,500 अभ्यर्थी परीक्षा में पास हुए। परीक्षा पास कर छह महीने तक नियुक्ति की कोई प्रक्रिया शुरू नहीं हुई।

BSTET के बाद 2012 में 17,500 पदों पर हाई स्कूल में और 17,587 प्लस टू स्कूलों में शिक्षकों की बहाली होनी थी लेकिन कई चरणों के बाद भी यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। अंतिम भर्ती मई 2016 में हुई थी। अगर चयन की प्रक्रिया शुरू नहीं हुई तो मार्च 2019 में उनके पास होने की वैधता समाप्त हो जाएगी। बिहार में हाई स्कूल और प्लस टू स्कूलों में 19000 शिक्षकों की कमी है।

मैं नहीं कहता कि 50,000 से अधिक शिक्षकों को मीडिया की ज़रूरत नहीं है, बिल्कुल है और भास्कर ने इसे छापा भी। फिर भी इतनी बड़ी संख्या की कोई हैसियत नहीं है। इसी संख्या के बराबर रैली करने के लिए नेता लोग नोट बांट कर भीड़ जुटा लेते हैं जिस पर मीडिया ही हफ्तों चर्चा करता है। कई बार लोग पूछते हैं कि क्या करें, तो मेरे पास भी वाकई कोई जवाब नहीं होता है।

यूपी पुलिस का अलग से भर्ती बोर्ड है। इसकी तीन भर्तियां निकली थीं। दो भर्तियां 2016 की और एक सितंबर 2017 की। सितंबर 2017 की परीक्षा हुई मगर जनवरी में इस परीक्षा को रद्द घोषित कर दिया गया। जनवरी से अगस्त बीत गया मगर दोबारा परीक्षा कब होगी, पता नहीं है। यूपी पुलिस में कंप्यूटर आपरेटर का इम्तहान देने वाले नौजवान साधारण तबके से आते हैं। जैसे तैसे जतन कर परीक्षा देने गए थे। अब रद्द हो गई है और उम्र बीती जा रही है। इसमें भी हज़ारों छात्र शामिल हुए थे।

मध्य प्रदेश के अखबारों में भी चयन आयोगों के घोटाले की खबरें छप रही हैं। राज्य लोक सेवा परीक्षा 2012 के पर्चे लीक होने का मामला 2018 में भी जांच में उलझा हुआ है। इसकी जांच के लिए स्पेशल टास्क फोर्स बनाया गया था जिसने कोर्ट से कहा है कि पर्चे लीक हुए थे। 23 उम्मीदवारों को इससे लाभ मिला था। नई दुनिया इंदौर ने लिखा है कि सीबीआई ने 2014 में पीएससी के आर्युवेद चिकित्सा अधिकारी की परीक्षा के पर्चे लीख करने का मामला पकड़ा था। इसी गिरोह ने बताया है कि उसने 2012 के प्री और मेन्स के पर्चे लीक किए थे।

अभी मध्य प्रदेश से छात्र लिख रहे हैं कि मध्य प्रदेश वन सेवा की अंतिम उत्तर कुंजी फिर से ग़लत है। जबकि सतना से किसी ने लिखा है कि हम लोगों ने 100 रुपये प्रति प्रश्न फीस देकर आपत्ति दर्द कराई थी। कई छात्रों ने 800 रुपये जमा कराए हैं, प्रमाण दिया है कि कैसे आयोग के उत्तर ग़लत हैं मगर कोई सुनवाई नहीं। आयोग ने अपने उत्तर को सही बता दिया है।

एक दिन यूं ही मेसेज आने लगे कि हम सभी भारत सरकार के टकसाल, हैदराबाद के लिए चुने जा चुके हैं। हमने जून 2017 को जूनियर टेक्निशियन पद की परीक्षा दी थी। 14 अगस्त 2017 को रिज़ल्ट आया। उसके बाद वेरिफिकेशन के लिए दस्तावेज़ मांगे गए। हम इन सारे प्रमाण पत्रों के साथ 9 अक्तूबर 2017 को हैदराबाद बुलाए गए। वहां आश्वासन मिला कि एक माह में नियुक्ति पत्र मिल जाएगा। अक्तूबर से अगस्त बीत गया मगर नियुक्ति पत्र नहीं आया है। झांसी, पटना से छात्रों ने हमें लिखा है।

काश मेरे पास पर्याप्त संसाधन होता। आज ही मुझे दस अलग-अलग मुद्दों को लेकर फोन आए। सबके सब अर्जेंट। परेशान हैं। फोन लगातार बजता रहता है। धीरे धीरे उठाना कम कर दिया हैं। कितनी बार लिखूंगा और बोलूंगा कि मैं सारी समस्याओं के साथ इंसाफ नहीं कर सकता। मेरे पास कोई सचिवालय नहीं है। पर इसका एक ही मतलब है कि नौजवान बहुत परेशान है। उसे हिन्दू मुस्लिम की गोली देकर उलझा दिया गया है। उसे भी इसमें नशा आता है। वर्ना जिस स्तर पर नौजवानों को धक्का दिया जा रहा है, उनकी आंधी में कोई भी तिनके की तरह उड़ जाए।

नोट- आई टी सेल इन समस्याओं को उठाए। ज़ोर शोर से मंत्रियों से पूछे कि यूपी के TET अभ्यर्थियों को नौकरी कब मिलेगी? उनकी संख्या एक लाख है। पौने दो लाख शिक्षा मित्र हैं। क्या उन्हें इनका वोट नहीं चाहिए? इन लोगों ने सरकारों का क्या बिगाड़ा है कि उन्हें नौकरी न देने की सज़ा दी जा रही है।

सरकार की वित्तीय स्थिति खराब, बाज़ार से लेगी 50000 करोड़ का कर्ज़ : रविश कुमार

0

आर्थिक ख़बरें- बचत घटेगी, घाटा बढ़ेगा

सरकार अपना वित्तीय घाटा पूरा करने के लिए बाज़ार से 50000 करोड़ का कर्ज़ लेगी। बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार इससे पता चलता है कि सरकार की वित्तीय स्थिति बहुत बेहतर नहीं है।

इस ख़बर को अंग्रेज़ी के सामान्य और बिजनेस अख़बारों ने प्रमुखता से पहले पन्ने पर छापा था। मैंने एक बड़े हिन्दी अख़बार में देखा कि कोने में मात्र चार लाइन की ख़बर है। इसीलिए कहता हूं कि हिन्दी अख़बार को लेकर सतर्क रहने का समय आ गया है। बंद करना मुमकिन नहीं है इसलिए हर महीने आप अपना हिन्दी अख़बार बदल दें। दूसरा ले लें। तभी आप पाठकों का अख़बारों पर दबाव बनेगा।

जिन भाषणों से दूसरों को हराया, उसी से हार रहे हैं मोदी : रविश कुमार

नवंबर महीने में जीएसटी से होने वाली राजस्व वसूली में पिछले महीने के मुकाबले 14 फीसदी की कमी आई है। 80,080 करोड़ का ही राजस्व आया है। कहा जा रहा है कि सरकार ने जीएसटी की कई दरों में कटौती की थी, इससे हुआ है। देखते हैं दिसंबर में क्या स्थिति रहती है। क्या सरकार ने फंड लौटा दिए हैं? वादा था कि नवंबर दिसंबर तक वापस कर दिया जाएगा।

सरकार लघु बचत योजनाओं की ब्याज़ दरों में कटौती कर दी है। एक साल के फिक्स डिपाज़िट पर 6.8 की जगह 6.6 प्रतिशत ब्याज़ मिलेगा। चार साल के फिक्स डिपाज़िट पर 7.6 प्रतिशत की जगह 7.4 प्रतिशत ब्याज़ मिलेगा। पब्लिक प्रोविडेंट फंड का ब्याज़ 7.8 से घटकर 7.6 प्रतिशत हो गया है।

वोट पर भले असर न पड़े मगर वरिष्ठ नागरिक इन्हीं बचत के भरोसे रहते हैं। उनकी कमाई कुछ कम हो जाएगी। यह जनवरी से मार्च और पहले की तिमाही के लिए किया गया है.

इससे बैंक भी बचत योजनाओं पर ब्याज़ दर घटा देंगे। कहां तो बैंक लोन पर ब्याज़ दर में कमी की बात हो रही थी, उल्टा जनता की बचत में कटौती हो गई।

गुजरात में पार्टी से नाराज नेताओं ने अमित शाह के सामने लगाए ‘बीजेपी हाय-हाय’ के नारे !

हीरे जवाहरात के निर्यात में नवंबर में 50 फीसदी का उछाल आया है। अप्रैल से अक्तूबर के बीच इसमें 13 प्रतिशत की कमी आ गई थी।

नवंबर में कपड़ों का निर्यात 10 प्रतिशत गिर गया। नवंबर 2016 में 7,783 करोड़ था, जो नवंबर 2017 में 6,719 करोड़ हो गया। एक अरब डॉलर निर्यात कम होता है तो इस सेक्टर में 7 लाख नौकरियां कम हो जाती हैं।

2017 पावर सेक्टर के लिए अच्छा नहीं रहा। पावर प्लांट अपनी क्षमता का 59 प्रतिशत ही उत्पादन कर रहे थे। मांग और आपूर्ति में भारी अंतर रहा।

मुकेश अंबानी की कंपनी अनिल अंबानी की कंपनी से 24000 करोड़ की ख़रीद करेगा। अनिल अंबानी मोबाइल बिजनेस का अपना ढांचा बेच रहे हैं।

1978 में मोदी की डिग्री कंप्यूटर से कैसे छपी? क्या बिल गेट्स ने कोई स्पेशल कंप्यूटर भेजा: आप

इस साल स्टील के निर्यात में आयात की तुलना में बढ़ोत्तरी हुई है। दुनिया के बाज़ार पर चीन का कब्ज़ा था। स्टील सेक्टर की इस कामयाबी को मुस्कुराहट के साथ देखा जा रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में कच्चे तेल के दाम गिरे हैं। इसका भाव 66.27 डॉलर प्रति बैरल है।

17 राज्यों में मनरेगा के तहत तय की गई मज़दूरी खेतिहर मज़दूरों की मज़दूरी से भी कम है। इस बात की जानकारी केंद्रीय मंत्री राम कृपाल यादव ने संसद में दी है।

जरूर पढ़ें, रविश कुमार ने नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी को लिखा साझा पत्र।

0

नौजवानों के साथ धोखा, कहां हैं मोदी और राहुल
माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी,
यह साझा पत्र इसलिए लिख रहा हूं ताकि आपमें से जिसे भी वक्त हो, भारत भर के युवाओं के साथ हो रही धोखाधड़ी का मसला उठाएं। केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों के कर्मचारी सेवा आयोग का ट्रैक रिकार्ड बताता है कि ये नौकरी देने के नाम पर नौजवानों को झांसा दे रहे हैं। उनके अवसाद का कारण बन रहे हैं। आप दोनों युवाओं के लिए वक्त निकालिए। प्रधानमंत्री जी आप सरकार में रहते हुए सोचिए कि क्या होना चाहिए और राहुल गांधी जी आप विपक्ष में रहते हुए आप इस मुद्दे को इतना उठाइये कि सरकार जल्दी सोचे और जल्दी कुछ करे। 

भारत के नौजवानों के धीरज का इम्तहान मत लीजिए। इस तरह से उनके साथ धोखाधड़ी होगी तो उनका संस्थाओं से यकीं उठ जाएगा। नियुक्ति के लिए ज़िम्मेदार संस्थाओं ने नौजवानों का तमाशा बना कर रख दिया है। आप चुनाव जीतें, हारें मगर इन नौजवानों ने क्या किया है कि इन्हें नौकरी के नाम पर सज़ा दी जा रही है।   
मैंने 26 दिसंबर को फेसबुक पेज @RavishKaPage पर तीन नौकरियों के बारे में लिखा, जिसके बारे में छात्र कई हफ्तों से मुझे व्हाट्स अप कर रहे थे कि मीडिया उनके रोज़गार के सवाल को क्यों नहीं उठाता है। आप जानते हैं भारत में गोदी मीडिया की क्या हालत हो गई है। उसे इस हालत में पहुंचाने में किस किस का हाथ है, यह सब आप लोगों को पता है। गोदी मीडिया आपको भी धोखा दे रहा है। सही समय पर सही फीडबैक नहीं पहुंचेगा तो आप कार्रवाई कर वाहवाही लूटने का मौका गंवा देंगे। विपक्ष के नेता आवाज़ उठा कर जनता के करीब होने का मौका गंवा देंगे। 

मेरे फेसबुक पोस्ट के जवाब में कई कमेंट आए हैं। मैंने सारे कमेंट पढ़े हैं और उनमे से कइयों को छांट कर आपके लिए सजा दिया है ताकि आप एक ही नज़र में देख सकें कि चयन आयोग नौजवानों के साथ कैसे खिलवाड़ कर रहे हैं। 
1. 2016 में करीब 15 लाख छात्रों ने SSC-CGL का इम्तहान दिया। इसमें से 10,661 लड़के लड़कियों का नौकरी के लिए चयन हुआ। इस परीक्षा को पास करने वाले सीबीआई, आयकर अधिकारी, उत्पाद शुल्क अधिकारी, रेलवे में सेक्शन अफसर के पद पर ज्वाइन करते हैं। 5 अगस्त 2017 को नतीजे भी आ गए मगर इन नौजवानों की ज्वाइनिंग नहीं हो रही है। इन्होंने फेसबुक और ट्विटर पर कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह को भी सूचित किया मगर कइयों को ब्लाक कर दिया गया।
2. असम से सूचना है कि IBPS RRB ने 10 मार्च को अफसर ग्रेड का नतीजा निकाला। इसके लिए इम्हतानों की एक साल तक प्रक्रिया चली। छात्रों ने प्रीलिम्स दिया, मेन्स दिया और इंटरव्यू भी हुआ। रैकिंग के आधार पर 200 छात्रों ने असम ग्रामीण बैंक का चयन किया। एक साल बाद जब प्रोवेशन पूरा हुआ तो बैंक की तरफ से बताया गया कि इनकी ज़रूरत नहीं है। परीक्षा पास करने के बाद भी ये 200 नौजवान सड़क पर हैं। इन्होंने गुवाहाटी हाईकोर्ट में मुकदमा किया है।
3. रेलवे ने 26 दिसंबर 2015 को गैर टेक्निकल पदों के लिए वैकेंसी निकाली थी। विज्ञापन 18000 पदों का आया था, जिसे परीक्षा की प्रक्रिया के बीच में घटाकर 14000 कर दिया गया। चार हज़ार छात्र बीच प्रक्रिया से ही बाहर कर दिए गए हैं। उस विज्ञापन को निकले दो साल हो गए हैं। अभी तक इस परीक्षा का मेडिकल नहीं हुआ है।
4.RRB NTPC CEN/03- 2015 में नोटिफिकेशन आया। मार्च 2016 में पहली आनलाइन परीक्षा हुई। मुंबई क्षेत्र का रिज़ल्ट आया 30 नवंबर 2017 को। उसके बाद की प्रक्रिया के लिए छात्र इंतज़ार ही कर रहे हैं। 
5.RRB मुंबई, CEN NO 01/2015-  अगस्त2015 में परीक्षा होती है। मार्च 2016 में रिज़ल्ट आता है। 77 लोगों का चयन होता है। 39 लोगों को वेटिंग में डाल दिया जाता है। 21 महीने से वे नौकरी के लिए बुलाए जाने का इंतज़ार कर रहे हैं। 
6.SSC CP0 2016- जनवरी 2016 में नोटिफिकेशन आता है। प्रारंभिक परीक्षा जनवरी 2016 में होनी थी मगर पेपर लीक हो जाता है। दोबारा परीक्षा होती है। शारीरिक परीक्षा होती है उसके बाद मुख्य परीक्षा होती है दिसंबर 2016 में। मेडिकल मार्च 2017 में होता है। जून 2017 तक दस्तावेज़ों की जांच होती है। अंतिम नतीजा निकलता है सितंबर 2017 में। अभी तक इनकी ज्वाइनिंग नहीं हुई है। मज़ाक चल रहा है क्या। 
7.RRB मुंबई- एक नौजवान ने लिखा हैकि 2014 में उसका लोको पायलट में चुनाव हो गया था। अभी तक ज्वाइनिंग का लेटर नहीं आया है। तीन साल हो गए सर….तीन साल। 
8.SSC CHSL 2015- नवंबर 2015 में प्री की परीक्षा होती है। अप्रैल 2016 में प्री की परीक्षा का रिज़ल्ट आता है। अक्तूबर 2016 में मुख्य परीक्षा होती है। इसका रिज़ल्ट आता है जनवरी 2017 में। टाइपिंग टेस्ट होता है मार्च 2017 में। टाइपिंग का रिज़ल्ट आता है जुलाई 2017 में। अंतिम परिणाम आता है अक्तूबर 2017 में। अभी तक ज्वाइनिंग नहीं हुई है। 
9. हरियाणा कर्मचारी चयन सेवा आयोग ने 2015 में वेकैंसी निकाली। 2016 में परीक्षा हुई। नवंबर 2017 में रिज़ल्ट आया। इसके बाद का पता नहीं।
10. हरियाणा में 2015 में पीजीटी स्कूल टीचर की वैकंसी निकली। परीक्षा हो चुकी है मगर इंटरव्यू तक शुरू नहीं हुआ है। तीन साल गुज़र चुके हैं सर..तीन साल। 
11.यूपी लोकसेवा आयोग ने 2013 में 177 मेडिकल अफसर का पद निकाला। होम्योपथी के लिए। 2015 में परीक्षा हुई। लोग चुने भी गए मगर अभी तक इंटरव्यू नहीं हुआ है। 2013 से 2017 आ चुका है सर। 
12. यूपी लोक सेवा आयोग ने 2013 में राज्य स्तर पर इंजीनियरिंग की परीक्षा के लिए फार्म निकाला। 2015 में परीक्षा हुई। आज तक रिज़ल्ट का पता नहीं है। 2013 से 2017 आ गया है सर। ये नौजवान कहां जाएंगे। 
13. AGRICULTURE TA(UP) की परीक्षा पास कर तीन साल से नौजवान ज्वाइनिंग का इंतज़ार कर रहे हैं। मामला कोर्ट में चला गया। हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा है। 

 

14. उत्तराखंड में अप्रैल 2015 में सहायक अभियंता की परीक्षा हुई। आज तक रिज़ल्ट का पता नहीं है।
15. दिल्ली सलेक्शन बोर्ड। 2015 में फार्मासिस्ट की वैकेंसी आई। अगस्त 2015 में इम्तहान हुआ। रिज़ल्ट भी आ गया मगर ज्वाइनिंग का कुछ पता नहीं है। 
बिहार लोकसेवा आयोग और झारखंड लोकसेवा आयोग का कांड सुनिये। ये तो और भी भयंकर है। इससे अच्छा तो ये सारे आयोग ही भंग कर दिए जाएं और युवाओं से कह दिया जाए कि जाओ हम तुम्हें नौकरी नहीं देंगे। तुम्हें नारे लगाना है तो लगाओ, वर्ना हम कुछ और करके चुनाव जीत लेंगे। जीत भी रहे हैं। 
16. BPSC 56-59 ( ये बैच का नंबर होगा) का 17 महीने से रिजल्ट नहीं आया है। 17 महीने ! हलो, कोई है बिहार में मुख्यमंत्री, कोई उप मुख्यमंत्री?

BPSC 56-59 की परीक्षा का फार्म निकलता है सितंबर 2014 में। प्री की परीक्षा होती है 15 मार्च 2015 को। प्री का रिज़ल्ट आता है 21 नवंबर 2015 को। मेन्स की परीक्षा होती है 8 से 30 जुलाई 2016 के बीच। इतिहास का पेपर रद्द होता है। उसकी परीक्षा होती है 13 नवंबर 2016 को। आज तक इस परीक्षा का रिज़ल्ट नहीं आया है।  
17. पहले की परीक्षा का रिज़ल्ट नहीं आया लेकिन आगे का इम्तहान शुरू। BPSC 60-62 की प्री परीक्षा हो चुकी है। मेन्स परीक्षा का फार्म भरा जा रहा है। BPSC 63 का फार्म भरा जा रहा है।   
18. झारखंड लोकसेवा आयोग को बने 17 साल हो गए। 17 साल में राज्य नौकरशाही के लिए 5 बार लोक सेवा की परीक्षा हुई है। इसमें से दो की परीक्षा रद्द हो गई। छठी परीक्षा का फार्म 2015 में निकला है। परीक्षा की तारीख तीन बार बढ़ाई जा चुकी है। 18 दिसंबर 2016 को प्री की परीक्षा होती है। मेंस की परीक्षा की तारीख भी दो बार बढ़ाई जा चुकी है। 29 जनवरी 2018 की तारीख़ तय हुई है जिसके भी बढ़ जाने की आशंका अभी से लगाई जा रही है। 2015 की वैकेंसी 2018 तक में भी पूरी नहीं होगी। ये है मज़ाक भारत के युवाओं के साथ। 
प्रधानमंत्री मोदी जी और राहुल गांधी जी आप दोनों इस सूची को ध्यान से पढ़िए। मैंने तो हज़ारों कमेंट से छांट कर आपके लिए लिखा है। अपनी तरफ से कर्मचारी आयोग को फोन कर पता नहीं किया है इसलिए त्रुटियां हो सकती हैं। सुधार कर दूंगा मगर यह पैटर्न तो बेहद ख़तरनाक है। राजस्थान, बिहार, कर्नाटक, पंजाब, दिल्ली, मध्यप्रदेश। केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों के चयन आयोग नकारा हो चुके हैं। इनका काम है वेकैंसी निकाल कर युवाओं को परीक्षा के नाम पर भटकाते रहना।  
आप मेरी सूची में साफ साफ देख सकते हैं। फार्म निकलने से लेकर नतीजा आने और ज्वाइनिंग के इंतज़ार में नौजवानों के कितने साल बर्बाद हो रहे हैं। कई परीक्षाएं तो अदालतों की भेंट चढ़ जाते हैं। क्या आप लोग अदालतों से आग्रह नहीं कर सकते कि ऐसे मामलों का निपटारा जल्दी करें। युवाओं की नौकरी की उम्र निकल सकती है। वे निराश हताश हो सकते हैं। आखिर इन लोगों ने आप लोगों को वोट दे कर कोई ग़लती तो नहीं की है कि इनकी जीवन से खेला जाए। क्या आप इन नौजवानों की जगह होते तो इतना बर्दाश्त कर पाते। 
ठीक है कि इस देश में रोज़गार के सवाल पर युवा ही वोट नहीं करते हैं, युवाओं के पापा मम्मी भी वोट नहीं करते हैं। मान लिया। मगर आप लोग तब भी रोज़गार की बात तो करते हैं न। तो क्यों इनके साथ ऐसा बर्ताव हो रहा है। मुझे नहीं पता कि पहले कैसा होता था, लेकिन क्या मैं यह जान सकता हूं कि अब क्यों ऐसा हो रहा है? कोई जवाब है किसी के पास। 
आपका 
रवीश कुमार

पत्रकार
नोट: दोस्तों यह पोस्ट सबके हित के लिए है। बीजेपी के समर्थकों के लिए भी और विरोधियों के लिए भी। केंद्र और राज्यों के कर्मचारी सेवा आयोग के दीमक से खुद को बचाना है तो आवाज़ बुलंद कीजिए। फेसबुक मेरा पोस्ट सभी फोलोअर तक नहीं पहुंचने देता है। पहले दस लाख पंद्रह लाख तक पहुंचता था। आजकल पांच से छह लाख के बाद गाड़ी रूक जाती है। शायद वे आगे पहुंचाने के लिए पैसे मांगते हों। मेरे कई दोस्त जो मुझे फोलो करते हैं उन तक मेरा पोस्ट नियमित नहीं पहुंचता है। इसलिए आप इस पत्र को जन जन तक पहुंचा दीजिए वर्ना बिन नौकरी के आपकी जवानी ख़ाक हो जाएगी। इससे मीडिया पर भी दबाव बनेगा कि वे राज्यों के आयोग की खाक छाने।  मेरा यह लेख मेरे ब्लाग कस्बा पर भी है। इसका लिंक पहले कमेंट में दे रहा हूं।

प्रधानमंत्री मोदी गुजरात की जनता को भय के भंवर में फंसा कर रखना चाहते हैं : रविश कुमार

0

क्या प्रधानमंत्री मोदी गिरिराज सिंह हो गए हैं
“पाकिस्तान के रिटायर्ड आर्मी जनरल अरशद रफ़ीक़ कहते हैं कि सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए। पाकिस्तान का वरिष्ठ आर्मी अफसर गुजरात चुनावों में अपना दिमाग़ क्यों लगाएगा? पाकिस्तान का एक डेलिगेशन मणिशंकर अय्यर के घर मिला था, अगर दिन उन्होंने गुजरात के समाज का अपमान किया, गरीबों और मोदी का अपमान किया। क्या ये बातें चिंता पैदा नहीं करती हैं, सवाल खड़े नहीं करते हैं, कांग्रेस को जवाब देना चाहिए” 


अख़बारों में छपा है कि बनासकांठा में प्रधानमंत्री ने ऐसा कहा है। प्रधानमंत्री अब गुजरात के सामने अहमद पटेल का भूत खड़ा कर रहे हैं। गुजरात की जनता को भय के भंवर में फंसा कर रखना चाहते हैं ताकि वह बुनियादी सवालों को छोड़ अहमद पटेल के नाम पर डर जाए। क्यों डरना चाहिए अहमद पटेल से? क्या इसी इस्तमाल के लिए राज्यसभा में अहमद पटेल को जीतने दिया गया? अहमद पटेल बार बार कह चुके हैं कि वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं, कांग्रेस ने भी ऐसा नहीं कहा है। 
क्या प्रधानमंत्री गुजरात की जनता को मुसलमान के नाम पर डरा रहे हैं? यह प्रधानमंत्री की तरफ से खेला गया सांप्रदायिक कार्ड है।  काश उन्हें कोई बताए कि भारत की जनता ने उनका हर शौक पूरा किया है, अब उसे सांप्रदायिकता की आग में न धकेलें। काश कोई उन्हें याद दिलाए कि आपने ही 15 अगस्त को 2022 तक सांप्रदायिकता मिटाने का भाषण दिया है। कोई संकल्प वंकल्प किया है। 
भारत में एक ही मुस्लिम मुख्यमंत्री है, महबूबा मुफ़्ती, वह भी बीजेपी के समर्थन से हैं। । अब तो उनके भाई भी कैबिनेट में आ गए हैं। परिवारवाद? फिर बीजेपी और मोदी अहमद पटेल का भूत क्यों खड़ा कर रहे हैं? विस्तार से बताने की ज़रूरत नहीं है। 
प्रधानमंत्री जानते हैं कि शब्द ज़रूरी नहीं हैं, शब्दों को इस तरह सजाकर कहा जाए कि उनसे एक छवि बने। उन्होंने अपनी बात इस तरह से कही है कि सामान्य जनता के मन में यह छवि पैदा हो जाए कि गुजरात चुनावों में पाकिस्तान दखलंदाज़ी कर रहा है।
 

इंडियन एक्सप्रेस ने मणिशंकर अय्यर के घर हुई रात्रि भोज के बारे में विस्तार से छापा है। 6 दिसंबर को मणिशंकर अय्यर के घर पर पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री कसूरी के लिए रात्रि भोज हुआ था। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व सेनाध्यक्ष दीपक कपूर, पूर्व विदेश मंत्री के नटवर सिंह, पूर्व राजनयिक टीसीए राघवन, शरत सभरवाल, के शंकर बाजपेयी, सलमान हैदर शामिल हुए थे। कसूरी अनंत नाम के एक थिंकटैंक के बुलावे पर भारत आए थे। भारत पाक संबंधों पर बोलने के लिए।
बीबीसी हिन्दी पर इस भोज में शामिल होने वाले पत्रकार प्रेम शंकर झा ने लिखा है कि सबको पता था कि कई लोग मणिशंकर अय्यर के यहां मिल रहे हैं। भोज के दौरान गुजरात चुनावों की कोई चर्च नहीं हुई, न ही अहमद पटेल का ज़िक्र हुआ। तो फिर प्रधानमंत्री को कहां से ये जानकारी मिली है?
कसूरी को यहां आने का वीज़ा भारत सरकार ने दिया होगा। वीज़ा क्यों दिया? जब पता चला तो कसूरी को अरेस्ट क्यों नहीं किया? क्या मोदी राज में इतना आसान हो गया है कि सत्तर पार और मुश्किल से चल फिर सकने वाले चंद लोग दिल्ली में जमा होकर तख़्ता पलटने की योजना बना लेंगे और  सुब्रमण्यण स्वामी ट्वीट करेंगे कि तख़्ता पलट की योजना तो नहीं? और इस योजना में भारत के ही पूर्व सेनाध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री शामिल होंगे? क्या भारत पाकिस्तान बन गया है?

 

पाकिस्तान से इतनी ही नफ़रत है तो शपथ ग्रहण समारोह में नवाज़ शरीफ़ को कौन बुलाया था, कौन अचानक बिना किसी योजना के पाकिस्तान पहुंच गया था? जवाब आप जानते हैं। मनमोहन सिंह तो अपने दस साल के कार्यकाल में एक बार भी पाकिस्तान नहीं गए। 
क्या प्रधानमंत्री को भी चुनाव आयोग की क्षमता पर शक होने लगा है? क्या उन्हें भी अमरीकी चुनावों की तरह हैक कर लिए जाने का अंदेशा हो रहा है? क्या उन्हें भी अब ईवीएम पर भरोसा नहीं है? फिर तो चुनाव रद्द करने की मांग करनी चाहिए। 
प्रधानमंत्री के इस बयान ने गिरिराज सिंह को ख़ुश कर दिया होगा। गिरिराज सिंह भले ही तीन साल में प्रमोट न हो सकें हो मगर उनका पाकिस्तान वाला जुमला उनसे प्रमोट होकर अमित शाह तक पहुंचा और अब अमित शाह से प्रमोट होकर प्रधानमंत्री मोदी तक पहुंच गया है। 
19-20 अप्रैल 2014, गूगल यही तारीख़ बता रहा है जब गिरिराज सिंह ने कहा था कि जो मोदी का विरोध करते हैं, पाकिस्तान चले जाएं। न्यू इंडिया में विरोधियों को पाकिस्तान से जोड़ने की शुरूआत गिरिराज सिंह ने ही की। 
उस वक्त देवघर के एस डी एम और रिटर्निंग अफसर जय ज्योति शर्मा ने गिरिराज सिंह के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कराई थी। चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में। उसका क्या हुआ, कौन पूछे। चुनाव आयोग का हाल आप जानते हैं। चुनाव आयोग अब शेषण और के जे राव का आयोग नहीं रहा। 

 

2014 के एक साल बाद 2015 के चुनाव में बिहार में अमित शाह ने कहा था कि अगर मोदी हार गए तो पाकिस्तान में पटाखे छोड़े जाएंगे। मोदी हार भी गए मगर पाकिस्तान में पटाखे नहीं छोड़े गए।
गिरिराज सिंह और अमित शाह के बाद प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान और अहमद पटेल के सहारे मुसलमान का भूत खड़ा कर रहे हैं। गिरिराज सिंह को बधाई। वे इस मामले में दो ताक़तवर नेताओं से भी सीनियर हो गए हैं।  
दोस्तों, आप चाहें जितने तर्क ले आइये मगर शक के नाम पर चल रही यह मुस्लिम विरोधी राजनीति सबको खोखला कर देगी। मुसलमान का डर दिखा कर हिन्दू नौजवानों को बर्बाद किया जा रहा है। उनसे कहा जा रहा है कि रोज़गार मत पूछो, पढ़ाई मत पूछो, अस्पताल मत पूछो, बस देखो कोई मुसलमान मुख्यमंत्री न बन जाए।  
लगातार हिन्दू नौजवानों की समग्र भारतीयता के बोध के दो टुकड़े किए जा रहे हैं। आख़िर सांप्रदायिकता की राजनीति किसे बर्बाद कर रही है? किसी आसमान से नहीं, आपके ही घरों से निकाल कर इस राजनीति के लिए लोग लाए जाने वाले हैं। सांप्रदायिकता आपको मानव बम में बदल देगी। नौजवानों को रोज़गार देने से अच्छा है उन्हें मानव बम में बदल दो। यही राजनीति चल रही है। 
अख़बारों ने भी छाप दिया है कि प्रधानमंत्री का इशारा कि गुजरात चुनावों में पाकिस्तान का हाथ है। अरे भाई गुजरात भारत में हैं, बर्मा में नहीं हैं। धानमंत्री वाक़ई कुछ भी बोलने लगे हैं। उन्हें लगता है कि लोगों ने अच्छा वक्ता मान लिया है इसलिए वे कुछ भी बोल सकते हैं।  

 

आदरणी प्रधानमंत्री मोदी, आप यह क्या कर रहे हैं? क्या प्रधानमंत्री जी आप गुजरात चुनाव हार रहे हैं? क्या  आप  गिरिराज सिंह हो गए हैं?

जिन भाषणों से दूसरों को हराया, उसी से हार रहे हैं मोदी : रविश कुमार

0

2014 में प्रधानमंत्री मोदी के जा भाषण उनके विजय रथ का सारथी बना वही भाषण 2017 तक आते-आते उनका विरोधी हो गया है। अपने भाषणों से मात देने वाले प्रधानमंत्री अपने ही भाषणों में मात खा रहे हैं। कम बोलना अगर समस्या है तो बहुत ज़्यादा बोलना भी समस्या है। बोलना सबको अच्छा लगता है लेकिन कुछ भी बोल देना किसी को अच्छा नहीं लगता है। प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में कुछ भी बोलने लगे हैं। तीन साल पहले की बात है, प्रधानमंत्री के भाषणों के आगे कांग्रेस को बोलने का मौक़ा नहीं मिल पाता था, आज उन्हीं भाषणों ने कांग्रेस को बोलने का मौक़ा दे दिया है। राहुल गांधी ने कहा है कि बोलते बोलते प्रधानमंत्री के पास कुछ बचा नहीं है। सच्चाई ने उन्हें घेर लिया है इसलिए नरेंद्र मोदी जी अब नरेंद्र मोदी जी पर ही भाषण दे रहे हैं। किसने सोचा था कि मोदी का यह मज़बूत हथियार उन्हीं के ख़िलाफ़ इस्तमाल होने लगेगा।
2014 का साल अलग था। मनमोहन सिंह आकर्षक वक्ता नहीं थे और न ही आक्रामक। 2009 में मनमोहन सिंह के सामने भाजपा का कमज़ोर प्रधानमंत्री का नारा नहीं चला था, 2014 में मनमोहन सिंह के सामने भाजपा का मज़बूत प्रधानमंत्री का नारा चल गया। चला ही नहीं, आंधी-तूफ़ान में बदल गया। 2009 में मनमोहन सिंह के कमज़ोर प्रधानमंत्री के सामने ख़ुद को महामज़बूत होने का दावा करने वाले आडवाणी 2014 के बाद मनमोहन सिंह से भी कमज़ोर साबित हुए। आडवाणी की चुप्पी इस तरह की हो चुकी है जैसे उन्होंने कभी माइक और लाउडस्पीकर भी नहीं देखा हो। वक्त का पहिया कैसे घूमता है। नोटबंदी पर मनमोहन सिंह का बयान मोदी सरकार पर जा चिपका। वही मनमोहन सिंह कह रहे हैं कि ग़रीब तो मैं भी था मगर मैं नहीं चाहता कि देश मुझ पर तरस खाए।
प्रधानमंत्री मोदी लगातार अपनी पृष्ठभूमि को उभारते रहते हैं। ग़रीब का बेटा, चाय वाले का बेटा। बहुत आसानी से 12 साल तक देश के अमीर राज्यों में से एक गुजरात के मुख्यमंत्री होने के तमाम अनुभवों को खारिज कर देते हैं। ग़रीब का बेटा कहने के लिए जिस राजनीति का वह नेतृत्व कर रहे हैं उसमें कितना धन है, वैभव है, पैसे का प्रदर्शन है, सब जानते हैं। करोड़ों रुपये ख़र्च कर सभाओं की तैयारी होती है जहां जाकर प्रधानमंत्री ख़ुद को ग़रीब का बेटा बताते हैं। दुनिया के इतिहास का यह सबसे महंगा ग़रीबी का सर्टिफिकेट है।
फिर भी किसने सोचा था कि उनकी इस ग़रीबी का जवाब मनमोहन सिंह से आएगा जो ख़ुद भी बेहद ग़रीब परिवार के थे मगर अपनी प्रतिभा के दम पर दुनिया के बड़े विश्वविद्यालयों तक पहुंचे और प्रधानमंत्री भी हुए। मनमोहन सिंह अपनी पृष्ठभूमि पर बात नहीं करना चाहते, प्रधानमंत्री मोदी इसके बिना कोई भाषण ही नहीं देते हैं।
2014 के लोक सभा चुनाव में मोदी की जीत सिर्फ भाषण के कारण नहीं थी। भाषण भी बड़ा कारण था। लोगों को लगा कि कोई बोलने वाला नेता भी होना चाहिए, मोदी ने लोगों ने यह इच्छा पूरी कर दी। मगर प्रधानमंत्री कभी नहीं समझ पाए कि अच्छे वक्ता की चाह रखने वाले लोग अच्छे भाषण की भी चाह रखते होंगे। प्रधानमंत्री मोदी लगातार इस कसौटी पर फेल होते चले जा रहे हैं। कभी ख़ुद को नसीब वाला कहा तो कभी किसी का डीएनए ही ख़राब बता दिया। दिल्ली से लेकर बिहार तक में देखा था कि लोग कैसे एक अच्छे वक्ता के ख़राब भाषण से चिंतित थे। प्रधानमंत्री मोदी वक्ता बहुत अच्छे हैं मगर भाषण बहुत ख़राब देते हैं।
एक कद्दावर नेता के लिए चुनावी जीत ही सब नहीं होता है। आख़िर वे इतनी जीत का करेंगे क्या? एक दिन यही जीत उनके भाषणों पर मलबे की तरह पड़ी नज़र आएगी। लोगों का जीवन चुनावी जीत से नहीं बदलता है। अगर बदल पाए होते तो गुजरात में 22 साल का हिसाब दे रहे होते। बता रहे होते कि मैंने 50 लाख घर बनाने का दावा किया था, यह रही चाबी, सबको दे दिया है। बता रहे होते कि कैसे शिवराज सिंह चौहान से लेकर रमन सिंह की सरकारों ने शिक्षा और अस्पताल के अनुभव बदल दिए हैं। रोज़गार के मायने बदल दिए। किसी और न भी नहीं किए होंगे मगर क्या अब आप यह भी कह रहे हैं कि मैंने भी नहीं किए और मैं करूंगा भी नहीं। आप ही नहीं किसी भी दल के पास जीवन बदलने का आइडिया नहीं है। यह संकट आपके पास ज़्यादा है क्योंकि आप सबसे अधिक दावा करते हैं।
प्रधानमंत्री के भाषण में कुछ जवाब होने चाहिए जो नहीं होते हैं। वे बहुत आसानी से कह देते हैं कि कांग्रेस ने मुस्लिम आरक्षण के नाम पर मुसलमानों को ठगा है। ख़ुद नहीं बताते कि वे और उनकी पार्टी मुस्लिम आरक्षण का नाम सुनते ही किस तरह हंगामा कर देते हैं। विरोध करते हैं। कांग्रेस पर उनका हमला सही भी है मगर अपनी बात वो ग़ायब कर देते हैं। वे यह बात शायद मुसलमानों को बता रहे थे कि कांग्रेस ने उन्हें ठगा है। यूपी, हरियाणा और राजस्थान के जाट भी उनसे यही पूछ रहे हैं कि जाट आरक्षण पर हमसे किया गया वादा क्या हुआ। क्या भाजपा ने वैसे ही जाटों को ठगा है जैसे कांग्रेस ने मुसलमानों को ठगा है। महीने भर से गुजराती में भाषण दे रहे प्रधानमंत्री को अपने बोलने पर बहुत यकीन हो चुका है कि वे कुछ भी बोल देंगे, लोगों को सुनना पड़ेगा। इस तरह का गुमान के सी बोकाडिया और राज सिप्पी को होता था कि कोई सी भी पिक्चर बना देंगे, हिट हो जाएगी।
प्रधानमंत्री विपक्ष के गंभीर सवालों का जवाब कभी नहीं देते हैं। बेतुकी बातों को लेकर बवाल मचा देते हैं। सारे मंत्री जुट जाते हैं, आई टी सेल जुट जाता है और गोदी मीडिया के एंकर हफ्तों के लिए एंजेंडा सेट कर देते हैं। आज न कल प्रधानमंत्री मोदी को इस गोदी मीडिया से छुटकारा पाना ही होगा। कई बार वो अपनी ग़लतियों को तुरंत सुधार लेते हैं, गुजरात चुनावों के कारण उन्हें जीएसटी की हकीकत दिख गई, सुधार किया, उसी तरह किसी चुनावी मजबूरी के कारण ही प्रधानमंत्री को अपनी गोद से इस मीडिया को उठाकर फेंकना होगा। ऐसा होकर रहेगा वरना यह मीडिया एक दिन उनके भाषणों की तरह उन्हीं को निगलने लगेगा। कोई भी सक्रिय समाज मीडिया को सरकार की गोद में लंबे समय तक देखना बर्दाश्त नहीं कर सकता है। वह समाज उसे ही सहन नहीं करेगा जिसकी गोद में मीडिया तरह तरह के दबावों से बिठाया जाता है।
प्रधानमंत्री ने ख़ुद भी किस तरह की राजनीतिक भाषा का इस्तमाल किया है। उनके नेतृत्व में तीन साल से किस भाषा का इस्तमाल हो रहा है, वे चाहें तो किसी भी भाषाविद से अध्ययन करा सकते हैं। आई टी सेल और ट्रोल संस्कृति के ज़रिए जो हमले होते रहे, झूठ का प्रसार होता रहा, ये सब जानना हो तो उन्हें ज़्यादा मेहनत करने की ज़रूरत नहीं है। बस ऑल्ट न्यूज़ की वेबसाइट पर जाना है, काफी कुछ मिल जाएगा। उनके कार्यकाल का मूल्याकंन क्या सिर्फ चुनावी जीत से होगा या राजनीतिक संस्कृति से भी होगा।
इसी 15 अगस्त को प्रधानमंत्री ने कहा कि सांप्रदायिकता को मिटाना है लेकिन उनके भाषणों में मुग़ल, औरंगज़ेब या उनके प्रवक्ताओं की ज़ुबान पर खिलजी का ज़िक्र किस संदर्भ में आता है? सांप्रदायिकता की बुनियादी समझ रखने वाला भी इसका जवाब दे सकता है। वे बेहद चालाकी से सांप्रदायिक सोच को समर्थन देते हैं और सुविधा से ऐसी सोच का अपने हक़ में इस्तमाल करते हैं। क़ब्रिस्तान हो या औरंगज़ेब हो यह सारे उनकी शानदार जीत के पीछे मलबे के ढेर की तरह जमा है। वे चाहें तो टीवी खोल कर अपने प्रवक्ताओं की भाषा का भी अध्ययन कर सकते हैं।
विरोधी दलों ने वाक़ई उनके ख़िलाफ़ कई बार ख़राब भाषा का इस्तमाल किया है मगर क्या वे हर बार इसी से छूट लेते रहेंगे कि उन्हें ऐसा बोला गया है, क्या वे कभी इसका जवाब नहीं देंगे कि वे भी इसी तरह से बोलते रहें हैं? चुनावों के समय विरोधियों की सीडी बनवाना, स्टिंग करवाना यह सब आपके खिलाफ भी हुआ और आप भी दूसरों के खिलाफ खुलकर किए जा रहे हैं। कहीं कोई फुलस्टाप नहीं है। इसीलिए अब आप अलग से दिखने वाले नरेंद्र मोदी नहीं हैं। अब आप पहले से चली आ रही ख़राब राजनीतिक संस्कृति को आगे बढ़ाते रहने वाले नरेंद्र मोदी हैं। आप नरेंद्र मोदी को गाली दिए जाने को लेकर मुद्दा बनाने लगते हैं, मगर आपने या आपकी टीम ने नेहरू के साथ क्या किया है? क्या यह भी बताने की ज़रूरत होगी?
आपकी विश्वसनीयता या लोकप्रियता चाहे जितनी हो, आपके लोगों को भी पता है चुनाव आयोग से लेकर तमाम संस्थाओं की विश्वसनीयता बढ़ी नहीं है बल्कि पहले जैसी है या उससे भी घट गई है। सिर्फ आप ही नहीं, किसी भी राज्य में किसी भी नेता के सामने यही संकट है। संस्थाओं की विश्वसनीयता गिराते रहने से कोई नेता अपनी विश्वसनीयता के शिखर पर अनंत काल तक नहीं रह सकता है।
न्यूज़ 18 के चौपाल कार्यक्रम में संबित पात्रा कन्हैया से कह रहे थे कि आप वंदेमातरम नहीं बोलते हैं, कन्यैहा वंदेमातरम भी बोलते हैं, भारत की माता की जय भी बोलते हैं, फिर संबित से पूछते हैं कि अब आप बताओ गांधी को पूजते हैं या गोड्से को। संबित इस सवाल का जवाब नहीं नहीं देते हैं, कन्हैया लेनिन ज़िंदाबाद, स्टालिन मुर्दाबाद बोल रहे हैं, संबित जवाब नहीं देते हैं कि गांधी की पूजा करते हैं या गोड्स की पूजा करते हैं। अंत में बात इस पर ख़त्म होती है कि मोदी इस देश के बाप हैं।
मैं सन्न रह गया जब पात्रा ने कहा कि मोदी इस देश के बाप हैं। संबित को किसने कहा कि आप इस देश के बाप हैं। मुमकिन है आप भारत का कोई भी चुनाव नहीं हारें, लेकिन उन तमाम जीत से पहले और जीत के सामने मैं यह कहना चाहता हूं कि जनता इस देश की बाप है। आप इस देश के बाप नहीं है। इतनी सी बात संबित पात्रा को मालूम होनी चाहिए। इस देश में दरोगा, जांच एजेंसी के दम पर कोई भी कुछ करवा सकता है, यह पहले भी था और आपके राज में भी है, थाना पुलिस के दम पर दम भरना या भीड़ के दम पर दम भरना बहुत आसान है। इसे हासिल करना कोई बड़ी बात नहीं है।
मोहल्ले का दादा और देश का बाप ये सब क्या है। आपने 2014 में कहा था कि आप भारत के प्रधान सेवक हैं, तीन साल बाद 2017 में संबित पात्रा कह रहे हैं कि आप इस देश के बाप हैं। मजबूरी में कोई किसी को बाप बना लेता है, यह मुहावरा सबने सुना है। क्या संबित आपको मज़बूत नेता से मजबूरी का नेता बना रहे हैं? विरोधियों को कोई क्लिन चिट नहीं दे रहा है, मगर प्रधानमंत्री को सत्ता में बिठाने में लोगों ने क्या कोई कमी की है जिसका बदला ऐसी ख़राब राजनीतिक संस्कृति के ज़रिए लिया जा रहा है। प्रधानमंत्री चाहें तो अपने इन प्रवक्ताओं को कुछ दिन टीवी से दूर रखें, ये तो नेता हैं नहीं, जो नेता हैं, उन्हीं का प्रभाव कमज़ोर कर रहे हैं।
यह आपका प्रभाव ही है कि नतीजा आने से पहले कोई नहीं लिखता है कि आप हार सकते हैं। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में हार हुई तो वही संपादक और एंकर वही लिखेंगे जो मैं नतीजा आने से पहले लिख रहा हूं। आप भले चाहें जितना चुनाव जीतें, लेकिन आप भी आसानी से देख सकते हैं कि आप अपने भाषणों में किस तरह हर दिन हार रहे हैं।

बिहार में प्रधानमंत्री मोदी ने की जुमलों कि बारिश, रविश कुमार ने खोली पोल !

0

इन दिनों प्रधनमंत्री मोदी के जुमले सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहे है । चुनाव के समय प्रधानमन्तरी मोदी जहाँ भी सभा करने जाते लोग कयास लगाने लग जाते है कि आज कौनसा जुमला सुनने को मिलेगा । राहुल गांधी ने भी आज पीएम मोदी की सभा से पहले गुजरात की जनता को जुमलों से सावधान रहने की नसीहत दी थी ।

 

इसी बीच वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने भी अपने अपने लेख में पीएम मोदी द्वारा बिहार में किये गए वादों की पोल खोल दी है । आपको बता दें कि हाल ही में पीएम मोदी ने बिहार का दौरा किया था और साथ ही कई सारे ऐलान किये थे । इस दौरे में पीएम मोदी ने हजारों करोड़ के ऐलान किये जो जनता और पत्रकारों को हजम नही हुए । अगर आपको भी यह वादें समझ नही आए तो रवीश कुमार का यह लेख आपके लिए ही है ।

पटना में प्रधानमंत्री के बयान के बाद से इस खोजबीन में लगा था कि दस हज़ार करोड़ की बात कहां से आई? क्या इसका ज़िक्र बजट में है?
आप जानते हैं कि 2016-17 के बजट में कहा गया था कि 20 भारतीय यूनिवर्सिटी को दुनिया की सौ टॉप यूनिवर्सिटी में पहुंचाने के लिए रेगुलेटरी आर्किटेक्टर बनाया जाएगा। इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहा गया है। 2017-18 के बजट में उच्च शिक्षा के खंड में इसका ज़िक्र नहीं है मगर व्यय वाले हिस्से में यानी पेज 186 पर इसके लिए 50 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
हम यही सोच रहे थे कि बजट में 50 करोड़ है तो 10,000 करोड़ जितनी बड़ी राशि का ज़िक्र कैसे आ गया ? क्या इतनी बड़ी राशि के लिए संसद की मंज़ूरी ज़रूरी नहीं है?

 

यूजीसी ने 12 सिंतबर 2017 तक बीस संस्थानों से 90 दिनों के भीतर आवेदन जमा करने का विज्ञापन निकाला है। इसके बाद हमने और अमितेश ने यूजीसी की गाइडलाइन्स चेक की। गाइडलाइन्स के पारा 6.2 पढ़ा जिसमें कहा गया है कि 20 संस्थानों को उनकी योजना का 50 से 70 फीसदी दिया जाएगा या 1000 करोड़ तक दिया जाएगा। यह राशि प्रत्येक संस्थान को पांच साल में दी जाएगी। इस हिसाब से इस योजना का कुल बजट होता है 20,000 करोड़।

 

लेकिन प्रधानमंत्री ने तो 10,000 करोड़ बोला था। क्या प्रधानमंत्री ने अपने स्तर पर बजट कम कर दिया? यूजीसी की वेबसाइट पर एक और गाइडलाइन्स मिलती है। इसी मामले की गाइडलाइन्स मानव संसाधन मंत्रालय की है और 2016 की है। दोनों ही गाइडलाइन्स यूजीसी और मानव संसाधन मंत्रालय की वेबसाइट पर है। 2016 की गाइडलाइन्स में लिखा है कि अपनी योजना सौंपने वाले हर संस्थान को पांच साल तक 500 करोड़ की राशि दी जा सकती है। इस हिसाब से इस योजना का कुल बजट हुआ 10,000 करोड़।
यानी प्रधानमंत्री ने जो बोला, वो 2016 के मानव संसाधन मंत्रालय की गाइडलाइन्स के अनुसार है। फिर यूजीसी ने 500 करोड़ से बढ़ाकर 1000 करोड़ कब कर दिया, किया तो क्या प्रधानमंत्री को पता नहीं चला?

 

यही नहीं, इस मामले में भारत सरकार ने एक गजट भी प्रकाशित किया है। इसकी तारीख है 29 अगस्त 2017। इस गजट के अनुसार निजि विश्वविद्यालयों को किसी राशि का आवंटन नहीं किया जाएगा। लेकिन परियोजना के लिए जो सरकारी राशि होगी, उसका इस्तमाल वो कर सकती हैं। इससे यही समझ आता है कि प्राइवेट यूनिवर्सिटी भी सरकार से रिसर्च के लिए ग्रांट ले सकती हैं या उन्हें मिलने लगेगा। मगर चोटी की 20 यूनिवर्सिटी में पहुंचने के लिए सरकारी यूनिवर्सिटी के साथ उन्हें पैसा नहीं मिलेगा।

 

फिर वही बात। प्रधानमंत्री ने तो कहा है कि 10,000 करोड़ में से 10 प्राइवेट यूनिवर्सिटी को भी मिलेगा। यही बात यूजीसी और मानव संसाधन मंत्रालय की वेबसाइट पर भी है। तो सरकार का गजट, जो अंतिम और प्रमाणिक दस्तावेज़ माना जाता है, उसमें क्यों लिखा है कि प्राइवेट यूनिवर्सिटी को पैसा नहीं देंगे। यह गजट भी यूजीसी की वेबसाइट UGC.AC.IN पर मौजूद है। मतलब एक ही संस्थान की वेबसाइट पर तीन तीन तरह के दस्तावेज़ हैं। पैसे को लेकर तीन-तीन तरह के दावे हैं।

 

समझना मुश्किल है कि कौन सही बोल रहा है। प्रधानमंत्री ग़लत बोल रहे हैं या उन्हें ग़लत जानकारी दी जा रही है, यूजीसी और मानव संसाधन मंत्रालय ने अलग अलग गाइडलाइन्स क्यों जारी की है, अगर गाइडलाइन्स एक ही है तो एक में राशि 500 करोड़ क्यों है और एक में 1000 करोड़। क्या इतनी आसानी से 10,000 करोड़ से 20,000 करोड़ हो जाता है? सिम्पल सा सवाल है प्रधानमंत्री जी, क्या आप मानव संसाधन मंत्री से पूछ सकते हैं?

अभी अभी रविश कुमार के इन आंकड़ों ने खोली मोदी सरकार के दावों की पोल !

0

सरकार में आने के पहले वादों का और सरकार में आने के बाद दावों का सिलसिला बदस्तूर जारी है । मोदी सरकार आए दिन नए नए दावे करती है । लेकिन जब आंकड़े सामने आते है तो तस्वीर कुछ और कहती है । इसी बीच विरिष्ट पत्रकार रविश कुमार ने आयकर विभाग पर कुछ आंकड़े जारी कर एक बार फिर मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है । 
रविश का लेख

​रविवार के इंडियन एक्सप्रेस में आयकर विभाग के जारी आंकड़ों के आधार पर छपा है कि इस साल आयकर जमा करने वालों की संख्या में 25 प्रतिशत की वृद्धि तो हुई है मगर इसमें करीब 70 फीसदी सालाना पांच लाख या उससे कम आय वाले हैं। मतलब संख्या भले बढ़ी है, आयकर वसूली इस संख्या के अनुपात में नहीं बढ़ेगी। पांच लाख या उससे कम की आयकर कर देयता बहुत कम है।
1 अप्रैल 2017 से 5 अगस्त 2017 के बीच 2.83 करोड़ नए आयकर दाताओं ने टैक्स रिटर्न भरा। इनमें से 2.03 करोड़ ऐसे व्यक्ति, कंपनी या संस्थाएं हैं जिनकी आय 5 लाख या उससे कम ही है। 

अमित माहेश्वरी, माहेश्वरी एसोसिएट, का कहना है कि नए करदाताओं के अधिकांश से कोई कर नहीं मिलने वाला है। नए करदाताओं की औसत आय 2.7 लाख होती है जो 2.5 लाख तक कर माफी की सीमा से थोड़े ही ऊपर हैं। इस तबके की आमदनी बढ़ने के साथ साथ कर वसूली बढ़ सकती है। 
2016-17 में 2.27 करोड़ लोगों ने आयकर रिटर्न भरा था। इस साल 5 अगस्त तक 2.83 करोड़ लोगों ने रिटर्न भरा है। 2016-17 में 9.9 फीसदी आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या बढ़ी थी। 2017-18 में 24.7 फीसदी की दर से संख्या बढ़ी है।
5 लाख से अधिक की आमदनी वाले लोगों की संख्या भी देखिये। इस वित्त वर्ष में 76.49 लोगों ने 5 लाख से अधिक सालाना आमदनी का रिटर्न भरा है। नोटबंदी के दौरान दिए गए भाषणों में प्रधानमंत्री ने कहा था कि रिटर्न भरने वालों में सिर्फ 24 लाख लोग हैं जिनकी आमदनी 10 लाख से अधिक है। क्या ऐसा हो सकता है? इसका जवाब नहीं मिला कि नए करदाताओं में कितने नए लोग ऐसे हैं जिनकी आमदनी 10 लाख से अधिक है। इस साल अप्रैल-जुलाई के बीच प्रत्यक्ष कर संग्रह 19.2 प्रतिशत बढ़ा है। 
फरवरी महीने में बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने कहा था कि भारत में प्रत्यक्ष कर का संगर्ह ख़र्च के अनुपात में नहीं है। 76 लाख लोग 5 लाख से ऊपर की सालाना आमदनी पर आयकर भरते हैं। इनमें से 56 लाख वेतनभोगी लोग हैं। स्वरोज़गार वाले अभी भी बड़ी संख्या में कर नहीं दे रहे हैं। 
आंकड़ों के अनुसार एक अप्रैल से पांच अगस्त के बीच केवल 45,430 व्यक्तियों ने ई रिटर्न फाइल किया है, जिनकी आमदनी साल में एक करोड़ या उससे अधिक है। 2012-13 में एक करोड़ से अधिक आय वाले 5,430 लोगों ने ही ई रिटर्न भरा था। करोड़पतियों की संख्या तो बढ़ी है। मगर नीचे के स्तर पर देखिये तो आमदनी और आयकर की दूसरी तस्वीर नज़र आएगी।
SOURCE

आज के प्राइम टाइम में रविश कुमार इन 5 तरह से दे सकते है सरकार को करारा जवाब !

0


​एनडीटीवी समूह के सह संस्थापक प्रणव राॅय के ठिकानों पर सीबीआई द्वारा रेड किये जाने के बाद सोशल मीडिया का बाजार गर्म है. लोगों में चर्चा है की समूह के संपादक रवीश कुमार इस हमले का जवाब अपने चर्चित प्रोग्राम प्राइम टाइम में किस तरह देंगे.

इसी बीच हम आपको ऐसे 5 तरीके बता रहे है जो रविश कुमार आज प्राइम टाइम शो में इस्तेमाल कर सकते है .

1- ब्लैक स्क्रीन

Ndtv पर लगे 1 दिन के बैन पर रविश कुमार ने टीवी स्कीन ब्लैक कर विरोध जताया था . इसी तरह आपातकाल के दौरान इंदिरा के नीति से परेशान होकर इंडियन एक्सप्रेस ने अपने अखबार का पहला पेज़ काला कर विरोध जताया था. शायद यही तरीके को रवीश कुमार अपना सकते हैं।

2- दूसरे चैनलों की तरह एनडीटीवी गोद में नहीं बैठेगा:रवीश

रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पेज़ पर जवाब देते हुए कहा है की एनडीटीवी ऐसे ही नहीं बना है. हम सरकार के गोद में बैठकर गोदी पत्रकारिता कतई नहीं करेगे. इस जवाब के बाद यह कयास लगाए जा रहे है की रविश अपने शो में इस मुद्दे को भी उठा सकतें हैं।

3- सरकार को दे सकतें है ओपेन चैलेंज !

कयास लगाए जा रहे है कि रविश कुमार अपने शो में सरकार को ओपन चैलेंज दे सकते है. इस चैलेंज में रविश कुमार केज सकते है कि सारी जांच एजेंसी (सीबीआई, ईडी और आईबी) आपके हाँथ में है . जांच करें , सबूत एकत्रित करें और कार्यवाही करें. पर NDTV झुकने वाला नही है .

4- वन टू वन डीबेट

इस मुद्दे पर रवीश बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं से वन टू वन डीबेट कर सकतें हैं. भाजपा द्वारा मीडिया पर किये जा रहे हमले पर आपातकाल के दौरान वाजपेयी जी के भाषण का उदाहरण दे सकते है .

5.CBI छापे की पूरी जानकारी दे सकतें हैं।

आज के प्राइम टाइम में रविश कुमार प्रणव राॅय के अवास पर हुई सीबीआई रेड की पूरी जानकारी दे सकतें है. जैसे –

सीबीआई की रेड के पिछे सरकार की क्या मंशा थी ? 

सीबीआई किस तरह सरकार की कठपुतली की तरह काम कर रही है ? 

इस छापे से सीबीआई को क्या क्या सबूत मिले ?

कुछ भी हो , आज का प्राइम टाइम धमाकेदार होना वाला है .