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मिर्ज़ापुर के पूर्व सांसद बाल कुमार पटेल सपा छोड़ कांग्रेस में हुए शामिल

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समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और मिर्ज़ापुर लोकसभा से संसद रहे बाल कुमार पटेल ने आज समाजवादी पार्टी छोड़ कांग्रेस का हाँथ थाम लिया। पटेल को कांग्रेस की सदस्यता दिलवाते समय कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, महासचिव प्रियंका गांधी, प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर और महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया मौजूद थे।

कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पटेल का पार्टी में स्वागत करते हुए ट्विटर पर लिखा “मिर्जापुर से सपा सांसद रहे बाल कुमार पटेल जी आज कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी जी महासचिव प्रियंका गांधी जी व यूपी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर जी के समक्ष कांग्रेस परिवार में सम्मलित हुए-यूपी में आपके साथ से कांग्रेस के हाथ को और अधिक मज़बूती मिलेगी।”

सूत्रों के अनुसार कांग्रेस बाल कुमार पटेल अब कांग्रेस की टिकट पर मिर्ज़ापुर से अपना दल की अनुप्रिया पटेल के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे।

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मायावती के तंज पर प्रियंका का जवाब, बोली हम चुनाव लड़ रहे है..

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बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा कांग्रेस पर किये गए तंज पर अब कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने पलटवार किया है। प्रियंका ने मायावती पर पलटवार किया है।

दरअसल बसपा सुप्रीमो मायावती ने आज मीडिया से बात करते हुए कांग्रेस पर तंज कसा था और कहा था कि ” कांग्रेस पार्टी उत्तरप्रदेश में 7 सीटें भी क्यों छोड़ रही है, उसे सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहिए। सपा-बसपा और आरएलडी का गठबंधन भाजपा को हराने के लिए काफी है।”

मायावती के इस बयान को कांग्रेस को लेकर उनके गुस्से के तौर पर देखा जा रहा था। जानकारों का कहना है कि जिस तरह कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश में अपनी सक्रियता बड़ाई है और जिस तरह प्रियंका गांधी ने भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद से मुलाकात की तजि उससे मायावती को अपने वोट बैंक पर खतरा नजर आ रहा है।

प्रियंका ने मायावती के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि सपा-बसपा गठबंधन भाजपा को हराने के लिए काफी है। हम अकेले चुनाव लड़ रहे है, हमें किसी को परेशान नही करना है। हमारा उद्देश्य भाजपा को हराना है और उनका उद्देश्य भी भाजपा को हराना है।

Live: मनैया घाट से शुरु हुई प्रियंका की गंगा यात्रा, देखें तस्वीरें

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कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी आज उत्तरप्रदेश के त्रिवेणी संगम से आज अपनी तीन दिन लंबी गंगा यात्रा की शुरुआत करेंगी। प्रियंका की यह यात्रा 3 दिन बाद वाराणसी स्थित अस्सी घाट पर खत्म होगी।

अपनी पहली चुनावी यात्रा में बीजेपी को घेरने के लिए वह पीएम मोदी के ‘चाय पे चर्चा’ की तर्ज पर ‘बोट पे चर्चा’ का आगाज करेंगी। इसके जरिए वह प्रयागराज के छात्रों के शिष्टमंडल से बात करेंगी। प्रयागराज से वाराणसी तक चुनाव यात्रा को ‘सांची बात, प्रियंका के साथ’ नाम दिया है। प्रियंका रविवार शाम को ही प्रयागराज पहुंच गईं जहां उन्होंने नेहरू-गांधी परिवार के पैतृक आवास आनंद भवन का दौरा किया।

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रॉबर्ट वाड्रा से ईडी ने पिछले तीन दिनों में 24 घंटे की पूछताछ

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हवाला से जुड़े एक मामले में सोनिया गांधी के दामाद और प्रियंका गांधी के पति रोबर्ट वाड्रा से ईडी की पूछताछ लगातार जारी है। आज भी रोबर्ट वाड्रा से ईडी के अफसरों ने घाटों पूछताछ की। समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार पिछले 3 दिनों में ईडी के अफसरों ने रोबर्ट वाड्रा से लगभग 24 घंटे पूछताछ की है।

महासचिव बनने के बाद पहली बार कांग्रेस दफ्तर पहुंचीं प्रियंका, रॉबर्ट वाड्रा पर बोलीं- दुनिया जानती है कि क्या हो रहा

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मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा से ईडी के दफ्तर में तीन अफसर सवाल- जवाब कर रहे है। अपने पति रॉबर्ट को ईडी दफ्तर के गेट पर छोड़कर प्रियंका वहां से सीधे कांग्रेस मुख्यालय पहुंची और पदभार संभाला। मुख्यालय पहुंची प्रियंका को वहां पत्रकारों ने घेर लिया। कांग्रेस महासचिव बनने पर उन्होंने कहा कि मैं बहुत खुश हूं कि राहुल जी ने ये जिम्मेदारी मुझे सौंपी है।

वहीं रॉबर्ट वाड्रा के सवाल पर प्रियंका ने कहा कि पूरी दुनिया को पता है कि क्या हो रहा है।
बता दें कि पेशी के लिए वाड्रा कल ही अमेरिका से लौटे हैं। वह लंदन में अपनी मां का इलाज करा रहे थे और फिर वहां से अमेरिका गए थे। मनी लॉन्ड्रिंग केस में वाड्रा को अग्रिम जमानत पर हैं।

वाड्रा ने गिरफ्तारी की आशंका के बाद पटियाला हाउस कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई थी। जिसपर कोर्ट ने 16 फरवरी तक गिरफ्तारी से राहत भी दी है। वाड्रा मोदी सरकार पर बदने की भावना से कार्रवाई का आरोप लगा रहे हैं तो बीजेपी कानून के राज की दुहाई दे रही है।

प्रियंका गांधी के पती रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ लंदन में संपति खरीद में मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है। यह प्रॉपर्टी 19 लाख पाउंड में खरीदी गई है। आरोपों के अनुसार भगोड़े हथियार कारोबारी संजय भंडारी ने इस प्रॉपर्टी को खरीदी और 2010 में इसे इसी कीमत पर वाड्रा को बेच दी। ईडी ने हाल में ही वाड्रा के सहयोगी मनोज अरोड़ा को गिरफ्तार किया था। इसी गिरफ्तारी के बाद वाड्रा पर शिकंजा कसने की अटकलें लगाई जा रही थीं।

11 फरवरी को इस शहर में रोड शो कर मिशन 2019 का आगाज करेंगी प्रियंका

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सक्रिय राजनीति में धमाकेदार एंट्री करने के बाद अब प्रियंका गांधी अब मिशन 2019 के लिए चुनाव प्रचार शुरु करने वाली है। मंगलवार को भाई राहुल गांधी के घर उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की बैठक में शिमिल हुई प्रयंका ने आगामी चुनाव के लिए रणनीति पर चर्चा की।

सूत्रों के अनुसार प्रियंका मिशन यूपी की शुरुआत लखनऊ में एक बड़े रोडशो के साथ करेंगी। जिसके लिए कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी फरवरी को लखनऊ पहुंचेंगी।

मिली जानकारी के अनुसार लखनऊ में प्रियंका गांधी सबसे पहले कांग्रेस मुख्यालय में पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करेंगी। जानकारों के अनुसार प्रियंका का यह रोडशो 2019 के लोकसभा चुनाव का आगाज होगा।

इससे पहले तक माना जा रहा था कि 10 फरवरी को प्रियंका लखनऊ जाएंगी, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के घर पर मंगलवार शाम को हुई बैठक में तय हुआ कि मिशन यूपी की शुरुआत प्रियंका 11 फरवरी से करेंगी।

प्रियंका गांधी के इलाहाबाद में 10 फरवरी को ही कुंभ में डुबकी लगाने की भी खबरें थीं, लेकिन अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है।

मंगलवार को ही प्रियंका गांधी वाड्रा ने औपचारिक रूप से कांग्रेस की पहली बैठक में हिस्सा लिया। जिसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा कुछ और वरिष्ठ कांग्रेस नेता मौजूद रहे।

कांग्रेस महासचिव के रूप में ताजपोशी के बाद राहुल के साथ प्रियंका ने पहली बार उत्तर प्रदेश में आगे की रणनीति बनाई। प्रदेश में वेंटिलेटर पर पड़ी कांग्रेस को प्रियंका के आने के नई ताकत मिली है और कार्यकर्ताओं में जोश आ गया है। उन्हें उम्मीद है कि भाई-बहन की इस जोड़ी से वे एक बार फिर दिल्ली में सरकार बनाएंगे। इसी जोश का परिणाम है कि उत्साही कार्यकर्ता उन्हें कई बार पोस्टर में दुर्गा के रूप में दिखा चुके हैं।

इस बैठक से ठीक पहले प्रियंका ने राहुल के घर के पीछे स्थित झुग्गी में पहुंचकर सभी को चौंका दिया। मंगलवार शाम को प्रियंका बैठक से पहले झुग्गी बस्ती में एक दिव्यांग बच्चे से मिलने पहुंची थीं। उन्होंने बच्चे से वादा किया है कि वे उसकी हर संभव मदद करेंगी। प्रियंका का ये अंदाज नया नहीं है। अपनी मां और भाई के संसदीय क्षेत्र अमेठी और रायबरेली में भी जब वे जाती हैं तो ऐसे ही आम लोगों की तरह उनसे बातें करतीं हैं। प्रियंका का यही अंदाज उन्हें खास बनाता है। प्रियंका के इस रूप को देखकर ही लोग उनमें उनकी दादी इंदिरा गांधी का अक्स देखते हैं।

अगर प्रियंका गांधी प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ बनारस से चुनाव लड़ेंगी तो क्या होगा ?

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राजनीति में प्रियंका गांधी की औपचारिक सक्रियता की घोषणा के बाद भी उनके बारे में अटकलों का दौर खत्म नहीं हुआ है। प्रियंका को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी महासचिव बनाने के अलावा उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी भी नियुक्त किया है। पूर्वांचल का प्रभार प्रियंका गांधी को देने के बाद से यह अटकल जोर पकड़ रही है कि वे लोकसभा चुनावों में वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ सकती हैं।

वाराणसी या बनारस को पूर्वांचल की राजनीति का केंद्र माना जाता है। यहां की राजनीति का असर न सिर्फ पूर्वांचल बल्कि बिहार की कुछ लोकसभा सीटों पर भी होता है। यही वजह थी कि 2014 में नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए बनारस की सीट को चुना था। पूर्वी उत्तर प्रदेश की 40 लोकसभा सीटों में से अधिकांश पर भारतीय जनता पार्टी को 2014 में कामयाबी हासिल हुई थी। भाजपा ने नरेंद्र मोदी के बनारस से लोकसभा चुनाव लड़ने को इसकी एक प्रमुख वजह के तौर पर पेश किया था।

इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रियंका गांधी को बनारस से चुनाव लड़ाने की बात चल रही है। इस बारे में बनारस के कांग्रेस पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने भी प्रियंका गांधी से औपचारिक अपील करके उनसे इस सीट से चुनाव लड़ने का आग्रह किया है। बनारस के कुछ कांग्रेस नेताओं की मानें तो आने वाले दिनों में यहां के कुछ प्रबुद्ध लोगों और मुस्लिम समाज की ओर से भी प्रियंका गांधी से लोकसभा चुनाव लड़ने की अपील की जा सकती है।

कांग्रेस आलाकमान की ओर से अब तक ऐसा संकेत नहीं दिया गया है कि प्रियंका गांधी बनारस से चुनाव लड़ सकती हैं। लेकिन, जमीनी स्तर से जो सूचनाएं मिल रही हैं उनसे यही लगता है कि पार्टी इसकी तैयारी पूरी कर रही है कि अगर प्रियंका गांधी को चुनाव लड़ना पड़े तो उस वक्त कोई दिक्कत नहीं आए।

ऐसे में सवाल उठता है कि अगर प्रियंका गांधी वाराणसी लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ती हैं तो इसके क्या राजनीतिक मायने होंगे। इससे पूरे चुनावी परिदृश्य पर क्या असर पड़ सकता है? जो लोग बनारस से प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की वकालत कर रहे हैं, उनका कहना है कि इससे न सिर्फ पूरे पूर्वांचल और उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर सकारात्मक असर पड़ेगा बल्कि पड़ोसी राज्यों में भी पार्टी को इससे फायदा मिलेगा।
उत्तर प्रदेश और बिहार, दोनों राज्यों में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा संकट यही है कि उसके कार्यकर्ताओं की संख्या लगातार घटी है और नतीजतन पार्टी का सांगठनिक ढांचा कमजोर हुआ है। जो लोग पार्टी में हैं भी, वे भी सिर्फ पार्टी के नाम पर चुनावी जीत हासिल करने की उम्मीद कम ही रखते हैं। स्थानीय नेताओं के मुताबिक ऐसे में प्रियंका गांधी के मैदान में उतरने की खबर भर से जमीनी कार्यकर्ताओं में उत्साह का जो माहौल बना है वह उनके वाराणसी से चुनावी मैदान में उतरने से और तेजी से बढ़ सकता है।

प्रियंका गांधी के नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनावी मैदान में उतरने का दूसरा असर यह होगा कि राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी बनाम प्रियंका गांधी का विमर्श खड़ा हो जाएगा। कांग्रेस इस विमर्श को आगे नहीं भी बढ़ाना चाहेगी तब भी यह विमर्श चल पड़ेगा। इससे भाजपा और उसके सहयोगी दलों का वह विमर्श फीका पड़ सकता है जिसमें वे 2019 के लोकसभा चुनावों को नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी करके विकल्पहीनता को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाते हुए नरेंद्र मोदी के पक्ष में गोलबंदी करना चाहते हैं। नरेंद्र मोदी के सामने प्रियंका गांधी के उतरते ही आम लोगों में चाहे-अनचाहे यह संदेश चला जाएगा कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ राहुल गांधी के अलावा प्रियंका गांधी भी एक सशक्त विकल्प हैं।

वाराणसी से नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रियंका गांधी के चुनाव में उतरने का एक असर यह भी हो सकता है कि मोदी को वाराणसी में ही उलझाकर रखने के मकसद से सपा-बसपा गठबंधन इस सीट पर अपना उम्मीदवार न उतारे। पहले भी इस गठबंधन ने राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी में और सोनिया गांधी के खिलाफ रायबरेली में उम्मीदवार न उतारने की घोषणा कर दी है। ऐसे में अगर प्रियंका बनारस से चुनाव लड़ती हैं और सपा-बसपा अपना उम्मीदवार नहीं उतारते हैं तो नरेंद्र मोदी के लिए यह सीट आसान नहीं रहेगी। तब नतीजा किसी भी ओर जा सकता है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो प्रियंका गांधी अगर बनारस से लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के खिलाफ उतरती हैं तो इससे न सिर्फ इस सीट पर रोचक चुनावी संघर्ष देखने को मिलेगा, बल्कि इसका असर पूरे उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा।

(सत्याग्रह के लिए हिमांशु शेखर द्वारा लिखे गए आलेख के संपादित अंश साभार)

लोकसभा चुनाव : मोदी और भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बनीं यह तीन महिलाएं

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Priyanka gandhi Mayawati and mamata banerjee

लोकसभा चुनाव को लेकर मोसम जमने लगा है। वार- जलटवार और आरोप- प्रत्यारोप का सिलसिला भी शुरु हो चुका है। भाजपा अपना लोकसभा चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के चहरे पर लड़ने वाली है तो वही विपक्ष संगठित रूप से चुनाव में उतरने वाला है। 2014 के चुनाव में भाजपी की जीत के पीछे महंगाई जैसे मुद्दे पर महिलाओं का समर्थन की अहम भूमिका थी। इस चुनाव में जहां विपक्ष के पास कई बड़े मिहिला चहरे हैं तो वहीं भाजपा के पास महिला चहरों की कमी दिखाई देगी। भाजपा के पास जो लोकप्रीय और आक्रमक महिला नेता 2014 में थी, वह या तो इस लोकसभा चुनाव में उतरेंगी नही या फिर उनका प्रभाव पिछली बार की तरह नही होगा। सुषमा स्वराज पहले ही अगला चुनाव लड़ने से इंकार कर चुकी है तो स्मृती इरानी पिछला चुनाव हार चुकी है। वहीं उमा भारती का कद भी अब पहले जितना नही रहा। ऐसे में जब चुनाव अभीयान के दौरान विपक्ष की महिला नेता जब प्रधानमंत्री और भाजपा पर सीधा हमला बोलेंगी तो भाजपा को मजबूत और लोकप्रीय महिला नेताओं की कमी जरूर खलेगी।

वहीं विपक्ष की बात करें तो प्रियंका की एंट्री ने कांग्रेस को नई जान दे दी है। राहुल ने भी प्रियंका गांधी को राष्ट्रीय महासचिव बनाकर और महत्वपूर्ण पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी देकर अपने इरादे साफ कर दिया हैं। उधर दो अन्य दिग्गज महिला नेता भी इस चुनाव में भाजपा को चुनौती देने को तैयार हैं। ये हैं पश्‍चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी चीफ ममता बनर्जी और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती। ये दोनों नेका मोदी और एनडीए गठबंधन को सत्ता से हटाने के लिए एकजुट होते दिख रहे हैं, हालांकि अभी कोई औपचारिक ऐलान होना बाकी है।

बीजेपी छोड़ चुके वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा कहते हैं कि विपक्ष के पास बीजेपी से ज्यादा मजबूत महिला नेतृत्व है। जनता अगले आम चुनाव में इस नेतृत्व को वोट करेगी और खासतौर पर महिलाओं का समर्थन मिलेगा। बीजेपी के लिए यह परेशान होने का वक्त है, खासतौर पर तीन हिंदीभाषी राज्यों के विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद।

प्रियंका की राजनीति में औपचारिक एंट्री पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जमकर जश्‍न मानाया था। तमाम वरिष्ठ नेताओं ने इसे स्वागतयोग्य फैसला बताया है। हालांकि मायावती और ममता के पास प्रियंका से कहीं ज्यादा अनुभव है और माना जा रहा है कि दोनों अगले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का चेहरा हो सकती हैं।

मायावती ने जहां उत्तर प्रदेश में अपने सबसे बड़े विरोधी दल समाजवादी पार्टी से पुरानी ’दुश्मनी’ भुलाकर गठबंधन किया, वहीं दूसरी ओर ममता ने पिछले महीने ही कोलकाता में संयुक्त विपक्ष रैली का आयोजन किया था। जिसमें लगभग सभी बड़े विपक्षी दलों के नेता या उनके प्रतिनिधि पहुंचे थे। हालांकि ममता की इस रैली में खुद बीएसपी सुप्रीमो मायावती के ना आने और अपनी जगह अपने प्रतिनिधि सतीश चंद्र मिश्रा को भेजने पर कई तरह के कयास भी लगे।

महिलाओं के लिए मोदी सरकार मे शुरु की कई योजनाएं लोकिन महंगाई पर नही कर पाए काबू
कई ऐसी महिलाओं के हित की योजनाएं हैं जो मोदी सरकार ने ही शुरू कीं। मोदी सरकार ने ’बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का नारा दिया, उज्ज्वला योजना के जरिए ऐसे करोड़ों घरों में मुफ्त गैस कनेक्शन पहुंचाए जहां आज तक महिलाएं चूल्हे पर खाना पकाती थीं। इसके अलावा स्वच्छ भारत मिशन के तहत बने लाखों शौचालयों से भी सबसे ज्यादा महिलाओं को ही लाभ हुआ है। इस सभी योजनाओं के बावजूद मोदी सरकार महंगाई को काबू करने में पूरी तरह से नाकामयाब रही। मोदी की 26 सदस्यीय कैबिनेट में छह महिलाएं हैं और सबसे महत्वपूर्ण पांच सदस्यीय कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी में भी दो महिलाएं (विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण) हैं।

कांग्रेस परिवार के करीबी नेताओं की मानें तो प्रियंका महिलाओं, युवाओं और फर्स्ट टाइम वोटर्स को लुभा सकती हैं। प्रियंका की औपचारिक एंट्री भले ही 2019 में हुई हो, लेकिन वह पिछले करीब 20 सालों से अपने भाई राहुल गांधी और मां सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्रों अमेठी और रायबरेली में चुनाव प्रचार के दौरान अहम भूमिका निभाती आई हैं।

बीएसपी प्रवक्ता सुधींद्र भदौरिया ने कहा कि मायावती का महिला होना कभी उनकी नेतृत्व क्षमता के आड़े नहीं आया। उन्होंने कहा, ’मायावती ने पार्टी को जमीन से उठाकर इस मुकाम तक पहुंचाया है। महत्वपूर्ण बात है कि उन्होंने महिलाओं, दलितों, पिछड़ी जातियों को एकजुट किया है। वह एक राष्ट्रीय नेता हैं।’ ममता बनर्जी वही नेता हैं, जिन्होंने 34 साल पुरानी वामपंथी सरकार को 2011 के विधानसभा चुनाव में पश्‍चिम बंगाल से उखाड़ फेंका था। वह अपनी सादगी और तेज-तर्रार राजनीतिक लहजे से अलग पहचान बनाती हैं। वह अकसर बीजेपी पर सांप्रदायिकता का आरोप लगाकर देश में एक सेक्युलर सरकार की जरूरत पर जोर देती रहती हैं।

भाजपा विधायक का विवादित बयान, राहुल को ‘रावण’ और प्रियंका गांधी को बताया ‘शूर्पणखा’

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सक्रिय राजनीति में प्रियंका गांधी के प्रवेश पर नेताओं के अलग-अलग बयान सामने आ रहे हैं। कोई कांग्रेस के इस फैसले की आलोचना कर रहा है तो कोई इसे सही कदम बता रहा है। इसी बाच उत्तर प्रदेश के बलिया से भाजपा विधायक ने तो आलोचना की सीमा ही लांघ दी और प्रियंका गांधी वाड्रा को रामायण की शुर्पणखा बता दिया। भाजपा विधायक सुरेन्द्र सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को ‘रावण’ और उनकी बहन प्रियंका गांधी को ‘शूर्पणखा’ बताया है।

बैरिया से भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह ने एक सवाल पर कहा कि कांग्रेस एक टूटी हुई नौका हो चुकी है और वह केवल एससी-एसटी एक्ट के कारण राजस्थान और मध्य प्रदेश में जीत गई। आप जानते हैं कि जब राम और रावण का युद्ध होने वाला था तो पहले रावण ने अपनी बहन शूर्पणखा को भेजा था। राम की भूमिका में मोदी हैं और रावण की भूमिका में राहुल हैं जिन्होंने अपनी बहन शूर्पणखा को उतारा है। मान कर चलिये कि लंका विजय हो गयी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मोदी फिर से भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे।

सुरेंद्र यहीं नही रुके, उन्होने आगे कहा कि भारत की राजनीति की लंगोट हैं पीएम मोदी। बता दें कि सुरेंद्र सिंह पहले भी अपने बयानों को लेकर विवादों में घिर चुके हैं। इससे पहले बिहार में भाजपा के मंत्री ने भी प्रियंका गांधी पर विवादित बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि खूबसूरत चेहरों के दम पर वोट नहीं जीते जा सकते।

बिहार के मंत्री विनोद नारायण झा ने प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस महासचिव बनाए जाने पर कहा, खूबसूरत चेहरों के दम पर वोट नहीं जीते जा सकते। इससे भी बढ़कर तथ्य यह है कि वह रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी हैं, जिन पर भूमि घोटाले और भ्रष्टाचार के कई मामलों में शामिल होने का आरोप है। वह बेहद खूबसूरत हैं, लेकिन उसके अलावा उनकी कोई राजनैतिक उपलब्धि नहीं है।

दरअसल, यूपी में प्रियंका को पूर्वी यूपी की कमान सौंपने के फैसले को लोकसभा चुनाव और 2022 के विधानसभा चुनाव के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है। अब यह चर्चा तेज हो गई है कि प्रियंका के आने से यूपी में त्रिकोणीय मुकाबला हो गया है। पहले सपा-बसपा और सीधे बीजेपी के बीच लड़ाई थी, मगर अब चुनावी जंग में कांग्रेस वापस आ गई है।

जानें आखिर क्यों प्रियंका गांधी को मिली सिर्फ पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी ?

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सक्रिय राजनीती में प्रियंका गाँधी के प्रवेश के बाद उत्तरप्रदेश के साथ ही देश की राजनीती का परिदृश्य तीजी से बदल रहा है। प्रियंका के आने से जहां कांग्रेस के हौसले बुलंद है तो वहीं भाजपा के साथ ही सपा-बसपा गठबंधन भी अब कांग्रेस के इस मास्टर स्ट्रोक के जवाब तलाश करने में लग गए हैं। ऐसे में एक सवाल सबके अंदर उठ रहा है कि आखिर प्रियंका को देश और उत्तर प्रदेश की जगह पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित क्यों रखा गया।

लोग एक सवाल और पूछ रहे हैं कि अगर प्रियंका को सियासत में आना ही था तो कांग्रेस ने माहौल क्यों नहीं बनाया? जिसे गांधी परिवार का सबसे बड़ा गेमचेंजर माना जा रहा था, उसकी सियासी एंट्री की घोषणा एक पन्ने की प्रेस विज्ञप्ति से हुई और उस पन्ने पर भी केसी वेणुगोपाल को संगठन महासचिव बनाने को ज्यादा प्रमुखता दी गई थी।

उस दिन राहुल गांधी अपने हर भाषण में ऐसे बोलते रहे जैसे प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया का कद कांग्रेस में बराबर हो। पार्टी के एक बुजुर्ग नेता प्रियंका की टाइमिंग पर नहीं कांग्रेस के रवैये पर शक जताते हुए पूछते हैं कि सबसे बड़ा धमाका करने से पहले पार्टी थोड़ी तैयारी करती तो अच्छा होता। संजय गांधी को महासचिव बनाने से पहले भी माहौल बनाया गया था। उनके निधन के बाद राजीव सियासत में आए तो माहौल गमगीन था फिर भी मीडिया को खबर दी गई थी। जब राहुल गांधी पहले महासचिव और फिर अध्यक्ष बनाए गए तो उनको भी तरजीह मिली। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी गांधी के नाम का एलान प्रेस विज्ञप्ति में पांचवी लाइन में किया गया है।

कांग्रेस की मीडिया टीम से जुड़े एक नेता एक अजीब ही बात कहते हैं – ‘पिछले कुछ दिनों में अचानक एक परिवर्तन तेजी से हुआ है। अगर प्रियंका गांधी को ताकतवर बनाना ही था तो उनकी टीम क्यों कमजोर की जा रही है। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला प्रियंका गांधी के बेहद खास माने जाते हैं। लेकिन इधर प्रियंका गांधी के नाम का ऐलान हुआ है और उधर वे हरियाणा के जिंद से विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। जबकि वे पहले से ही विधायक थे। कांग्रेस में कोई तो ऐसा है जो नहीं चाहता कि प्रियंका गांधी पावरफुल हो जाएं।’

भाजपा के नेताओं के पास जब बुधवार की दोपहर खबर पहुंची कि प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है तो उसके भी बड़े-बड़े नेता चौंक गए। एक नेता ने हैरान होते हुए अपने एक करीबी से कहा – ‘कांग्रेस की यही समस्या है। या तो ये बिना ज्यादा सोचे-समझे लिया गया फैसला है या फिर कुछ ज्यादा ही सोचा गया है। अगर प्रियंका गांधी को सियासत में लाना ही था तो उत्तर प्रदेश के एक इलाकाई नेता की तरह क्यों लाए। कम से कम पूरे उत्तर प्रदेश का इंचार्ज बनाते। प्रेस विज्ञप्ति में ये लिखने की क्या जरूरत थी कि प्रियंका सिर्फ पूर्वी उत्तर प्रदेश ही देखेंगी।

प्रियंका गांधी कहां से चुनाव लड़ेंगी इस पर भी सस्पेंस कायम है। कांग्रेस के ताकतवर नेताओं से जब इस बारे में जानना चाहा तो पता चला कि राहुल गांधी रायबरेली जा सकते हैं और प्रियंका गांधी अमेठी से चुनाव लड़ सकती हैं। वैसे प्रियंका की टीम बताती है कि मैडम अभी चुनाव नहीं लड़ना चाहतीं। वे पूरी तरह पूर्वांचल पर फोकस करना चाहती हैं।

उत्तर प्रदेश के कम से कम आधे दर्जन ऐसे नेता हैं जो अपने ड्राइंग रूम में बरसों से सोनिया और राहुल के साथ प्रियंका गांधी की तस्वीर लगाये बैठे थे। इनमें से कई नेता प्रियंका के सक्रिय राजनीति में इस तरह से आने से उतने हैरान-परेशान नहीं हैं। इन्हें लगता है कि 1984 के बाद से पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस धीरे-धीरे कमजोर होती गई है। लेकिन अगर प्रियंका ने वहां अपनी पूरी ताकत झोंक दी तो उसे ज़िंदा किया जा सकता है।

प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ-साथ अवध की भी जिम्मेदारी मिली है मतलब कि कुल मिलाकर 42 सीटें उनके पास हैं। 2014 में कांग्रेस इनमें से सिर्फ दो सीटें – अमेठी और रायबरेली ही – जीत पाई थी। लेकिन 2009 में उसे इनमें से 15 सीटें मिली थीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को पूर्वी उत्तर प्रदेश और अवध में 10 फीसदी वोट मिले थे, जबकि पश्चिम उत्तर प्रदेश में उसे सिर्फ पांच फीसदी वोटों से ही संतोष करना पड़ा था। अगर इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो प्रियंका गांधी को पूर्वांचल में सोच-समझकर लाया गया है। यहां की 42 में से 40 सीटें कांग्रेस के पास नहीं है लेकिन उसका पुराना वोट बैंक पूरी तरह खिसका नहीं है। 2009 में उसके इसी वोट बैंक ने चमत्कार करते हुए उसे 15 सीटें दिलवाई थीं।

कांग्रेस के पूर्वांचल के एक नेता कहते हैं प्रियंका गांधी के सियासत में आने का एलान भले ही धमाकेदार ना हुआ हो लेकिन लखनऊ में दस फरवरी को होने वाली रैली धमाका करेगी। प्रियंका की बड़े पर्दे पर एंट्री उसी दिन समझिए। अब तक कांग्रेस के कार्यकर्ता में ना जोश था, ना चुनाव जीतने का यकीन। 2017 के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी के नाम पर वोट मांग चुके हैं और हार भी चुके हैं। इस बार कुछ नया और अलग कहने को है। कांग्रेस के दफ्तर की खबर रखने वाले एक पत्रकार बताते हैं कि अगर 2014 में अमित शाह उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 सीटें जीतने का फॉर्मूला गढ़ सकते हैं तो प्रियंका गांधी भी ऐसा कर ही सकती हैं। इस बार आर या पार होगा। गांधी परिवार ने बंद मुट्ठी खोल दी है। अब ये मुट्ठी लाख की होगी या खाक की, उत्तर प्रदेश का वोटर तय करेगा। अगर राहुल गांधी की किस्मत में प्रधानमंत्री बनना लिखा है तो 2019 से बेहतर मौका नहीं मिलेगा और प्रियंका से बढ़िया कोई और नहीं जो कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश जीत सके।

इसीलिए पूरे देश में राहुल गांधी घूमेंगे और उत्तर प्रदेश – बल्कि उस पूर्वांचल को जहां से कांग्रेस को जीतने की सबसे ज्यादा उम्मीद है – प्रियंका गांधी संभालेंगी। राहुल गांधी ने अमेठी में अपने वोटरों से भी कुछ इसी अंदाज़ में कहा कि अब वे अमेठी कम ही आएंगे क्योंकि उन्हें बाकी जगहों पर भी ध्यान देना है। प्रियंका उत्तर प्रदेश में ही रहेंगी क्योंकि वे बाकी देश में अभी नहीं जाएंगी।

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