Home Tags Manmohan Singh

Tag: Manmohan Singh

मोदी सरकार के बजट को चुनावी स्टंट बताते हुए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किया बड़ा हमला

0

मोदी सरकार द्वारा पेश किए गए अंतरिम बजट को लेकर सियासत तेज हो गई है। विपक्ष बजट को लेकर मोदी सरकार पर लगातार हमले बोल रहा है। वहीं इसी बाच अब पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी मोदी सरकार द्वारा पेश किए गए अंतरिम बजट को चुनावी स्टेट बताते हुए हमला बोला है।

केंद्रीय वित्त मंत्री पीयूष गोयल द्वारा पेश किए गए अंतरिम बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए मनमोहन सिंह ने कहा कि यह बजट मई में होने वाले लोकसभा चुनावों पर प्रभाव डालेगा। इस बजट में सरकार ने मध्यम वर्ग, किसानों और ग्रामीण आबादी के लिए कई बड़ी घोषणाएं की हैं। यह एक चुनावी बजट है।

वहीं आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बजट को ‘अंतिम जुमला’ करार देते हुए कहा था कि कि इससे दिल्ली को निराशा ही हाथ लगी है। केंद्रीय करों में हमारा हिस्सा 325 करोड़ रुपये पर ही अटका रहा और स्थानीय निकायों के लिए कुछ भी आवंटित नहीं किया गया।

बता दें कि 5 लाख तक की आय वालों के लिए टैक्स में छूट की घोषणा करते हुए पीयूष गोयल ने कहा कि यह अंतरिम बजट नहीं है, बल्कि यह बजट देश के विकास का वाहक बनेगा। सरकार ने असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे 15 हजार तक की आय वाले कामगारों के लिए साठ साल की उम्र के बाद पेंशन की घोषणा भी की है।

दि ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर पर सियासत तेज, इन मशहूर हस्तियों ने तोड़ी चुप्पी

0

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब पर आधारित अनुपम खेर की फिल्म द ऐक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर पर सियासत खत्म होने का नाम नही ले रही है। फिल्म के ट्रेलर रिलीज होते ही इस विवाद की शुरुआत हुई जब भारतीय जनता पार्टी ने इसे अपने ऑफिशियल ट्रिटर हैंडल से शेयर किया। वहीं विवाद बढ़ते ही भाजपा-कांग्रेस के साथ कई मशहूर हस्तियां अब इस विवाद में कूद पड़ी है। फिल्म 11 जनवरी को रिलीज होनी है और लगता है कि उसके पहले सह विवाद थमने वाला नही है। कांग्रेस इस फिल्म को भाजपा की साजिश बता रही है तो भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि यह फिल्म डॅा मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार संजय बारू की किताब पर आधारित है, जब इस किताब पर उस समय विवाद नही हुआ तो अब क्यों?

आईए देखते है फिल्म पर अभी तक आई प्रमुख बयान

सुरजीत सिंह कोहली( मनमोहन सिंह के भाई )-

दुनिया मनमोहन सिंह की क्षमता को जानती है और कांग्रेस सरकार में उनके 10 साल के कार्यकाल में उनके काम को देखा है। मैं हैरान हूं कि कैसे कोई उनकी छवि खराब करने के बारे में सोच सकता है, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह विपक्ष का प्लान है कि लोकसभा चुनाव से पहले डॉक्टर सिंह को खराब नजरिए से पेश किया जाए। बीजेपी ने पीएम रहते हुए भी उनके स्वतंत्र अधिकारों को लेकर छवि खराब करने की कोशिश की थी। जब उन्हें कांग्रेस के खिलाफ कुछ नहीं मिला तो उन्होंने 2019 में सत्ता में आने के बाद डॉ साहब की छवि खराब करने की कोशिश की।

दलजीत सिंह कोहली(भाजपा में शामिल मनमोहन सिंह के भाई)-

देश के लिए उनकी सत्यनिष्ठा या उनके काम को लेकर कोई सवाल या शक किया ही नहीं जा सकता।

एच डी देवगौड़ा (पूर्व प्रधानमंत्री)-

‘मैं नहीं जानता किसने इसकी इजाजत दी और क्यों? सच कहूं तो मैं इस तथाकथित ‘एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ के बारे में नहीं जानता, बल्कि मुझे लगता है कि मैं भी ’एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ हूं’

अनुपम खेर (अभिनेता)-

केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड फिल्म को देख चुकी है और अब रिलीज से पहले किसी को देखने का हक नहीं, फिर भी मैं कहता हूं कि अगर डॉ. मनमोहन सिंह जी फिल्म को रिलीज होने से पहले देखना चाहेंगे तो हम सिर्फ उनके लिए ही इस बात पर तैयार हो सकते हैं।

कैप्टन अमरिंदर सिंह(पंजाब के मुख्यमंत्री)-

भाजपा ने जिस प्रकार फिल्म के ट्रेलर का उपयोग अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर कर रही है और इसे भाजपा के नेता प्रचारित कर रहे हैं, इससे उनकी निराशा साफ झलकती है। भाजपा ने जनसमर्थन खो दिया है। यही कारण है कि वह अब इस तरह की सस्ती राजनीति पर उतर आई है। डॉ. सिंह के कटु आलोचक भी कभी ऐसी गलती नहीं कर सकते थे, जैसे भाजपा कर रही है।

अहमद पटेल( वरिष्ट कांग्रेस नेता)-

यह तिकड़मबाजी से ज्यादा कुछ नहीं है। भाजपा के पास बहुत पैसा है और वह इस बात में व्यस्त है कि इसका दुरुपयोग कैसे किया जाए। वह जो करना चाहते हैं उन्हें करने दीजिए। ऐसी फिल्में आती-जाती रहती हैं, हम इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहते।’

जब इंदिरा गांधी ने कहा- मुझे चिंता नहीं मैं रहूं या न रहूं, मेरे खून का एक-एक कतरा देश को मजबूत करेगा

0

आज ही के दिन 31 अक्टूबर 1984 को आयरन लेडी कही जाने वाली पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उन्हीं के अंगरक्षकों द्वारा गोली मार ह्त्या कर दी गई थी. कहा जाता है कि इंदिरा गांधी को अपने मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था. यही कारण था कि 30 अक्टूबर की रात इंदिरा गांधी ठीक से सो भी नहीं पाई थी.

30 अक्टूबर का वो भाषण

भुवनेश्वर के परेड ग्राउंड में 30 अक्टूबर को एक चुनावी सभा के दौरान इंदिरा गांधी ने अपने सूचना सलाहकार एच वाई शारदा प्रसाद का लिखा हुआ भाषण पढ़ते हुए बीच में छोड़कर दूसरी बातें बोलना शुरू कर दी थीं. उस भाषण में आयरन लेडी ने कहा, ‘मैं आज यहां हूं. कल शायद यहां न रहूं. मुझे चिंता नहीं मैं रहूं या न रहूं. देश की चिंता करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है. मेरा लंबा जीवन रहा है और मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है. मैं अपनी आखिरी सांस तक ऐसा करती रहूंगी और जब मैं मरूंगी तो मेरे ख़ून का एक-एक क़तरा भारत को मजबूत करने में लगेगा.’

इंदिरा गांधी को आखिरी रात नींद नहीं आई

इंदिरा गांधी की बहू सोनिया गांधी के मुताबिक 30 अक्टूबर 1984 की रात इंदिरा जी को नींद नहीं आई थी. जब सोनिया गांधी अपने दमे की दवाई लेने के लिए रात को उठी तो इंदिरा गांधी जाग रही थीं. उन्होंने सोनिया की दवाई खोजने में सहायता भी की और कहा कि अगर रात में कोई दिक्कत हो तो आवाज देना.

राहुल, सोनिया और मनमोहन सिंह ने दी श्रद्धांजलि

इंदिरा गांधी के पुण्यतिथि पर राहुल गांधी,सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह समेत कई कोंग्रेसी नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी.

भारत के पहले और विश्व के 138 वें अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा से इंदिरा गांधी की बातचीत

40 दिन 40 सवाल: पंचायती राज और पिछड़े जिलों का दिवाला होने को लेकर कमलनाथ ने पूछा दसवां सवाल

0

40 दिन 40 सवाल पूछने के अभियान में कांग्रेस मध्यप्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने शिवराज सरकार से दसवां सवाल पूछा। अपने दसवें सवाल में कमल नाथ ने पंचायती राज और पिछड़े जिलों का दिवाला होने को लेकर किया।

सवाल नंबर दस

मोदी जी ने निकाला पंचायती राज और पिछड़े जिलों का दिवाला,
मामा क्यों डाला मुँह पर ताला ? शर्म करो शिवराज ।
मनमोहन जी के समय ‘धरना-धर’ और उपवास का स्वाँग,
अब क्यों नही उठाते बासमती की माँग ?

1) कांग्रेस सरकार ने पंचायती राज को सशक्त करने के लिए पंचायती राज मंत्रालय स्थापित किया था। मोदी सरकार ने नियोजित रूप से पंचायती राज का गला घोंट कर उसे समाप्त प्रायः कर दिया । इस मंत्रालय के 2014-15 के 7000 करोड़(BE) के बजट को 2015-16 में 94 करोड़(BE) कर दिया गया ।

2) इस मंत्रालय के तहत दो प्रमुख कार्यक्रम चलाए जाते थे।
पहला- देश के पिछड़े जिलों का विकास BRGF) और दूसरा पंचायतों को सशक्त करने के लिये राजीव गांधी पंचायत सशक्तिकरण अभियान (RGPSA)। मोदी सरकार ने दोनों कार्यक्रमों को 2015-16 के बाद बंद कर दिया।

More
3) कांग्रेस सरकार ने मध्यप्रदेश के 30 पिछड़े जिलों को आगे लाने के लिए पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि ( BRGF) कार्यक्रम 2006-07 से प्रारंभ किया था । जिसके तहत 2013 -14 तक मध्यप्रदेश पर 2995.59 करोड़ रु खर्च किए ।
4)अलीराजपुर ,अनूपपुर ,अशोकनगर,बालाघाट ,बड़वानी
,बैतूल,बुरहानपुर ,झाबुआ ,मंडला, टीकमगढ,डिंडोरी, श्योपुर इत्यादि पिछड़े 30 जिलों का अनुदान बंद ।

5) मोदी जी ने आने के बाद 2015 -16 से मध्यप्रदेश को यह(BRGF) अनुदान बंद कर दिया ।आखरी साल 2014 – 15 के लिए मोदी जी ने 647.20 करोड़ रु प्रावधानित किए ,मगर जारी किए सिर्फ़ 221.22 करोड़ और मामा जी ने ख़र्च किए मात्र 197.52 करोड़ ।

6) इसी प्रकार मध्यप्रदेश की पंचायतों के सशक्तिकरण के लिए राजीव गांधी पंचायत सशक्तिकरण अभियान को भी अनुदान बंद कर दिया । मोदी जी ने आखरी वर्ष 2015-16 में इस हेतु प्रावधानित किए मात्र 41.63 करोड़ और दिए सिर्फ़ 10.8 करोड़ ।

7)शिवराज जी फरवरी 2014 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी को पत्र लिखकर धरने पर बैठे थे कि मध्यप्रदेश के बासमती चावल की पहचान,जो जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) ने स्वीकारी है,को एपीडा द्वारा स्वीकारा नहीं जा रहा है।ये मध्यप्रदेश के किसानों के साथ कांग्रेस सरकार का अन्याय है

8) अब क्या हुआ मामा जी , जब मोदी सरकार ने फरवरी 2016 में आपकी मांग को ठुकरा कर आदेश दिया कि मध्यप्रदेश के किसान अपने चावलों को बासमती की पहचान नहीं दे सकेंगे ?

9) मध्यप्रदेश में 2 लाख़ हेक्टेयर के 13 जिलों,विदिशा ,सीहोर होशंगाबाद ,नरसिंहपुर ,जबलपुर, गुना ,शिवपुरी, ग्वालियर, दतिया ,भिंड ,श्योपुर, मुरैना,रायसेन के किसानों को मोदी जी ने कहा कि वे अपने चावल बासमती के नाम से नहीं बेच सकेंगे ।

10)मामा जी,मप्र के बासमती चावल उत्पादक किसानो के लिए अब धरने का स्वाँग भी नही करोगे?अब क्या मोदी सरकार से डर लगता है या कांग्रेस सरकार के समय दिखावा कर रहे थे?
सोर्स -केंद्रीय पंचायतीराज मंत्रालय,कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण
धरना-धर मामा का स्वाँग

40 दिन 40 सवाल-

“मोदी सरकार के मुँह से जानिए,
मामा सरकार की बदहाली का हाल।”

“हार की कगार पर, मामा सरकार”

राहुल गांधी के गुरूद्वारे जाने से क्या ‘सिख दंगे’ का दाग धुल जाएगा ?

0

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी दो दिन के लिए मध्य प्रदेश दौरे पर हैं जहा पर उन्होंने मंदिर, मस्जिद पर मत्था टेकने के बाद ग्वालियर के एक गुरुद्वारे पहुंचे। ये संयोग ही है कि जब भी राहुल गांधी गुरूद्वारे जाते हैं तो सिख दंगे का दाग उनका पीछा करता ही रहता है। यद्यपि राहुल गांधी नें इससे पीछा छुड़ाने के लिए सिख दंगो पर कई बार अपनी सफाई दे चुके हैं।

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए थे सिख दंगे

31 अक्टूबर 1984 को तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनके ही दो सुरक्षा गार्डों ने गोली मार कर हत्या कर दी थी। ह्त्या के 24 घंटे के भीतर पुरे भारत का इतिहास ही बदला गया। जगह-जगह पर हिंसा की ख़बरें आने लगी। हिंसा की चपेट में सबसे ज्यादा दिल्ली के आसपास इलाकों में करीब 3000 लोग मारे गए थे।

यह दाग बहुत ही गहरे हैं

यद्यपि राहुल गांधी इस बात को लेकर कितना भी इंकार कर दें लेकिन इस सच्चाई को नाकारा नहीं जा सकता। सिख दंगे के दाग से जगदीश टाइटलर और सज्जान कुमार जैसे कितने कांग्रेसी नेताओं का राजनीतिक कैरियर ही समाप्त हो गया। यही वजह है कि 21 साल बाद प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने संसद में माफ़ी मांगते हुए कहा था कि, ‘जो कुछ भी हुआ, उससे उनका सिर शर्म से झुक जाता है।’

कमलनाथ पर भी आरोप

वर्तमान मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ पर भी सिख दंगे के आरोप लगते रहते हैं। उनपर आरोप है कि दिल्ली के गुरुद्वारा रकाबगंज में हुई हिंसा में कमलनाथ यदि वहां रक्षा करने पहुंचे थे, तो उन्होंने वहां आग की चपेट में आए सिखों की मदद क्यों नहीं की। वहां पर उनकी मौजदूगी का जिक्र पुलिस रिकॉर्ड में भी है।

दंगों की तपिश आज भी जहन में

सिख दंगे हुए लगभग तीन दशक से ज्यादा हो चुके हैं लेकिन आज भी कई ऐसे सिख परिवार इस दर्दनाक घटना से उबर नहीं पाए हैं। आज भी कई ऐसे परिवार हैं जो दंगे का भयावह तस्वीर याद कर जिसमें अपनों को मरते हुए देखा था वो भुला नहीं पाते। इन दंगों में हजारों लोगों की जानें गई थी और न जाने कितने घरों को जला दिया गया था।

प्रधानमंत्री जी से पूछिए तो कि वे भारत को विश्व गुरु बना रहे हैं या बेवकूफ बना रहे हैं ?

0

 

स्वीस नेशनल बैंक ने अपनी सालाना रिपोर्ट में बताया है कि 2017 में उसके यहां जमा भारतीयों का पैसा 50 प्रतिशत बढ़ गया है। नोटबंदी के एक साल बाद यह कमाल हुआ है। ज़रूरी नहीं कि स्विस बैंक में रखा हर पैसा काला ही हो लेकिन काला धन नहीं होगा, यह क्लिन चिट तो मोदी सरकार ही दे सकती है। मोदी सरकार को यह समझदारी की बात तब नहीं सूझी जब ख़ुद नरेंद्र मोदी अपने ट्विटर हैंडल से ट्विट किया करते थे कि स्विस बैंक में जमा काला धन को वापस लाने के लिए वोट करें। ऑनलाइन वोटिंग की बात करते थे।

सरकार को बताना चाहिए कि यह किसका और कैसा पैसा है? काला धन नहीं तो क्या लीगल तरीके से भी भारतीय अमीर अपना पैसा अब भारतीय बैंकों में नहीं रख रहे हैं? क्या उनका भरोसा कमज़ोर हो रहा है? 2015 में सरकार ने लोकसभा में एक सख्त कानून पास किया था। जिसके तहत बिना जानकारी के बाहर पैसा रखना मुश्किल बताया गया था। जुर्माना के साथ साथ 6 महीने से लेकर 7 साल के जेल की सज़ा का प्रावधान था। वित्त मंत्री को रिपोर्ट देना चाहिए कि इस कानून के बनने के बाद क्या प्रगति आई या फिर इस कानून को कागज़ पर बोझ बढ़ाने के लिए बनाया गया था।

इस वक्त दो दो वित्त मंत्री हैं। दोनों में से किसी को भारतीय रुपये के लुढ़कने पर लिखना चाहिए और बताना चाहिए कि 2013 में संसद में जो उन्होंने भाषण दिया था, उससे अलग क्यों बात कर रहे हैं और उनका जवाब मनमोहन सिंह के जवाब से क्यों अलग है। एक डॉलर की कीमत 69 रुपये पार कर गई और इसके 71 रुपये तक जाने की बात हो रही है। जबकि मोदी के आने से 40 रुपये तक ले आने का ख़्वाब दिखाया जा रहा था।

ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध को लेकर छप रही ख़बरों पर नज़र रखिए। क्या भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए स्वतंत्र राह पर चलेगा या अमरीका जिधर हांकेगा उधर जाएगा। टाइम्स आफ इंडिया की हेडिंग है कि निक्की हेले सख़्त ज़बान में बोल रही हैं कि ईरान से आयात बंद करना पड़ेगा। निक्की हेले संयुक्त राष्ट्र में अमरीकी राजदूत हैं और भारत की यात्रा पर हैं।

अमरीका चाहता है कि भारत ईरान से तेल का आयात शून्य पर लाए। ओबामा के कार्यकाल में जब ईरान पर प्रतिबंध लगा था तब भारत छह महीने के भीतर 20 प्रतिशत आयात कम कर रहा था मगर अब ट्रंप चाहते हैं कि एक ही बार में पूरा बंद कर दिया जाए।

इंडियन एक्सप्रेस में तेल मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का बयान छपा है। आप इस बयान पर ग़ौर कीजिए जिसका मैंने एक्सप्रेस से लेकर अनुवाद किया है। ऐसा लगता है कि तेल मंत्री ही विदेश मंत्री हैं और इन्होंने ट्रंप को दो टुक जवाब दे दिया है। अगर ऐसा है तो प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री को औपचारिक रूप दे देना चाहिए ताकि जनता को पता चले कि ईरान प्रतिबंध को लेकर भारत की क्या नीति है।

“पिछले दो साल में भारत की स्थिति इतनी मज़बूत हो चुकी है कि कोई भी तेल उत्पादक देश हमारी ज़रूरतों और उम्मीदों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता है। मेरे लिए मेरा हित ही सर्वोपरि है और मैं जहां से चाहूंगा वहीं से भू-राजनीतिक स्थिति और अपनी ज़रूरतों के हिसाब से कच्चा तेल ख़रीदूंगा। हम जहां से चाहेंगे वहां से कच्चा तेल ख़रीदेंगे। ”

ये बयान है धर्मेंद्र बयान का। आपको हंसी आनी चाहिए। अगर दो साल में भारत की स्थिति मज़बूत हो गई है तो भारत साफ साफ क्यों नहीं कह देता है।

जबकि इसी एक्सप्रेस में इसी बयान के बगल में एक कालम की खबर लगी है कि तेल रिफाइनरियों को कहा गया है कि वे विकल्प की तलाश शुरू कर दें। उन्हें ये बात तेल मंत्रालय ने ही कही है जिसके मंत्री धर्मेंद्र प्रधान हैं। सूत्रों के हवाले से इस ख़बर में लिखा है कि तैयारी शुरू कर दें क्योंकि हो सकता है कि तेल का आयात बहुत कम किया जाए या फिर एकदम बंद कर दिया जाए।

इसके बरक्स आप मंत्री का बयान देखिए। साफ साफ कहना चाहिए कि जो अमरीका कहेगा हम वही करेंगे और हम वही करते रहे हैं। इसमें 56 ईंच की कोई बात ही नहीं है। आप रुपये की कीमत पर पोलिटिक्स कर लोगों को मूर्ख बना सकते हैं, बना लिया और बना भी लेंगे लेकिन उसका गिरना थोड़े न रोक सकते हैं। वैसे ही ट्रंप को सीधे सीधे मना नहीं कर सकते। ज़रूर भारत ने अमरीका से आयात की जा रही चीज़ों पर शुल्क बढ़ाया है मगर इस सूची में वो मोटरसाइकिल नहीं है जिस पर आयात शुल्क घटाने की सूचना खुद प्रधानमंत्री ने ट्रंप को दी थी। अब आप पोलिटिक्स समझ पा रहे हैं, प्रोपेगैंडा देख पा रहे हैं?

बिजनेस स्टैंडर्ड के पेज छह पर निधि वर्मा की ख़बर छपी है कि भारत ईरान से तेल आयात को शून्य करने के लिए तैयार हो गया है। आप ही बताइये क्या इतनी बड़ी ख़बर भीतर के पेज पर होनी चाहिए थी? इस खबर में लिखा है कि तेल मंत्रालय ने रिफाइनरियों को कहा है कि वैकल्पिक इंतज़ाम शुरू कर दें। यह पहला संकेत है कि भारत सरकार अमरीका की घुड़की पर हरकत करने लगी है।

भारत ने कह चुका है कि वह किसी देश की तरफ से इकतरफा प्रतिबंध को मान्यता नहीं देता है। वह संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध का ही अनुसरण करता है। लेकिन जब यह कहा है कि तो फिर इस बात को तब क्यों नहीं दोहराया जा रहा है जब निक्की हेली दिल्ली आकर साफ साफ कह रही हैं कि ईरान से आयात को शून्य करना पड़ेगा।

हिन्दी अखबारों में ये सब जानकारी नहीं मिलेगी। मेहनत से आप तक लाता हूं ताकि आप इन्हें पढ़ते हुए देश दुनिया को समझ सकें। ज़रूरी नहीं कि आप भक्त से नो भक्त बन जाएं मगर जान कर भक्त बने रहना अच्छा है, कम से कम अफसोस तो नहीं होगा कि धोखा खा गए।

अब देखिए, मूल सवालों पर चर्चा न हो इसलिए सरकार या भाजपा का कोई न कोई नेता इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ लाता है। वो भी ग़लत सलत। तू तू मैं मैं की पोलिटिक्स चलाने के लिए। हर दिन आप चैनल खोल कर खुद से देख लें, पता चलेगा कि देश कहां जा रहा है। जिन नेताओं के पास जनता की समस्या पढ़ने और निराकरण का वक्त नहीं है, वो अचानक ऐसे बयान दे रहे हैं जैसे सुबह सुबह उठते ही इतिहास की एक किताब ख़त्म कर लेते हैं। उसमें भी गलत बोल देते हैं।

अब देखिए प्रधानमंत्री मगहर गए। कबीर की जयंती मनाने। वहां भाषण क्या दिया। कितना कबीर पर दिया और कितना मायावती अखिलेश पर दिया, इससे आपको पता चलेगा कि उनके लिए कबीर का क्या मतलब है। जब खुद उनकी पार्टी मज़ार मंदिर जाने की राहुल गांधी की राजनीति की आलोचना कर चुकी है तो इतनी जल्दी तो नहीं जाना चाहिए था। जब गए तो ग़लत सलत तो नहीं बोलना था।

मगहर में प्रधानमंत्री ने कहा कि ” ऐसा कहते हैं कि यहीं पर संत कबीर, गुरु नानक देव जी और गुरु गोरखनाथ एक साथ बैठकर आध्यात्मिक चर्चा करते थे” जबकि तीनों अलग अलग सदी में पैदा हुए। कर्नाटक में इसी तरह भगत सिंह को लेकर झूठ बोल आए कि कोई उनसे मिलने नहीं गया।

आप सोचिए, जब प्रधानमंत्री इतना काम करते हैं, तो उनके पास हर दूसरे दिन भाषण देने का वक्त कहां से आता है। आप उनके काम, यात्राओं और भाषण और भाषणों में ग़लत सलत तथ्यों को ट्रैक कीजिए, आपको दुख होगा कि जिस नेता को जनता इतना प्यार करती है, वो नेता इतना झूठ क्यों बोलता है। क्या मजबूरी है, क्या काम वाकई कुछ नहीं हुआ है।

आज नहीं, कल नहीं, साठ साल बाद ही सही, पूछेंगे तो सही। कबीर, नानक और गोरखनाथ को लेकर ग़लत बोलने की क्या ज़रूरत है। क्या ग़लत और झूठ बोलने से ही जनता बेवकूफ बनती है? क्या भारत को विश्व गुरु बनाने की बात करने वाले मोदी भारत को बेवकूफ बनाना चाहते हैं?

कांग्रेस की बड़ी जीत, “2जी घोटाले” में कोर्ट ने दी क्लीन चिट !

0

21 दिसंबर के दिन कांग्रेस के लिए बड़ी खुशखबरी लेकर आया है। अदालत ने 2जी घोटाले में कुल 17 लोगों को बरी कर दिया। जिसमे पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा और कनिमोड़ी शामिल है। अदालत द्वारा फैसला सुनाते ही पूरा कोर्टरूम तालियों से गूंज उठा। कोर्ट द्वारा सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी किया गया।

आरोप साबित करने में नाकाम रही सीबीआई: कोर्ट
फैसला सुनाते हुए जज ने कहा कि सभी आरोपियों पर सीबीआई आरोप साबित करने में नाकाम रही है इसलिए सभी आरोपियों को बरी किया जा रहा है। अदालत ने माना कि यूपीए सरकार पर बिना किसी आधार के बड़े पैमाने पर आरोप लगाए गए है।

नही हुआ कोई घोटाला, विनोद राय मांगी माफी: कांग्रेस
फैसले के बाद पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि हम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते है। यूपीए सरकार पर लगाए गए सभी आरोप निराधार साबित हुए है। इसके साथ ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि मेरी बात आज सच साबित हुई। न कोई भ्रष्टाचार हुआ और ना ही कोई घोटाला हुआ है। अगर कोई घोटाला है तो वह झूठ का घोटाला है। कोर्ट का फैसला आने के बाद विनोद राय को सामने आना चाहिए और जनता से माफी मांगनी चाहिए।

हमारे खिलाफ षड्यंत्र रचा गया था: डीएमके
कोर्ट का फैसला आने के बाद खुशी जाहिर करते हुए कनिमोड़ी ने कहा कि ” मैं उन सभी लोगों का धन्यवाद करती हूं जो इस मुश्किल भारी घड़ी में हमारे साथ थे। हमारे खिलाफ षड्यंत्र रचा गया था और आज यह बात साबित हो गयी। डीएमके नेता आरएस भर्ती ने कहा कि पिछले 2 विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा हमारे खिलाफ इस्तेमाल किया गया था, जिसका हमे नुकसान उठाना पड़ा था लेकिन अब यह गलत साबित हो गया है।

5 Points: कांग्रेस की कमान संभालने के बाद राहुल गांधी और सोनिया गांधी का भाषण !

0

राहुल गांधी ने आज 16 दिसंबर की सुबह पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मौजूदगी में कांग्रेस की कमान अपने हाँथ में ली। कांग्रेस अध्यक्ष पद संभालने के बाद राहुल गांधी के सामने कई चुनौतियां है और एक लंबी लड़ाई है। 
राहुल गांधी के सामने सभी बड़ी चुनौती है जनता के बीच एक बार फिर कांग्रेस के प्रति विश्वास पैदा करना, विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष होने के नाते जनता से जुड़े मोडडे उठाना, पूरे विपक्ष को एकजुट करना और सरकार के खिलाफ मजबूती से खड़े रहना। ऐसे में अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी का पहला भाषण काफी महत्वपूर्ण हो जाता है।

राहुल के भाषण की प्रमुख 5 बातें –

  • देश में हिंसा का दौर लगातार जारी है, इससे देश की छवि खराब हो रही है..
  • एक बार आग लग जाती है तो उसे बुझाना बहुत मुश्किल होता है और यही हम भाजपा के लोगों को समझाने की कोशिश कर रहे हैं..
  • मैं युवाओं से कहना चाहता हूं कि हम हिंदुस्तान की सबसे पुरानी पार्टी को आने वाले समय में सबसे पुरानी युवा पार्टी बनाना चाहता हूं.. 
  • मैं कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को आश्वासन देना चाहता हूं कि आप सब मेरा परिवार हो..
  • बीजेपी के लोग हमें मिटाना चाहते है, लेकिन हम ऐसा नही सोचते, हम नफरत का मुकाबला नफरत से नही प्यार से करते है..

सोनिया गांधी के भाषण के 5 प्रमुख बातें-

  •  कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित होने पर मैं राहुल को हार्दिक बधाई, शुभकामनाएं और आशीर्वाद देती हूं..
  • एक नया दौर, एक नये नेतृत्व की उम्मीद, राहुल गांधी आपके सामने है..
  • 20 साल पहले जब में राष्ट्रीय अध्यक्ष बानी तो में भी थोड़ी नर्वस थी पर धीरे धीरे मैं इस परिवार का हिस्सा बन गई..
  • मुझे इस देश की संस्कृति और विरासत इंदिरा गांधी से मिली है..
  • कांग्रेस पार्टी के लाखों कार्यकर्तागण इस पूरी यात्रा में मेरे हमसफर रहे हैं मैंने आपसे जो सीखा उसकी कोई तुलना नहीं हो सकती..
  • हमने समाज के हर तबके का प्रतिनिधित्व और विकास किया, हमने ऐसे कानून बनाये जो जनता के अधिकारों पर आधारित थे..
  • राजनीति में आने पर राहुल ने ऐसे भयंकर व्यक्तिगत हमले का सामना किया जिसने उसे और निडर इंसान बनाया..
  • आज इस जिम्मेदारी को छोड़ते हुए आप सभी कांग्रेसजनों और देश के नागरिकों द्वारा दिये गये असीम प्यार और विश्वास के लिये तहेदिल से शुक्रिया अदा करती हूं..

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और वर्तमान अध्यक्ष राहुल गांधी के भाषण से के बातें साफ हो जाती है जैसे-

  • कांग्रेस पार्टी के इतिहास में यह सबसे बड़े बदलाव की शुरुआत है..
  • राहुल गांधी बहुत जल्द के बड़े फैसले लेने वाले है..
  • राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी नफरत की राजनीति से दूर रहेगी..
  • राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी में युवाओं को बेहतर मौका मिलेगा..
  • भाजपा से हटकर कांग्रेस में वरिष्ठ नेताओं को बराबर सम्मान मिलेगा..
  • बहुत जल्द राहुल गांधी अपनी नई टीम बनाएंगे जिसमे युवा और वरिष्ठ नेता दोनो शामिल रहेंगे..

प्रधानमंत्री मोदी गुजरात की जनता को भय के भंवर में फंसा कर रखना चाहते हैं : रविश कुमार

0

क्या प्रधानमंत्री मोदी गिरिराज सिंह हो गए हैं
“पाकिस्तान के रिटायर्ड आर्मी जनरल अरशद रफ़ीक़ कहते हैं कि सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए। पाकिस्तान का वरिष्ठ आर्मी अफसर गुजरात चुनावों में अपना दिमाग़ क्यों लगाएगा? पाकिस्तान का एक डेलिगेशन मणिशंकर अय्यर के घर मिला था, अगर दिन उन्होंने गुजरात के समाज का अपमान किया, गरीबों और मोदी का अपमान किया। क्या ये बातें चिंता पैदा नहीं करती हैं, सवाल खड़े नहीं करते हैं, कांग्रेस को जवाब देना चाहिए” 


अख़बारों में छपा है कि बनासकांठा में प्रधानमंत्री ने ऐसा कहा है। प्रधानमंत्री अब गुजरात के सामने अहमद पटेल का भूत खड़ा कर रहे हैं। गुजरात की जनता को भय के भंवर में फंसा कर रखना चाहते हैं ताकि वह बुनियादी सवालों को छोड़ अहमद पटेल के नाम पर डर जाए। क्यों डरना चाहिए अहमद पटेल से? क्या इसी इस्तमाल के लिए राज्यसभा में अहमद पटेल को जीतने दिया गया? अहमद पटेल बार बार कह चुके हैं कि वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं, कांग्रेस ने भी ऐसा नहीं कहा है। 
क्या प्रधानमंत्री गुजरात की जनता को मुसलमान के नाम पर डरा रहे हैं? यह प्रधानमंत्री की तरफ से खेला गया सांप्रदायिक कार्ड है।  काश उन्हें कोई बताए कि भारत की जनता ने उनका हर शौक पूरा किया है, अब उसे सांप्रदायिकता की आग में न धकेलें। काश कोई उन्हें याद दिलाए कि आपने ही 15 अगस्त को 2022 तक सांप्रदायिकता मिटाने का भाषण दिया है। कोई संकल्प वंकल्प किया है। 
भारत में एक ही मुस्लिम मुख्यमंत्री है, महबूबा मुफ़्ती, वह भी बीजेपी के समर्थन से हैं। । अब तो उनके भाई भी कैबिनेट में आ गए हैं। परिवारवाद? फिर बीजेपी और मोदी अहमद पटेल का भूत क्यों खड़ा कर रहे हैं? विस्तार से बताने की ज़रूरत नहीं है। 
प्रधानमंत्री जानते हैं कि शब्द ज़रूरी नहीं हैं, शब्दों को इस तरह सजाकर कहा जाए कि उनसे एक छवि बने। उन्होंने अपनी बात इस तरह से कही है कि सामान्य जनता के मन में यह छवि पैदा हो जाए कि गुजरात चुनावों में पाकिस्तान दखलंदाज़ी कर रहा है।
 

इंडियन एक्सप्रेस ने मणिशंकर अय्यर के घर हुई रात्रि भोज के बारे में विस्तार से छापा है। 6 दिसंबर को मणिशंकर अय्यर के घर पर पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री कसूरी के लिए रात्रि भोज हुआ था। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व सेनाध्यक्ष दीपक कपूर, पूर्व विदेश मंत्री के नटवर सिंह, पूर्व राजनयिक टीसीए राघवन, शरत सभरवाल, के शंकर बाजपेयी, सलमान हैदर शामिल हुए थे। कसूरी अनंत नाम के एक थिंकटैंक के बुलावे पर भारत आए थे। भारत पाक संबंधों पर बोलने के लिए।
बीबीसी हिन्दी पर इस भोज में शामिल होने वाले पत्रकार प्रेम शंकर झा ने लिखा है कि सबको पता था कि कई लोग मणिशंकर अय्यर के यहां मिल रहे हैं। भोज के दौरान गुजरात चुनावों की कोई चर्च नहीं हुई, न ही अहमद पटेल का ज़िक्र हुआ। तो फिर प्रधानमंत्री को कहां से ये जानकारी मिली है?
कसूरी को यहां आने का वीज़ा भारत सरकार ने दिया होगा। वीज़ा क्यों दिया? जब पता चला तो कसूरी को अरेस्ट क्यों नहीं किया? क्या मोदी राज में इतना आसान हो गया है कि सत्तर पार और मुश्किल से चल फिर सकने वाले चंद लोग दिल्ली में जमा होकर तख़्ता पलटने की योजना बना लेंगे और  सुब्रमण्यण स्वामी ट्वीट करेंगे कि तख़्ता पलट की योजना तो नहीं? और इस योजना में भारत के ही पूर्व सेनाध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री शामिल होंगे? क्या भारत पाकिस्तान बन गया है?

 

पाकिस्तान से इतनी ही नफ़रत है तो शपथ ग्रहण समारोह में नवाज़ शरीफ़ को कौन बुलाया था, कौन अचानक बिना किसी योजना के पाकिस्तान पहुंच गया था? जवाब आप जानते हैं। मनमोहन सिंह तो अपने दस साल के कार्यकाल में एक बार भी पाकिस्तान नहीं गए। 
क्या प्रधानमंत्री को भी चुनाव आयोग की क्षमता पर शक होने लगा है? क्या उन्हें भी अमरीकी चुनावों की तरह हैक कर लिए जाने का अंदेशा हो रहा है? क्या उन्हें भी अब ईवीएम पर भरोसा नहीं है? फिर तो चुनाव रद्द करने की मांग करनी चाहिए। 
प्रधानमंत्री के इस बयान ने गिरिराज सिंह को ख़ुश कर दिया होगा। गिरिराज सिंह भले ही तीन साल में प्रमोट न हो सकें हो मगर उनका पाकिस्तान वाला जुमला उनसे प्रमोट होकर अमित शाह तक पहुंचा और अब अमित शाह से प्रमोट होकर प्रधानमंत्री मोदी तक पहुंच गया है। 
19-20 अप्रैल 2014, गूगल यही तारीख़ बता रहा है जब गिरिराज सिंह ने कहा था कि जो मोदी का विरोध करते हैं, पाकिस्तान चले जाएं। न्यू इंडिया में विरोधियों को पाकिस्तान से जोड़ने की शुरूआत गिरिराज सिंह ने ही की। 
उस वक्त देवघर के एस डी एम और रिटर्निंग अफसर जय ज्योति शर्मा ने गिरिराज सिंह के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज कराई थी। चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के आरोप में। उसका क्या हुआ, कौन पूछे। चुनाव आयोग का हाल आप जानते हैं। चुनाव आयोग अब शेषण और के जे राव का आयोग नहीं रहा। 

 

2014 के एक साल बाद 2015 के चुनाव में बिहार में अमित शाह ने कहा था कि अगर मोदी हार गए तो पाकिस्तान में पटाखे छोड़े जाएंगे। मोदी हार भी गए मगर पाकिस्तान में पटाखे नहीं छोड़े गए।
गिरिराज सिंह और अमित शाह के बाद प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान और अहमद पटेल के सहारे मुसलमान का भूत खड़ा कर रहे हैं। गिरिराज सिंह को बधाई। वे इस मामले में दो ताक़तवर नेताओं से भी सीनियर हो गए हैं।  
दोस्तों, आप चाहें जितने तर्क ले आइये मगर शक के नाम पर चल रही यह मुस्लिम विरोधी राजनीति सबको खोखला कर देगी। मुसलमान का डर दिखा कर हिन्दू नौजवानों को बर्बाद किया जा रहा है। उनसे कहा जा रहा है कि रोज़गार मत पूछो, पढ़ाई मत पूछो, अस्पताल मत पूछो, बस देखो कोई मुसलमान मुख्यमंत्री न बन जाए।  
लगातार हिन्दू नौजवानों की समग्र भारतीयता के बोध के दो टुकड़े किए जा रहे हैं। आख़िर सांप्रदायिकता की राजनीति किसे बर्बाद कर रही है? किसी आसमान से नहीं, आपके ही घरों से निकाल कर इस राजनीति के लिए लोग लाए जाने वाले हैं। सांप्रदायिकता आपको मानव बम में बदल देगी। नौजवानों को रोज़गार देने से अच्छा है उन्हें मानव बम में बदल दो। यही राजनीति चल रही है। 
अख़बारों ने भी छाप दिया है कि प्रधानमंत्री का इशारा कि गुजरात चुनावों में पाकिस्तान का हाथ है। अरे भाई गुजरात भारत में हैं, बर्मा में नहीं हैं। धानमंत्री वाक़ई कुछ भी बोलने लगे हैं। उन्हें लगता है कि लोगों ने अच्छा वक्ता मान लिया है इसलिए वे कुछ भी बोल सकते हैं।  

 

आदरणी प्रधानमंत्री मोदी, आप यह क्या कर रहे हैं? क्या प्रधानमंत्री जी आप गुजरात चुनाव हार रहे हैं? क्या  आप  गिरिराज सिंह हो गए हैं?

जिन भाषणों से दूसरों को हराया, उसी से हार रहे हैं मोदी : रविश कुमार

0

2014 में प्रधानमंत्री मोदी के जा भाषण उनके विजय रथ का सारथी बना वही भाषण 2017 तक आते-आते उनका विरोधी हो गया है। अपने भाषणों से मात देने वाले प्रधानमंत्री अपने ही भाषणों में मात खा रहे हैं। कम बोलना अगर समस्या है तो बहुत ज़्यादा बोलना भी समस्या है। बोलना सबको अच्छा लगता है लेकिन कुछ भी बोल देना किसी को अच्छा नहीं लगता है। प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में कुछ भी बोलने लगे हैं। तीन साल पहले की बात है, प्रधानमंत्री के भाषणों के आगे कांग्रेस को बोलने का मौक़ा नहीं मिल पाता था, आज उन्हीं भाषणों ने कांग्रेस को बोलने का मौक़ा दे दिया है। राहुल गांधी ने कहा है कि बोलते बोलते प्रधानमंत्री के पास कुछ बचा नहीं है। सच्चाई ने उन्हें घेर लिया है इसलिए नरेंद्र मोदी जी अब नरेंद्र मोदी जी पर ही भाषण दे रहे हैं। किसने सोचा था कि मोदी का यह मज़बूत हथियार उन्हीं के ख़िलाफ़ इस्तमाल होने लगेगा।
2014 का साल अलग था। मनमोहन सिंह आकर्षक वक्ता नहीं थे और न ही आक्रामक। 2009 में मनमोहन सिंह के सामने भाजपा का कमज़ोर प्रधानमंत्री का नारा नहीं चला था, 2014 में मनमोहन सिंह के सामने भाजपा का मज़बूत प्रधानमंत्री का नारा चल गया। चला ही नहीं, आंधी-तूफ़ान में बदल गया। 2009 में मनमोहन सिंह के कमज़ोर प्रधानमंत्री के सामने ख़ुद को महामज़बूत होने का दावा करने वाले आडवाणी 2014 के बाद मनमोहन सिंह से भी कमज़ोर साबित हुए। आडवाणी की चुप्पी इस तरह की हो चुकी है जैसे उन्होंने कभी माइक और लाउडस्पीकर भी नहीं देखा हो। वक्त का पहिया कैसे घूमता है। नोटबंदी पर मनमोहन सिंह का बयान मोदी सरकार पर जा चिपका। वही मनमोहन सिंह कह रहे हैं कि ग़रीब तो मैं भी था मगर मैं नहीं चाहता कि देश मुझ पर तरस खाए।
प्रधानमंत्री मोदी लगातार अपनी पृष्ठभूमि को उभारते रहते हैं। ग़रीब का बेटा, चाय वाले का बेटा। बहुत आसानी से 12 साल तक देश के अमीर राज्यों में से एक गुजरात के मुख्यमंत्री होने के तमाम अनुभवों को खारिज कर देते हैं। ग़रीब का बेटा कहने के लिए जिस राजनीति का वह नेतृत्व कर रहे हैं उसमें कितना धन है, वैभव है, पैसे का प्रदर्शन है, सब जानते हैं। करोड़ों रुपये ख़र्च कर सभाओं की तैयारी होती है जहां जाकर प्रधानमंत्री ख़ुद को ग़रीब का बेटा बताते हैं। दुनिया के इतिहास का यह सबसे महंगा ग़रीबी का सर्टिफिकेट है।
फिर भी किसने सोचा था कि उनकी इस ग़रीबी का जवाब मनमोहन सिंह से आएगा जो ख़ुद भी बेहद ग़रीब परिवार के थे मगर अपनी प्रतिभा के दम पर दुनिया के बड़े विश्वविद्यालयों तक पहुंचे और प्रधानमंत्री भी हुए। मनमोहन सिंह अपनी पृष्ठभूमि पर बात नहीं करना चाहते, प्रधानमंत्री मोदी इसके बिना कोई भाषण ही नहीं देते हैं।
2014 के लोक सभा चुनाव में मोदी की जीत सिर्फ भाषण के कारण नहीं थी। भाषण भी बड़ा कारण था। लोगों को लगा कि कोई बोलने वाला नेता भी होना चाहिए, मोदी ने लोगों ने यह इच्छा पूरी कर दी। मगर प्रधानमंत्री कभी नहीं समझ पाए कि अच्छे वक्ता की चाह रखने वाले लोग अच्छे भाषण की भी चाह रखते होंगे। प्रधानमंत्री मोदी लगातार इस कसौटी पर फेल होते चले जा रहे हैं। कभी ख़ुद को नसीब वाला कहा तो कभी किसी का डीएनए ही ख़राब बता दिया। दिल्ली से लेकर बिहार तक में देखा था कि लोग कैसे एक अच्छे वक्ता के ख़राब भाषण से चिंतित थे। प्रधानमंत्री मोदी वक्ता बहुत अच्छे हैं मगर भाषण बहुत ख़राब देते हैं।
एक कद्दावर नेता के लिए चुनावी जीत ही सब नहीं होता है। आख़िर वे इतनी जीत का करेंगे क्या? एक दिन यही जीत उनके भाषणों पर मलबे की तरह पड़ी नज़र आएगी। लोगों का जीवन चुनावी जीत से नहीं बदलता है। अगर बदल पाए होते तो गुजरात में 22 साल का हिसाब दे रहे होते। बता रहे होते कि मैंने 50 लाख घर बनाने का दावा किया था, यह रही चाबी, सबको दे दिया है। बता रहे होते कि कैसे शिवराज सिंह चौहान से लेकर रमन सिंह की सरकारों ने शिक्षा और अस्पताल के अनुभव बदल दिए हैं। रोज़गार के मायने बदल दिए। किसी और न भी नहीं किए होंगे मगर क्या अब आप यह भी कह रहे हैं कि मैंने भी नहीं किए और मैं करूंगा भी नहीं। आप ही नहीं किसी भी दल के पास जीवन बदलने का आइडिया नहीं है। यह संकट आपके पास ज़्यादा है क्योंकि आप सबसे अधिक दावा करते हैं।
प्रधानमंत्री के भाषण में कुछ जवाब होने चाहिए जो नहीं होते हैं। वे बहुत आसानी से कह देते हैं कि कांग्रेस ने मुस्लिम आरक्षण के नाम पर मुसलमानों को ठगा है। ख़ुद नहीं बताते कि वे और उनकी पार्टी मुस्लिम आरक्षण का नाम सुनते ही किस तरह हंगामा कर देते हैं। विरोध करते हैं। कांग्रेस पर उनका हमला सही भी है मगर अपनी बात वो ग़ायब कर देते हैं। वे यह बात शायद मुसलमानों को बता रहे थे कि कांग्रेस ने उन्हें ठगा है। यूपी, हरियाणा और राजस्थान के जाट भी उनसे यही पूछ रहे हैं कि जाट आरक्षण पर हमसे किया गया वादा क्या हुआ। क्या भाजपा ने वैसे ही जाटों को ठगा है जैसे कांग्रेस ने मुसलमानों को ठगा है। महीने भर से गुजराती में भाषण दे रहे प्रधानमंत्री को अपने बोलने पर बहुत यकीन हो चुका है कि वे कुछ भी बोल देंगे, लोगों को सुनना पड़ेगा। इस तरह का गुमान के सी बोकाडिया और राज सिप्पी को होता था कि कोई सी भी पिक्चर बना देंगे, हिट हो जाएगी।
प्रधानमंत्री विपक्ष के गंभीर सवालों का जवाब कभी नहीं देते हैं। बेतुकी बातों को लेकर बवाल मचा देते हैं। सारे मंत्री जुट जाते हैं, आई टी सेल जुट जाता है और गोदी मीडिया के एंकर हफ्तों के लिए एंजेंडा सेट कर देते हैं। आज न कल प्रधानमंत्री मोदी को इस गोदी मीडिया से छुटकारा पाना ही होगा। कई बार वो अपनी ग़लतियों को तुरंत सुधार लेते हैं, गुजरात चुनावों के कारण उन्हें जीएसटी की हकीकत दिख गई, सुधार किया, उसी तरह किसी चुनावी मजबूरी के कारण ही प्रधानमंत्री को अपनी गोद से इस मीडिया को उठाकर फेंकना होगा। ऐसा होकर रहेगा वरना यह मीडिया एक दिन उनके भाषणों की तरह उन्हीं को निगलने लगेगा। कोई भी सक्रिय समाज मीडिया को सरकार की गोद में लंबे समय तक देखना बर्दाश्त नहीं कर सकता है। वह समाज उसे ही सहन नहीं करेगा जिसकी गोद में मीडिया तरह तरह के दबावों से बिठाया जाता है।
प्रधानमंत्री ने ख़ुद भी किस तरह की राजनीतिक भाषा का इस्तमाल किया है। उनके नेतृत्व में तीन साल से किस भाषा का इस्तमाल हो रहा है, वे चाहें तो किसी भी भाषाविद से अध्ययन करा सकते हैं। आई टी सेल और ट्रोल संस्कृति के ज़रिए जो हमले होते रहे, झूठ का प्रसार होता रहा, ये सब जानना हो तो उन्हें ज़्यादा मेहनत करने की ज़रूरत नहीं है। बस ऑल्ट न्यूज़ की वेबसाइट पर जाना है, काफी कुछ मिल जाएगा। उनके कार्यकाल का मूल्याकंन क्या सिर्फ चुनावी जीत से होगा या राजनीतिक संस्कृति से भी होगा।
इसी 15 अगस्त को प्रधानमंत्री ने कहा कि सांप्रदायिकता को मिटाना है लेकिन उनके भाषणों में मुग़ल, औरंगज़ेब या उनके प्रवक्ताओं की ज़ुबान पर खिलजी का ज़िक्र किस संदर्भ में आता है? सांप्रदायिकता की बुनियादी समझ रखने वाला भी इसका जवाब दे सकता है। वे बेहद चालाकी से सांप्रदायिक सोच को समर्थन देते हैं और सुविधा से ऐसी सोच का अपने हक़ में इस्तमाल करते हैं। क़ब्रिस्तान हो या औरंगज़ेब हो यह सारे उनकी शानदार जीत के पीछे मलबे के ढेर की तरह जमा है। वे चाहें तो टीवी खोल कर अपने प्रवक्ताओं की भाषा का भी अध्ययन कर सकते हैं।
विरोधी दलों ने वाक़ई उनके ख़िलाफ़ कई बार ख़राब भाषा का इस्तमाल किया है मगर क्या वे हर बार इसी से छूट लेते रहेंगे कि उन्हें ऐसा बोला गया है, क्या वे कभी इसका जवाब नहीं देंगे कि वे भी इसी तरह से बोलते रहें हैं? चुनावों के समय विरोधियों की सीडी बनवाना, स्टिंग करवाना यह सब आपके खिलाफ भी हुआ और आप भी दूसरों के खिलाफ खुलकर किए जा रहे हैं। कहीं कोई फुलस्टाप नहीं है। इसीलिए अब आप अलग से दिखने वाले नरेंद्र मोदी नहीं हैं। अब आप पहले से चली आ रही ख़राब राजनीतिक संस्कृति को आगे बढ़ाते रहने वाले नरेंद्र मोदी हैं। आप नरेंद्र मोदी को गाली दिए जाने को लेकर मुद्दा बनाने लगते हैं, मगर आपने या आपकी टीम ने नेहरू के साथ क्या किया है? क्या यह भी बताने की ज़रूरत होगी?
आपकी विश्वसनीयता या लोकप्रियता चाहे जितनी हो, आपके लोगों को भी पता है चुनाव आयोग से लेकर तमाम संस्थाओं की विश्वसनीयता बढ़ी नहीं है बल्कि पहले जैसी है या उससे भी घट गई है। सिर्फ आप ही नहीं, किसी भी राज्य में किसी भी नेता के सामने यही संकट है। संस्थाओं की विश्वसनीयता गिराते रहने से कोई नेता अपनी विश्वसनीयता के शिखर पर अनंत काल तक नहीं रह सकता है।
न्यूज़ 18 के चौपाल कार्यक्रम में संबित पात्रा कन्हैया से कह रहे थे कि आप वंदेमातरम नहीं बोलते हैं, कन्यैहा वंदेमातरम भी बोलते हैं, भारत की माता की जय भी बोलते हैं, फिर संबित से पूछते हैं कि अब आप बताओ गांधी को पूजते हैं या गोड्से को। संबित इस सवाल का जवाब नहीं नहीं देते हैं, कन्हैया लेनिन ज़िंदाबाद, स्टालिन मुर्दाबाद बोल रहे हैं, संबित जवाब नहीं देते हैं कि गांधी की पूजा करते हैं या गोड्स की पूजा करते हैं। अंत में बात इस पर ख़त्म होती है कि मोदी इस देश के बाप हैं।
मैं सन्न रह गया जब पात्रा ने कहा कि मोदी इस देश के बाप हैं। संबित को किसने कहा कि आप इस देश के बाप हैं। मुमकिन है आप भारत का कोई भी चुनाव नहीं हारें, लेकिन उन तमाम जीत से पहले और जीत के सामने मैं यह कहना चाहता हूं कि जनता इस देश की बाप है। आप इस देश के बाप नहीं है। इतनी सी बात संबित पात्रा को मालूम होनी चाहिए। इस देश में दरोगा, जांच एजेंसी के दम पर कोई भी कुछ करवा सकता है, यह पहले भी था और आपके राज में भी है, थाना पुलिस के दम पर दम भरना या भीड़ के दम पर दम भरना बहुत आसान है। इसे हासिल करना कोई बड़ी बात नहीं है।
मोहल्ले का दादा और देश का बाप ये सब क्या है। आपने 2014 में कहा था कि आप भारत के प्रधान सेवक हैं, तीन साल बाद 2017 में संबित पात्रा कह रहे हैं कि आप इस देश के बाप हैं। मजबूरी में कोई किसी को बाप बना लेता है, यह मुहावरा सबने सुना है। क्या संबित आपको मज़बूत नेता से मजबूरी का नेता बना रहे हैं? विरोधियों को कोई क्लिन चिट नहीं दे रहा है, मगर प्रधानमंत्री को सत्ता में बिठाने में लोगों ने क्या कोई कमी की है जिसका बदला ऐसी ख़राब राजनीतिक संस्कृति के ज़रिए लिया जा रहा है। प्रधानमंत्री चाहें तो अपने इन प्रवक्ताओं को कुछ दिन टीवी से दूर रखें, ये तो नेता हैं नहीं, जो नेता हैं, उन्हीं का प्रभाव कमज़ोर कर रहे हैं।
यह आपका प्रभाव ही है कि नतीजा आने से पहले कोई नहीं लिखता है कि आप हार सकते हैं। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में हार हुई तो वही संपादक और एंकर वही लिखेंगे जो मैं नतीजा आने से पहले लिख रहा हूं। आप भले चाहें जितना चुनाव जीतें, लेकिन आप भी आसानी से देख सकते हैं कि आप अपने भाषणों में किस तरह हर दिन हार रहे हैं।

सोशल मीडिया पर जुड़ें

37,994FansLike
0FollowersFollow
1,202FollowersFollow
1FollowersFollow
1,256FollowersFollow
791FollowersFollow

ताजा ख़बरें