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मध्यप्रदेश कांग्रेस ने जारी की 155 प्रत्याशियों की पहली सूची।

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काफी इंतजार के बाद आखिर मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी ने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी। उम्मीदवारों की पहली सूची में 155 नामों को को शामिल किया गया है।

सूची को देखकर पता चलता है कि कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों को बराबरी से टिकट दिया गया है। मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कमलनाथ चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया और प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया ने सूची जारी की है।

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव: कांग्रेस की पहली सूची के प्रमुख नाम

  1. जोरा- बनवारी लाल शर्मा
  2. सुमावली- एदल कंसाना
  3. मुरैना- रघुराज सिंह कसाना
  4. दिमनी- गिरिराज दंडोतिया
  5. अंबा सुरक्षित- कमलेश जाटव
  6. अटैक- हेमंत कटारे
  7. लहार- डॉक्टर गोविंद सिं
  8. मेहगांव- ओ पी एस भदौरिया
  9. ग्वालियर ग्रामीण- मदन कुशवाहा
  10. ग्वालियर- प्रद्युमन सिंह तोमर
  11. ग्वालियर ईस्ट- मुन्नालाल गोयल
  12. भितरवार- लखन सिंह यादव
  13. डबरा सुरक्षित- श्रीमती इमरती देवी
  14. शिमला- घनश्याम सिंह
  15. भांडेर सुरक्षित- राकेश संतराम
  16. करेरा सुरक्षित- जसवंत जाटव
  17. पोहरी- सुरेश
  18. रथखेड़ा पिछोर- केपी सिंह
  19. चाचौड़ा- लक्ष्मण सिंह
  20. राघोगढ़- जयवर्धन सिंह
  21. बीना सुरक्षित- शशि कुमार कथूरिया
  22. खुरई- अरुणोदय चौबे
  23. सुर्खी- गोविंद सिंह राजपूत
  24. देवरी- हर्ष यादव
  25. नरयावली सुरक्षित- सुरेंद्र चौधरी
  26. सागर- नेवी जैन
  27. बंडा- तरवार सिंह लोधी
  28. टीकमगढ़- यादवेंद्र सिंह
  29. पृथ्वीपुर- बृजेंद्र सिंह राठौर
  30. निवाड़ी- कैप्टन सुरेंद्र सिंह यादव
  31. खरगापुर- श्रीमती चंदा सिंह गौर
  32. महाराजपुर- नीरज दीक्षित
  33. चांदला- हरिप्रसाद अनुरागी
  34. छतरपुर- आलोक चतुर्वेदी
  35. बिजावर- शंकर प्रताप सिंह बुंदेला
  36. जबेरा- प्रताप सिंह लोधी
  37. पवई- मुकेश नायक
  38. गुनौर सुरक्षित- शिवदयाल बागरी
  39. चित्रकूट- नीलांशु चतुर्वेदी
  40. रैगांव सुरक्षित- कल्पना वर्मा
  41. सतना- सिद्धार्थ कुशवाहा
  42. नागौद- यादवेंद्र सिंह
  43. अमरपाटन- राजेंद्र कुमार सिंह
  44. सिरमौर- श्रीमती अरुणा तिवारी
  45. सिमरिया- त्रियुगी नारायण शुक्ला
  46. त्योंथर- रमाशंकर पटेल
  47. मऊगंज- सुखेंद्र सिंह बन्ना
  48. देवतालाब- श्रीमती विद्यावती पटेल
  49. रीवा- अभय मिश्रा
  50. गूढ़- सुंदर लाल तिवारी
  51. चुरहट- अजय सिंह राहुल
  52. सिहावल- कमलेश्वर पटेल
  53. चितरंगी सुरक्षित- श्रीमती सरस्वती सिंह
  54. सिंगरौली- श्रीमती रेनू भवानी
  55. सुरक्षित- श्रीमती कमलेश सिंह
  56. व्यवहारी सुरक्षित- रामपाल सिंह
  57. जयसिंह नगर- ध्यान सिंह
  58. जेतपुर सुरक्षित- श्रीमती उमा धुर्वे
  59. कोतमा- सुनील शराब
  60. अनूपपुर सुरक्षित- बसु लाल सिंह
  61. पुष्पराजगढ़ सुरक्षित- फुन्दूलाल सिंह मार्को
  62. बरवाड़ा- विजय राघवेंद्र सिंह
  63. विजयराघवगढ़- पदमा शुक्ला
  64. बहोरीबंद- सौरभ सिंह सिसोदिया
  65. पाटन- नीलेश अवस्थी
  66. बरगी- संजय यादव
  67. जबलपुर कैंट- आलोक मिश्रा
  68. जबलपुर पश्चिम- तरुण भनोट
  69. सिहोरा एसटी- खिलाड़ी सिंह
  70. शाहपुरा सुरक्षित- भूपेंद्र मरावी
  71. डिंडोरी सुरक्षित- ओंकार सिंह मरकाम
  72. बिछिया सुरक्षित- नारायण सिंह पट्टा
  73. मंडला सुरक्षित- संजीव छोटे लाल उइके
  74. बैहर सुरक्षित- संजय उइके
  75. लांजी- श्रीमती हिना लिखी राम कावरे
  76. परसवाड़ा- श्रीमती मधु भगत
  77. बरघाट सुरक्षित- अर्जुन सिंह काकोडिया
  78. काकोडिया सिवनी- मोहन सिंह चंदेल
  79. केवलारी- रजनीश हरवंश सिंह
  80. लखनादोन- योगेन्द्र सिंह बाबा
  81. गोटेगांव – नर्मदा प्रसाद प्रजापति
  82. नरसिंहपुर – लाखन सिंह पटेल
  83. तैंदूखेड़ा – संजय शर्मा
  84. गाडरवाड़ा – सुनीता पटेल
  85. अमरवाड़ा- कमलेश शाह
  86. सौंसर – विजय चौरे
  87. परासिया -सोहनलाल वाल्मीकि
  88. मुलताई – सुखदेव पांसे
  89. बैतूल – निलय कुमार डागा
  90. घोड़ाडोंगरी ब्रह्माभालवी
  91. भैंसादेही – दामू सिंह सिरसाम
  92. टिमरनी – अभिजीत शाह(अंकित बाबा)
  93. हरदा – आर.के. दोगने
  94. सिवनी-मालवा -ओमप्रकाश रघुवंशी
  95. सोहागपुर- सत्यपाल पालया
  96. उदयपुरा – देवेन्द्र पटेल गदरवास
  97. भोजपुर – सुरेश पचौरी
  98. सांची – डॉ.प्रभुराम चौधरी
  99. सिलवानी- देवेन्द्र पटेल
  100. विदिशा – शशांक भार्गव
  101. बासौदा – निशंक जैन
  102. कुरवाई – सुभाष गोहट
  103. सिरोंज – अशोक त्यागी
  104. शमशाबाद- ज्योत्सना यादव
  105. बैरसिया – जय श्री हरिकरण
  106. भोपाल-उत्तर- आरिफ अकिल
  107. भोपाल-दक्षिण पीसी शर्मा
  108. आष्टा – इंजी. गोपाल सिंह
  109. इच्छावर- शैलेन्द्र पटेल
  110. सीहोर – सुरेन्द्र सिंह ठाकुर
  111. नरसिंहगढ़- गिरीश सिंह भंडारी
  112. राजगढ़ – बापू सिंह तोमर
  113. खिलचीपुर- प्रियव्रत सिंह
  114. सारंगपुर- कला मालवीय
  115. सुसनेर – महेन्द्र सिंह परिहार
  116. आगर – विपिन वानखेड़े
  117. शाजापुर – हुकुम सिंह कराडा
  118. कालापिपल- कुनाल चौधरी
  119. सोनकच्छ- सज्जन सिंह वर्मा
  120. देवास – जय सिंह ठाकुर
  121. बगाली – कमल सिंह वसकले
  122. मांधाता- नारायण सिंह पटेल
  123. हरसूद (एसटी) – सुखराम साल्वे
  124. नेपानगर (एसटी) श्रीमती सुमित्रा देवी कस्दकार
  125. बुरहानपुर – हमीदकांजी
  126. बिकनगांव (एसटी) श्रीमती झूमा सोलंकी
  127. बादवाह – सचिन बिरला
  128. महेश्वर – (एससी) से विजय लक्ष्मी साधो
  129. कसरावद – सचिन यादव
  130. भगवानपुरा (एसटी) – विजय कुमार सोलंकी
  131. सेंधवा (एसटी) – ग्यारसीलाल रावत
  132. राजपुर (एसटी) – बाला बच्चन
  133. बदवानी (एसटी) – रमेश पटेल
  134. जोबत (एसटी) – श्रीमती कलावती भूरिया
  135. झाबुआ (एसटी)- डा- विक्रांत भूरिया
  136. तान्दला (एसटी) – वीर सिंह भूरिया
  137. सरदारपुर (एसटी) -प्रताप ग्रेवाल
  138. गंधवानी (एसटी) -उमंग सेंगर
  139. कुक्षी (एसटी) -सुरेंद्र सिंह बघेल
  140. मनावर (एसटी)- हीरा अलावत
  141. धरमपुरी (एसटी)- प्राची लाल मेदा
  142. धार – श्रीमती प्रभा सिंह गौतम
  143. बदनावर – राजवर्धन सिंह
  144. इंदौर 3 -अश्वनी जोशी
  145. डा.अम्बेदकर नगर -अंतर सिंह डाबर
  146. रउ – जीतू पटवरी
  147. सांबेर (एससी) -तुलसी सिलावत
  148. नागद खाचरोद -दिलीप सिंह गुर्जर
  149. तराना (एससी) – महेश परमार
  150. घटिया (एससी)- राम लाल मालवीय
  151. बढनगर – मुरली मोरवाल
  152. रतलाम गांव (एसटी) -लक्ष्मण सिंह डिंडौर
  153. सेलाना (एसटी) -हर्ष विजय गेहलोत
  154. जौरा – केके सिंह कालूखेडा
  155. सुवसरा -हरदीप सिंह डांगलोत

मध्यप्रदेश कांग्रेस की पहली सूची

Exclusive: दिग्विजय सिंह से झड़प की खबरों का सिंधिया ने किया खंडन

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मध्यप्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी की ख़बरें एक बार फिर सामने आ रही है. कल दिग्विजय सिंह की एक चिट्ठी सोशल मीडिया पर वायरल हो गयी थी. चिट्ठी में दिग्विजय सिंह ने सोनिया गाँधी से टिकट बटवारे वो लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी. हालाँकि दिग्विजय सिंह ने इस चिट्ठी पर सफाई देते हुए इस चिट्ठी को फर्जी करार दे दिया था.

मीडिया में फैली सिंधिया-दिग्विजय में झड़प की खबर

मीडिया आज सुबह-सुबह सुबह खबर आई की देर रात स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक में दिग्विजय सिंह और सिंधिया के बीच झड़प हो गयी थी. टिकट बटवारे को लेकर दिग्विजय सिंह और सिंधिया राहुल गाँधी के सामने ही बहस करने लगे. प्रदेश के दोनों दिग्गज नेताओं के बीच हुई इस लड़ाई के कारण राहुल गाँधी भी काफी नजर हो गए है.


सिंधिया ने किसी भी विवाद का किया खंडन

मीडिया में ख़बरें आने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दिग्विजय सिंह से किसी भी विवाद का खंडन किया है. सिंधिया के करीबी सू्त्रों के मुताबिक कल रात स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक में उनका दिग्विजय सिंह से कोई विवाद नहीं हुआ. 

Update: दिग्विजय सिंह ने भी किया किसी भी तरह के विवाद का खंडन


ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद अब दिग्विजय सिंह ने भी ज्योतिरादित्य सिंधिया से किसी भी तरह के विवाद का खंडन किया है। दिग्विजय सिंह ने अपने ट्विटर अककॉउंट पर लिखा कि “मीडिया में यह गलत खबर चलाई जा रही है कि मेरे और सिंधिये जी के बीच कोई विवाद हुआ है जिसमे राहुल गांधी जी को बीच बचाव करना पड़ा। मध्यप्रदेश कांग्रेस के हम सभी नेता एक है और इस भ्रष्ट भाजपा सरकाकर को मध्यप्रदेश में हारने के लिए प्रतिबद्ध है।


https://twitter.com/digvijaya_28/status/1057991702785351681?s=19

राहुल गांधी काट रहे है मंदिर-मस्जिद और गुरुद्वारे के चक्कर,दूसरी और दिग्विजय ने पार्टी से बनाई दूरियां

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मध्यप्रदेश दौरे के दूसरे दिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मंगलवार को ग्वालियर किले में स्थित गुरुद्वारे में मत्था टेकने पहुंचे। वे यहां करीब 10 मिनट रहे। उन्हें यहां सरोपा भेंट किया गया। उनके साथ कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया भी पहुंचे। वे मुरैना में शाम को करीब 46 किलोमीटर लंबा रोड शो करेंगे। राहुल ने सोमवार को दतिया में पीताम्बरा पीठ, ग्वालियर के अचलेश्वर मंदिर में पूजा-अर्चना की थी। उन्होंने शाम को यहां की मोती मस्जिद में इबादत भी की थी। राहुल मंगलवार को ही श्योपुर में मेला मैदान पर आम सभा को संबोधित करेंगे।

पीताम्बरा पीठ में राहुल ने पीली धोती पहनकर प्रवेश किया। ग्वालियर के अचलेश्वर मंदिर में भी अभिषेक किया। इसके बाद उन्होंने रोड शो किया। अचलेश्वर मंदिर में अभिषेक के दौरान पंडित ने उन्हें जल से भरा लौटा दिया तो राहुल ने तपाक से कहा- इसमें दूध नहीं है। इसके बाद उसमें दूध डाला गया। पूजा के दौरान पंडित ने राहुल के माथे पर चंदन से त्रिपुंड बनाया। जामा मस्जिद में मसाजिद कमेटी के नाजिम खान ने राहुल को मक्का-मदीना से लाई गई चादर भेंट की। इस दौरान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया उनके साथ थे।

दिग्विजय कांग्रेस की रैलियों में नहीं आएंगे नज़र,नहीं करेंगे कोई प्रचार

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह पार्टी की किसी भी रैली में ज्यादा नहीं दिखाई देते है। इससे कांग्रेस में गुटबाज़ी साफ़ दिखाई दे रही है। हाल ही में दिग्विजय सिंह का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। इस वीडियों में वो पार्टी के कार्यकर्ताओं से बात करते नजर आ रहे हैं और साफ तौर पर कह रहे हैं, मेरे भाषणों से कांग्रेस के वोट कटते हैं, इसलिए मैं रैलियों में नहीं जाता।

बताया जा रहा है कि दिग्विजय सिंह का यह वीडियो उस वक्त का है जब वो मध्य प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष जीतू पटवारी के सरकारी बंगले पर पहुंचे थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात पार्टी के कार्यकर्ताओं से हो गई और दिग्विजय सिंह अपनी व्यथा सुनाने लगे। वीडियो में दिग्विजय सिंह ने साफ़ तौर पर यह भी कहा कि देखते रह जाओगे,ऐसे सरकार नहीं बनेगी। जिसको टिकट मिले, चाहे दुश्मन को टिकट मिले, जिताओ। उन्होंने आगे कहा, मेरा काम सिर्फ एक है- कोई प्रचार नहीं, कोई भाषण नहीं। मेरे भाषण देने से तो कांग्रेस के वोट कटते हैं, इसलिए मैं कहीं जाता ही नहीं। इससे साफ़ दिखता है कि दिग्विजय सिंह पार्टी से कटे-कटे नज़र आ रहे है।

बता दें कि राहुल गांधी हाल ही में भोपाल दौरे पर पहुंचे थे। इस दौरान पार्टी के सभी बड़े नेताओं के पोस्टर मौजूद थे लेकिन दिग्विजय सिंह के पोस्टर नजर नहीं आए। हालांकि इसके लिए प्रदेशाध्यक्ष कमलनाथ ने माफी भी मांगी थी। पार्टी में अपनी स्थिति का एहसास हो जाने के बाद दिग्विजय सिंह ने कार्यकर्ताओं को साफ तौर पर कह दिया है कि पार्टी को जीताने में लग जाओ। इसके साथ ही उन्होंने अपनी स्थित भी साफ कर दी है।

मुख्यमंत्री पद की लड़ाई कहीं मध्यप्रदेश में सत्ता से चूक न जाए कांग्रेस

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मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री के पद को लेकर चल रही खींचतान कांग्रेस कहीं सत्ता में आने से चूक न जाए। कांग्रेस में उठ रहीं इस तरह की आशंकाओं को भारतीय जनता पार्टी के नेता लगातार हवा दे रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी अपने मध्यप्रदेश के दौरे में लगातार चेहरे को लेकर हवा दे रहे हैं। कांग्रेस के लिए यह चुनाव करो या मरो का चुनाव है। इस चुनाव कांग्रेस यदि सत्ता बनाने से चूक गई तो स्थितियां उत्तरप्रदेश और बिहार जैसी हो जाएंगीं।

पंद्रह साल की भाजपा सरकार से नाराज है वोटर

राज्य में कांग्रेस अब तक चुनाव कोई ऐसा मुद्दा तैयार नहीं कर पाई है, जिसके नारे के सहारे उसका सत्ता से वनवास समाप्त हो जाए। लगातार पंद्रह साल से विपक्ष में बैठी कांग्रेस जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ कमजोर कर चुकी है। पिछले दो विधानसभा चुनाव में नेतृत्व को लेकर जो प्रयोग कांग्रेस पार्टी द्वारा किए गए थे, वे असफल साबित हुए हैं। वर्ष 2008 में पार्टी ने सुरेश पचौरी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में कांग्रेस की सत्ता में वापसी की सबसे ज्यादा संभावनाएं थीं। पांच साल की अवधि में शिवराज सिंह चौहान भारतीय जनता पार्टी के तीसरे मुख्यमंत्री थे। पार्टी में चौहान का नेतृत्व स्वीकार करने वाले लोगों की भी कमी थी।

कांग्रेस की रणनीतिक कमजोरी ने उसे सत्ता से वंचित कर दिया था। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कांतिलाल भूरिया के जरिए आदिवासी कार्ड खेल था। पार्टी को इस कार्ड से आदिवासी क्षेत्रों में ही सफलता नहीं मिली। पिछले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी के बड़े नेताओं के बीच निपटाओ का भाव उसी तरह देखने को मिला था, जिस तरह वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में मिला था। लोकसभा चुनाव में केन्द्र की सरकार जाने के बाद अरूण यादव को प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व सौंपा गया था। तीन साल से भी अधिक समय तक अध्यक्ष रहने के बाद भी वे अपना और पार्टी का जनाधार मजबूत नहीं कर पाए थे। पार्टी ने उन्हें हटाए जाने के फैसले में भी काफी देरी कर दी थी। उनके स्थान पर अध्यक्ष बनाए गए कमलनाथ राज्य की राजनीति के तौर-तरीके से भी परिचित नहीं है।

उनके व्यवहार को लेकर कांग्रेस के कार्यकर्त्ताओं की यह शिकायत हमेशा रहते है कि वे इस तरह पेश आते हैं जैसे कि केन्द्रीय मंत्री अथवा मुख्यमंत्री हैं। कमलनाथ ने राज्य में अपनी भूमिका को किंग मेकर की तरह पेश किया था। पहली बार वे किंग बनने के लिए उतावले दिखाई दे रहे हैं। सत्तर की उम्र पार कर चुके कमलनाथ का राज्य की राजनीति में नोसिखियापन कई मौकों पर देखने को मिला। मीडिया विभाग में परिवर्तन से लेकर उनके चुनावी मुद्दे तक में इस नौसिखिएपन को समझा जा सकता है। कमलनाथ छिंदवाड़ा के विकास मॉडल से राज्य की पंद्रह साल पुरानी भाजपा सरकार को उखाडना चाहते हैं। छिंदवाड़ा के विकास मॉडल को उभारने के पीछे उनकी सोच पार्टी में मुख्यमंत्री पद के दावेदार दूसरे नेताओं को पीछे करने की है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की सार्वजनिक मंचों से दी गई नसीहतों के बाद भी कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया से तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं। राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश में चुनाव जीतने की जो रणनीति बनाई है उसमें सिर्फ दो ही चेहरों को केन्द्र में रखा गया है। कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया। राज्य में भारतीय जनता पार्टी की पंद्रह साल की सरकार को लेकर लोगों में नाराजगी साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस इस नाराजगी को अपने पक्ष में मोड़ने का कोई रास्ता हीं ढूंढ पाई है।

सपाक्स और जयस भी बन सकते हैं राह में रोड़ा

कांग्रेस की राह में बड़ी रूकावट सपाक्स और जयस उभर कर सामने आ रही है। दोनों ही वर्ग विशेष की राजनीति कर रहे हैं। सपाक्स संगठन विशेष रूप से ठाकुर, ब्राह्मण एवं वैश्य वर्ग के वोटों की राजनीति कर रहा है। जबकि जयस संगठन आदिवासी वर्ग पर आधारित है। वैसे तो आदिवासी कांग्रेस का प्रतिबद्ध वोटर माना जाता है लेकिन , पिछले दो चुनावों से इसकी कांग्रेस से दूरी साफ दिखाई दे रही है। इस दूरी के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग कारण हैं। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी जबलपुर संभाग की कुछ विधानसभा सीटों तक प्रभाव रखती है। इससे मिलने वाले कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के लिए पर्याप्त माने जाते हैं।

जयस चुनाव मैदान में कहां और कितने उम्मीदवार उतारता है यह अभी कहना मुश्किल है। सपाक्स जरूर यह दावा कर रहा है कि वह राज्य की सभी 230 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगा। स्वभाविक है कि अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित सीटें भी इसमें शामिल हैं। इन आरक्षित सीटों पर संबंधित वर्ग के ही लोगों को उम्मीदवार बनाना होगा। ऐसा होने पर सपाक्स के मूल उद्देश्य पर ही स्वभाविक तौर पर सवाल खड़े हांगे। सपाक्स का जन्म आरक्षण विरोध से हुआ है। सामान्य वर्ग के वोटर के बारे में यह माना जाता है कि वह भाजपा का प्रतिबद्ध वोटर है।

सपाक्स के मैदान में होने से नुकसान भाजपा को होगा ऐसा माना जाना स्वभाविक है। यह वोटर भी चुनाव के वक्त विभाजित होगा। इसका फायदा कितना कांग्रेस को मिलेगा यह कहना मुश्किल है। कांग्रेस वर्तमान राजनीतिक हालात अपने अनुकूल मान रही है। यही वजह है कि पार्टी में अभी से नेता एक-दूसरे के समर्थकों के टिकट कटवाने में लगे हुए हैं। कहा यह जा रहा है कि कांग्रेस के सारे नेता मिलकर सिंधिया की राह को रोकना चाहते हैं। राज्य में एक मात्र सिंधिया का चेहरा ही ऐसा है,जिस पर कोई दाग नहीं है। वोटर के बीच भी लोकप्रिय है।

क्या नरसिंहपुर में आमने-सामने होंगे पचौरी-विवेक तन्खा

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पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी का प्रभाव क्षेत्र माने जाने वाले नरसिंहपुर जिले में कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य एवं सुप्रीम कोर्ट के वकील विवेक तन्खा का दखल बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। तन्खा की पहल पर ही प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष कमलनाथ ने रविवार को जबलपुर एवं नरसिंहपुर जिले के टिकट के दावेदार नेताओं को बुलाकर चर्चा की है। यह माना जा रहा है कि कांग्रेस नरसिंहपुर सीट से तन्खा को विधानसभा का चुनाव लड़ा सकती है। तन्खा ने इस बात से इंकार किया है कि उनके पुत्र विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।

तन्खा ने लड़ा था जबलपुर से लोकसभा का चुनाव

सुप्रीम कोर्ट के वकील विवेक तन्खा ने लोकसभा का पिछला चुनाव जबलपुर से लड़ा था। वे भारतीय जनता पार्टी के राकेश सिंह के खिलाफ चुनाव हार गए थे। राकेश सिंह वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष हैं। मध्यप्रदेश कांग्रेस में बने नए राजनीतिक समीकरणों में विवेक तन्खा ताकतवर रूप में उभरकर सामने आए हैं। माना यह जाता है कि कमलनाथ,ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह को एक करने में विवेक तन्खा की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है। विवेक तन्खा, कमलनाथ के ज्यादा करीबी माने जाते हैं।

कमलनाथ करीबियों में पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी भी माने जाते हैं। सुरेश पचौरी की सलाह पर ही कमलनाथ ने शोभा ओझा को मीडिया विभाग का अध्यक्ष और राजीव सिंह को प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रशासन और संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है। सुरेश पचौरी के नरसिंहपुर-होशंगाबाद संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने की चर्चाएं हमेशा ही रहतीं हैं। सुरेश पचौरी नरसिंहपुर और होशंगाबाद की राजनीति में लगातार दिलचस्पी भी दिखाते हैं।

नरसिंहपुर के किसान आंदोलन में भी सुरेश पचौरी ने मुख्यमंत्री के समक्ष किसानों की मांगे रखीं थीं। ऐसे में नरसिंहपुर जिले में टिकट के दावेदारों को विवेक तन्खा के जरिए चर्चा के लिए कमलनाथ द्वारा बुलाया जाना नए राजनीतिक समीकरणों के बनने का संकेत दे रहा है।

राहुल गाँधी ने दतिया मे सभा को संबोधित करते हुए कहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीबों का अपमान किया

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 2 दिन के चुनावी दौरे के लिए सोमवार को ग्वालियर पहुंच चुके हैं। राहुल गांधी ने अपने दौरे की शुरुआत मां पीतांबरा देवी के दर्शन से की। शक्तिपीठ में उन्होंने पूजा-अर्चना की,जहाँ उनके साथ मंदिर में सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ भी मौजूद हैं।

राहुल अगले दो दिनों तक मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव वाले इलाकों में रोड शो और रैली के जरिए चुनाव प्रचार करेंगे। वहीं सोमवार शाम राहुल गांधी ग्वालियर में रोड शो करेंगे। इस दौरान वह एक दरगाह में जियारत भी करेंगे।

मध्य प्रदेश के ग्वालियर क्षेत्र में विधानसभा की कुल 34 सीटें हैं। साल 2013 के चुनाव में बीजेपी ने इन 34 सीटों में से 20 सीटों पर कब्जा जमाया था। इससे साफ है कि मध्य प्रदेश में सत्ता में वापसी का सपना देख रही कांग्रेस को इस इलाके में इस बार बेहतरीन प्रदर्शन करना होगा जिसके लिए पार्टी राहुल गांधी को मैदान में उतारकर उसी की तैयारी कर रही है।

लाइव अपडेट्स

-प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों का अपमान किया :राहुल गाँधी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्योगपतियों को लाभ पहुँचाया :राहुल गाँधी

प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों का कर्ज माफ़ नहीं किया:राहुल गाँधी

कांग्रेस की सरकार ने किसानों का क़र्ज़ माफ़ किया है: राहुल गाँधी

श्योपुर में एकता परिषद और सबलगढ़ में रामनिवास रावत का हो रहा है विरोध

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श्योपुर जिले की विजयपुर सीट पर कांग्रेस और एकता परिषद के बीच हुए समझौते के बाद आदिवासियों को दो गुटों में बांटने की कवायद तेज हो गई है। श्योपुर जिले में एक नया आदिवासी संगठन सहरिया विकास परिषद ने एकता परिषद के उम्मीदवार के बहिष्कार की घोषणा कर दी है। सबलगढ़ में भी कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत को बाहरी बताकर कांग्रेस में ही उनका विरोध तेज हो गया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की यात्रा की तैयारियों के लिए सबलगढ़ गए सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने कोंग्रेसियों ने रावत के खिलाफ नारेबाजी की।

सहरिया विकास परिषद उतारेगा श्योपुर जिले में अपने उम्मीदवार

श्योपुर जिला सहरिया आदिवासी बाहुल्य जिला है। एकता परिषद का इन आदिवासियों पर खासा प्रभाव है। एकता परिषद ने अपने दिल्ली मार्च के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से विजयपुर की सीट पर आदिवासी को कांग्रेस का टिकट देने का सुझाव रखा था। राहुल गांधी ने उम्मीदवार का नाम तय करने की जिम्मेदारी एकता परिषद के नेताओं पर डाल दी। एकता परिषद जिला पंचायत सदस्य गोपाल डी भास्कर का नाम आगे बढ़ाया है। विजयपुर से कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत विधायक हैं उन्हें मुरैना जिले की सबलगढ़ सीट पर भेजा जा रहा है। सहरिया आदिवासी विकास परिषद भी जिले में आदिवासियों के बीच सक्रिय है।

सहरिया विकास परिषद, एकता परिषद के नेताओं पर भाजपा से हाथ मिलने का आरोप लंबे समय से लगा रही है। पिछले दो चुनाव में एकता परिषद ने भाजपा का खुलकर समर्थन किया था। इस चुनाव में वह कांग्रेस के साथ जा रही है। सहरिया विकास परिषद ने शुक्रवार को कराहल के झरेर गांव में बीस गांव के आदिवासियों की पंचायत बुलाई थी। इस पंचायत में एकता परिषद और भाजपा के उम्मीदवार के बहिष्कार का एलान किया गया। जिले में आदिवासियों के दो धड़े में बंट जाने की स्थिति में यहां चुनावी गणित बुरी तरह गड़बड़ा सकते हैं।

बाहरी के नाम पर सबलगढ़ में रामनिवास रावत का विरोध

एकता परिषद से हुए समझौते के तहत विजयपुर के विधायक रामनिवास रावत को मुरैना जिले की सबलगढ़ विधानसभा सीट से टिकट दिया जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की पहल पर रावत को सबलगढ़ भेजने के फैसले पर राज्य कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं ने अपनी सहमति भी दे दी है। रामनिवास रावत,सिंधिया के करीबी विधायक हैं। सिंधिया शुक्रवार को रावत को लेकर सबलगढ़ भी पहुंचे थे। सिंधिया की सबलगढ़ यात्रा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की श्योपुर यात्रा की तैयारियों से संबधित थी। सबलगढ़ में सिंधिया के स्वागत के दौरान कांग्रेसी नेताओं ने रावत का विरोध करते हुए नारेबाजी भी की। कांग्रेसी स्थानीय नेता को टिकट देने की मांग कर रहे थे।

एकता परिषद को मनाने राहुल गांधी ने कुर्बान की मध्यप्रदेश की एक सीट

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6 अक्टूबर को एकता परिषद के दिल्ली मार्च में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हिस्सा लिया था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को इस मंच तक पहुंचने के लिए अपने एक विधायक रामनिवास रावत की सीट बदलना पड़ रही है। रामनिवास रावत मध्यप्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक हैं। वे पिछले 28 साल से इस क्षेत्र में चुनाव लड़ रहे हैं। रामनिवास रावत का निर्वाचन क्षेत्र श्योपुर जिले की विजयपुर विधानसभा सीट है। श्योपुर जिला राजस्थान की सीमा से लगा हुआ है। श्योपुर जिले में सहरिया आदिवासी वोट निर्णायक माने जाते हैं। इस आदिवासी वोट बैंक पर एकता परिषद का गहरा प्रभाव है। आदिवासी उसे ही वोट देते हैं जिसे देने का निर्णय एकता परिषद के नेता करते हैं।

आदिवासी वोट कांग्रेस को दिलाने के बदले में एकता परिषद के नेताओं ने विजयपुर की सीट उनके उम्मीदवार को देने की मांग राहुल गांधी के समक्ष रखी थी। राहुल गांधी ने इस मांग को तत्काल मंजूर भी कर लिया। बताया जाता है कि उन्होंने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ को कहा था कि रामनिवास रावत को किसी ओर सीट पर चुनाव लड़ने के लिए भेज दिया जाए। रामनिवास रावत को दो विकल्प कमलनाथ की ओर से दिए गए थे। पहला श्योपुर और दूसरा सबलगढ़ विधानसभा सीट का विकल्प दिया गया था। सबलगढ़ सीट मुरैना जिले में आती है। बताया जाता है कि रामनिवास रावत ने पहले श्योपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का मन बनाया था। लेकिन, कांग्रेस नेता तुलसीनारायण मीणा के बसपा में शामिल होने के बाद उन्होंने अपना ध्यान सबलगढ़ पर केंद्रित कर दिया है।

सबलगढ़ मुरैना जिले में आता है। यह क्षेत्र रावत बाहुल्य क्षेत्र है। पिछले चुनाव में इस सीट पर भाजपा के मेहरबान सिंह रावत चुनाव जीते थे। मेहरबान सिंह रावत की टिकट कटने की चर्चाएं भी भाजपा में चल रहीं हैं। रामनिवास रावत को यदि कांग्रेस सबलगढ़ से उम्मीदवार बनाती है तो भाजपा को मजबूरी में मेहरबान सिंह रावत को उम्मीदवार बनाना होगा। रामनिवास रावत की सीट विजयपुर से जिला पंचायत के सदस्य गोपाल भास्कर का नाम कांग्रेस के टिकट के लिए एकता परिषद ने कांग्रेस अध्यक्ष को सुझाया है।

रामनिवास रावत कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के करीबी हैं। वे प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यवाहक अध्यक्ष भी हैं। श्री रावत ने वर्ष 1990 में विजयपुर से पहली बार चुनाव लड़ा था। वे वर्ष 2003 का विधानसभा चुनाव हार गए थे। पिछले दो चुनाव से उनकी जीत का अंतर लगातार कम हो रहा है। इसकी वजह एकता परिषद का झुकाव भाजपा की ओर रहा है। एकता परिषद पिछले दो चुनाव से इस क्षेत्र में भाजपा का समर्थन करती आ रही है। कोलारस विधानसभा के उप चुनाव के दौरान एकता परिषद और कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया करीब आए थे। राहुल गांधी की एकता परिषद के नेताओं से मुलाकात में भी सिंधिया की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही थी।

आखिर भाजपा को क्यों बदलनी पड़ी सिंधिया को घेरने की रणनीति

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ग्वालियर एवं चंबल की संभाग  की 34 विधानसभा सीट और तीन लोकसभा सीटों को जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को घेरने की रणनीति में बदलाव करना पड़ा है। भाजपा अब तक तक सिंधिया को अंग्रेजों का मित्र बताकर ज्योतिरादित्य सिंधिया पर हमले किया करती थी, अब पार्टी सिंधिया परिवार की तारीफ कर इस क्षेत्र में अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अपने ग्वालियर संभाग के दौरे में कार्यकर्त्ताओं से वोट सिंधिया परिवार के नाम पर ही मांगे। 

ग्वालियर संभाग कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव वाला क्षेत्र है। प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता अनिल सौमित्र कहते हैं कि सिंधिया परिवार के अधिकांश सदस्य भाजपा में है। इसका फायदा भी भाजपा को इस संभाग में मिलता रहा है और आगे भी मिलता रहेगा। यहां उल्लेखनीय है ज्योतिरादित्य सिंधिया को घेरने के लिए भाजपा अक्सर महारानी लक्ष्मीबाई की शहादत का जिक्र करती है। सिंधिया परिवार को अंग्रेजों का दोस्त बताती है। भाजपा को इस मुद्दे पर क्षेत्र में कभी समर्थन नहीं मिला। इसकी बड़ी वजह सिंधिया राजवंश द्वारा अपने रियासत में कराए गए विकास कार्य हैं।

सिंधिया परिवार के किसी भी सदस्य पर अब तक न तो कोई भ्रष्टाचार के आरोप हैं और न ही राजनीति को गंदा करने के उदाहरण उनके साथ जुड़े हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया का चेहरा प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में सबसे चमकदार और प्रभावी चेहरा माना जाता है। भाजपा के पास ऐसा कोई शस्त्र नहीं है जिसके जरिए वे सिंधिया के असर को कम कर सकें। संभवत: यही वजह है कि भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है।

सिंधिया परिवार की तारीफ कर अमित शाह अपनी पार्टी  के नाराज कार्यकर्त्ताओं को भी शांत करना चाहते हैं। अमित शाह ने शिवपुरी में विजयाराजे सिंधिया के योगदान का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी जन्मशती वर्ष में क्षेत्र के कार्यकर्त्ताओं को पार्टी को एतिहासिक विजय दिला कर अपनी श्रदांजलि अर्पित करना चाहिए। सिंधिया परिवार के खिलाफ गड़े मुर्दे उखाड़ने का दांव भाजपा के सामने भी कई सवाल खड़े कर रहा था। पार्टी को सबसे ज्यादा असुविधा राजस्थान में हो रही थी।

राजस्थान में विजयाराजे सिंधिया की बेटी वसुंधरा राजे सिंधिया नाराज थीं। मध्यप्रदेश में सिंधिया परिवार पर लगाए जा रहे आरोपों के कारण राजस्थान में भाजपा को जवाब देना मुश्किल पड़ रहा है। भाजपा से भी लोग पूछ रहे हैं कि आजादी की लड़ाई में उनके किस नेता का योगदान रहा है? भाजपा चुनाव अभियान में देशभक्ति की बात तो करती है लेकिन, स्वतंत्रता संग्राम में अपने योगदान को लेकर चुप रहती है।  

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