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मोदी कैबिनेट से बाहर हुई मेनका गांधी को मिल सकती है यह बड़ी जिम्मेदारी

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ऐतिहासिक जीत और पूर्ण बहुमत के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ली है। पीएम मोदी ने अपनी कैबिनेट में कुल 24 कैबिनेट मंत्री, 9 राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार और 24 राज्य मंत्रियों को शामिल किया है।

एक ओर जहां प्रधानमंत्री मोदी ने सरकार में कई नए चेहरों को शामिल किया है तो वहीं दूसरी ओर के दिग्गज नेता सरकार से बाहर भी हुए है। सरकार में जिन नेताओं को जगह नही मिली है उनमें अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, राज्यवर्धन राठौर और मेनका गांधी शामिल है। अरुण जेटली और सुषमा स्वराज के बारे में कहा जा रहा है कि यह स्वयं की मर्जी से सरकार में शामिल नही हुए वहीं राठौर और मेनका गांधी को सरकार से बाहर रखने का कारण अभी तक स्पष्ट नही हुआ है।

मेनका गांधी पिछली सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री थी। 8 बार की सांसद मेनका गांधी के बारे में कहा जा रहा है कि उन्हें सरकार में शामिल न करके पार्टी उन्हें लोकसभा का अस्थाई स्पीकर बना सकती है।

मोदी सरकार में शामिल मंत्रियों की सूची

कैबिनेट मंत्री

  1. राजनाथ सिंह ( उत्तर प्रदेश)
  2. अमित शाह (पहली बार) (गुजरात)
  3. नितिन गडकरी (महाराष्ट्र)
  4. सदानंद गौड़ा (कर्नाटक)
  5. निर्मला सीतारमण (राज्यसभा सदस्य) (तमिलनाडु)
  6. राम विलास पासवान (बिहार)
  7. नरेंद्र सिंह तोमर (मध्य प्रदेश)
  8. रविशंकर प्रसाद (बिहार)
  9. हरसिमरत कौर बादल (पंजाब)
  10. थावर चंद गहलोत (राज्यसभा सदस्य) (मध्य प्रदेश)
  11. एस जयशंकर (पहली बार) (दिल्ली)
  12. डॉ. रमेश पोखरियाल (पहली बार) (उत्तराखंड)
  13. अर्जुन मुंडा (पहली बार) (झारखंड)
  14. स्मृति इरानी (उत्तर प्रदेश)
  15. डॉ हर्षवर्धन (दिल्ली)
  16. प्रकाश जावडेकर (राज्य सभा सदस्य) (मध्य प्रदेश)
  17. पीयूष गोयल (राज्य सभा सदस्य)
  18. धर्मेंद्र प्रधान (राज्य सभा सदस्य)
  19. मुख्तार अब्बास नकवी (राज्य सभा सदस्य) (उत्तर प्रदेश)
  20. प्रहलाद जोशी (पहली बार) (कर्नाटक)
  21. महेंद्र नाथ पांडेय (उत्तर प्रदेश)
  22. अरविंद सावंत (पहली बार) (महाराष्ट्र)
  23. गिरिराज सिंह (बिहार)
  24. गजेंद्र सिंह शेखावत (राजस्थान)

राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार

  1. संतोष कुमार गंगवार (उत्तर प्रदेश)
  2. राव इंद्रजीत सिंह (हरियाणा)
  3. श्रीपद नाइक (गोवा)
  4. जितेंद्र सिंह (जम्मू कश्मीर)
  5. किरन रिजिजू (अरुणाचल प्रदेश)
  6. प्रहलाद पटेल (पहली बार) (मध्य प्रदेश)
  7. आर के सिंह (बिहार)
  8. हरदीप सिंह पुरी (पंजाब)
  9. मनसुख मांडविया (गुजरात)

राज्य मंत्री

  1. फग्गन सिंह कुलस्ते (मध्य प्रदेश)
  2. अश्विनी चौबे (बिहार)
  3. अर्जुनराम मेघवाल (राजस्थान)
  4. जनरल वीके सिंह (उत्तर प्रदेश)
  5. कृष्णपाल सिंह गुर्जर (हरियाणा)
  6. राव साहब दानवे (महाराष्ट्र)
  7. जी कृष्ण रेड्डी (पहली बार) (तेलंगना)
  8. पुरुषोत्तम रुपाला (गुजरात)
  9. रामदास आठवले (महाराष्ट्र)(राज्यसभा सदस्य)
  10. साध्वी निरंजन ज्योति (उत्तर प्रदेश)
  11. संजीव बालियान (उत्तर प्रदेश)
  12. बाबुल सुप्रीयो (पश्चिम बंगाल)
  13. संजय शामराव (पहली बार)( महाराष्ट्र)
  14. अनुराग ठाकुर (पहली बार)(हिमाचल प्रदेश)
  15. सुरेश अंगाडी (पहली बार) (कर्नाटक)
  16. नित्यानंद राय (पहली बार) (बिहार)
  17. रतनलाल कटारिया (पहली बार) (हरियाणा)
  18. वी मुरलीधरन (पहली बार)(राज्यसभा) (महाराष्ट्र)
  19. रेणुका सिंह (पहली बार)(छत्तीसगढ़ )
  20. सोम प्रकाश (पहली बार) (पंजाब)
  21. रामेश्वर तेली (पहली बार)(असम)
  22. प्रताप चंद(ओडिशा)
  23. कैलाश चौधरी (पहली बार)(राजस्थान)
  24. देबश्री चौधरी (पहली बार) (पश्चिम बंगाल)

कांग्रेस ने एक महीने के लिए चैनलों में प्रवक्ता भेजना बंद किया, बीजेपी भी करे ऐसा: रविश कुमार

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कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने एक महीने के लिए चैनलों में प्रवक्ता न भेजने का एलान किया है। कांग्रेस का यह फैसला मीडिया और राजनीति के हित में है। कम से कम कांग्रेस के हित में तो है। क़ायदे से कांग्रेस को यह काम चुनाव के पहले करना चाहिए था जब तेजस्वी यादव ने ऐसा करने के लिए विपक्षी दलों को पत्र लिखा था। चुनाव हारने के बाद समाजवादी पार्टी ने अपने प्रवक्ताओं की टीम भंग कर दी ताकि वे किसी डिबेट में अधिकृत तौर पर जा ही न सकें। यह फ़ैसला कहीं से मीडिया विरोधी नहीं है। वैसे भी मीडिया से संपर्क रखने का एकमात्र तरीक़ा डिबेट नहीं है। कांग्रेस के इस फ़ैसले को 2014 के बाद मीडिया की नैतिकता में आए बदलवा के संदर्भ में देखना चाहिए।

कांग्रेस का यह फ़ैसला अच्छा है मगर कमज़ोर है। उसे प्रवक्ताओं के साथ खलिहर हो चुके सीनियर नेताओं पर भी पाबंदी लगा देनी चाहिए। अगर वे जाना बंद न करें तो अमित शाह से बात कर बीजेपी में ज्वाइन करा देना चाहिए। प्रधानमंत्री ने भरी सभा में अपने सांसदों से कहा कि छपास और दिखास से दूर रहें। किसी ने नहीं कहा कि एक जनप्रतिनिधि को चुप रहने की सलाह देकर प्रधानमंत्री सांसद की स्वायत्ता समाप्त कर रहे हैं। मतलब साफ़ था कि पार्टी एक जगह से और एक तरह से बोलेगी। आपने पाँच साल में बीजेपी सांसदों को चुप ही देखा होगा जबकि उनमें से कितने ही क़ाबिल थे। बिना मीडिया से बोले एक सांसद अपना कार्यकाल पूरा करे यह भयावह है।

कांग्रेस को चुनावों के समय मीडिया के स्पेस में मिली जगह का अध्ययन करना चाहिए। राहुल गांधी को थोड़ी बहुत जगह तो मिली लेकिन बाकी नेताओं को बिल्कुल नहीं। राहुल गांधी की सभा को सिंगल और आधे कॉलम में छापा गया जबकि बीजेपी के हर नेता की सभी को बड़ा कर छापा गया। सरकार की असफलताओं पर पर्दा डाला गया और विपक्ष का निरंतर मज़ाक़ उड़ाया गया। पूरे पाँच साल यही चला है। सारी बहस बीजेपी के थीम को सही मानते हुए की गई। स्क्रीन पर बीजेपी का एजेंडा फ़्लैश करता रहा और कांग्रेस के प्रवक्ता वहाँ जाकर उस बहस को मान्यता देते रहे।

एक सवाल आप सभी पूँछें। क्या मीडिया में विपक्ष दिखता था? वह मार खाते लुटते पिटते दिखता था। खुलेआम एंकर विपक्ष के नेता को पप्पू कहता था। मज़ाक़ उड़ाया गया। मीडिया ने एक रणनीति के तहत विपक्ष और कांग्रेस को ग़ायब कर दिया। कांग्रेस के प्रेस कांफ्रेंस को स्पीड न्यूज़ में सौ ख़बरों के बीच चलाया गया और बीजेपी नेताओं की हर बात बहस हुई। बहस भी एकतरफ़ा हुई। मीडिया ने सरकार के सामने जनता की बात को भी नहीं रखा। एंटी विपक्ष पत्रकारिता की शुरूआत हुई ताकि लोगों को लगे कि मीडिया आक्रामक है। सवाल सरकार से नहीं विपक्ष से पूछा गया। विपक्ष नहीं मिला तो लिबरल को गरियाया गया।

कांग्रेस में नैतिक बल नहीं है। वरना हिन्दी प्रदेशों के तीनों मुख्यमंत्री अब तक व्हाइट पेपर रख सकते थे कि बीजेपी की सरकारों में किस मीडिय को पैसा दिया गया। पैसा देने का मानक क्या था और किस तरह भेदभाव किया गया। कांग्रेस की टीम अब तक अपनी रिपोर्ट लेकर तैयार होती कि कैसे इस चुनाव में मीडिया ने एकतरफ़ा बीजेपी के लिए काम किया। अज्ञात जगहों से आए निर्देशों के मुताबिक़ न्याय पर चर्चा नहीं हुई। कांग्रेस बग़ैर मीडिया से लड़े कोई लड़ाई नहीं लड़ सकती है। उसके मैनिफ़ेस्ट में मीडिया में सुधार की बात थी मगर उसके नेता ही चुप लगा गए।

मैं तो बीजेपी से भी अपील करता हूँ कि वह अपना प्रवक्ता न भेजे। अभी तक गोदी मीडिया के एंकर कम लागत वाली चाटुकारिता और प्रोपेगैंडा कर रहे थे। स्टूडियो में तीन लोगों को बिठाया और चालू। बीजेपी अब कहे कि मोदी सरकार की कामयाबी को ज़मीन से दिखाइये। जब ज़मीन से रिपोर्ट बनेगी तो कई सौ रिपोर्टरों को नौकरी मिलेगी। भले ही संघ की विचारधारा के रिपोर्टर को ही मिले। पर क्या यह संघ के हित में नहीं है कि उसकी बीन पर नाचने वाले एक एंकर न होकर कई रिपोर्टर हों। कम से कम वह अपने समर्थकों को रोजगार तो दिलाए। बीजेपी ने मेरा बहिष्कार किया है फिर भी मैं चाहता हूँ कि वह प्रवक्ता किसी भी चैनल में न भेजे। जब बहिष्कार नहीं किया था और एंकर नहीं बना था तब से इस डिबेट के ख़िलाफ़ लिख रहा हूँ।

डिबेट की प्रासंगिकता समाप्त हो चुकी है। इसकी उपयोगिता प्रोपेगैंडा फैलाने तक ही सीमित है। इसमें सूचना नहीं होती है। सिर्फ धारणा होती है। डिबेट के कारण किसी चैनल के पास कंटेंट नहीं हैं। मेहनती रिपोर्टर हटा दिए गए हैं। एंकरों को लाया गया है जो पूरी सैलरी लेकर चौथाई काम करते हैं। डिबेट में कोई काम नहीं करना होता है। सिर्फ प्रवक्ताओं के आने के समय पर नज़र रखनी होती है। अपना पेट कम रखना होता है और कपड़े ठीक पहनने होते हैं। एक एंकर औसतन दो से तीन घंटे ही काम करता है। मेरी मानें तो डिबेट करने वाले सारे एंकर की सैलरी आधी कर जी जानी चाहिए। डिबेट ने चैनलों की रचनात्मकता को समाप्त कर दिया है। कंटेंट से ख़ाली चैनल एक दिन न चल पाए अगर बीजेपी और कांग्रेस अपना प्रवक्ता न भेजें। ख़ाली हो चुके चैनलों को भरने की ज़िम्मेदारी कांग्रेस अपनी हत्या की क़ीमत पर क्यों उठाए ?

कांग्रेस को यह क़दम कम से कम एक साल के लिए उठाना चाहिए था। एक महीने तक प्रवक्ता न भेजने से दूसरे नंबर के एंकर मारे जाएँगे। क्योंकि इस दौरान बड़े एंकर छुट्टी पर होते हैं। यूपीए के समय एक पद बड़ा लोकप्रिय हुआ था। राजनीतिक संपादक का। संपादक नाम की संस्था की समाप्ति के बाद यह पद आया। तब भी राजनीतिक संपादक महासचिवों और मंत्रियों के नाम और इस्तीफे की ख़बर से ज़्यादा ब्रेक नहीं कर पाते थे। लेकिन अब तो सूत्र भी समाप्त हो गए हैं। शपथ ग्रहण के दिन तक राजनीतिक संपादक बेकार बैठे रहे। मीडिया के मोदी सिस्टम में किसी को हवा ही नहीं लगी कि कौन मंत्री था। चैनलों के सीईओ राजनीतिक संपादकों को निकाल कर भी काफ़ी पैसा बचा सकते हैं। इनका काम सिर्फ मोदी-शाह के ट्वीट को री ट्वीट करना है। इनकी जगह क़ाबिल रिपोर्टरों पर निवेश किया जा सकता है।

न्यूज़ चैनल तटस्थ नहीं रहे। अब नहीं हो सकते। चैनल सिर्फ सत्ता के प्रति समर्पित होकर ही जी सकते हैं। उन्हें सत्ता में समाहित होना ही होगा। इन चैनलों में लोकतंत्र की हत्या होती है। एंकर हत्यारे हैं। आप खुद भी चैनलों को देखते समय मेरी बात का परीक्षण कीजिए। उम्मीद है मोदी समर्थक भी समझेंगे। वे मोदी की कामयाबी और मीडिया की नाकामी में फ़र्क़ करेंगे। एक सवाल पूछेंगे कि क्या वाक़ई डिबेट में मुद्दों की विविधता है? जनता की समस्याओं का प्रतिनिधित्व है? क्या वाक़ई इन चैनलों की पत्रकारिता पर गर्व होता है?

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है)

बिहार में बोले प्रधानमंत्री मोदी, एक तरफ वोट भक्ति और दूसरी तरफ देशभक्ति की राजनीति

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बिहार के अररिया में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने आज कांग्रेस पर जमकर हमला बोला। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि देश मे आज एक तरफ वोटभक्ति की राजनीति हो रही है तो दूसरी तरफ देशभक्ति की।

प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि “याद करिए 26/11 को मुम्बई में जब आतंकी हमला हुए था तब कांग्रेस सरकार ने क्या किया था ? तब देश के वीर जवानों ने पाकिस्तान में घुसकर बदल लेने की इजाजत मांगी थी लेकिन कांग्रेस सरकार ने उन्हें कुछ भी करने के लिए मन कर दिया।

कांग्रेस ने ऐसा इसलिए किया क्यों क्योंकि वो वोटेभक्ति की राजनीति करती है।

प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि ” सबको पता था कि आतंकी पाकिस्तान से आए थे लेकिन कांग्रेस ने उन्हें सजा देने की बजाय हिंदुओं को आतंकी बताने पर ध्यान लगाया।

https://twitter.com/ANI/status/1119516297262452737?s=19

Video: पुलवामा हमले पर कांग्रेस ने माफी सरकार से पूछे 10 प्रश्न

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कांग्रेस मीडिया विभाग के अध्यक्ष रणदीप सिंह सुरजेवाला ने आज कांग्रेस दफ्तर में प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए मोदी सरकार कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर हमला बोला। प्रेस वार्ता में सुरजेवाला ने सरकार से 10 प्रश्न भी पूछे।

वीडियो में देखें सुरजेवाला की प्रेस वार्ता के प्रमुख अंश

https://youtu.be/2IKi9rxCy4A

लोकसभा में प्रधानमंत्री मोदी का भाषण लाईवः भाजपा की बुराई करते करते लोग देश की बुराई करने लगते हैं

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समय लोकसभा में भाषण देते हुए राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब दे रहे हैं। अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि जब एक गरीब ने दिल्ली की सल्तनत को चुनौती दी तो कांग्रेस इसे पचा नहीं पा रही है।

वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का नाम लिए बगैर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इनके लिए AD का मतलब आफ्टर डायनेस्टी और BC का मतलब बिफोर कांग्रेस है। प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि दुख होता है कि लोग मोदी और बीजेपी की आलोचना करते-करते लोग देश की बुराई करने लगते हैं।

हमारे लाईव ब्ल़ॉग पर पढ़ें प्रधानमंत्री मोदी का लोकसभा में भाषण और उस से जुड़ी अन्य लाईव अपडेट्स

हां, भाजपा ने चुनाव जीतने के लिए मेरा इस्तेमाल कियाः अन्ना हजारे

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हां, भाजपा ने 2014 में मेरा इस्तेमाल किया। हर कोई जानता है कि लोकपाल के लिए मेरा आंदोलन ही था जिसने भाजपा और आम आदमी पार्टी को सत्ता में पहुंचाया। लेकिन अब मैंने उनसे सब संबंध खत्म कर दिए हैं। 30 जनवरी से अपने गांव रालेगण-सिद्धि में भूख हड़ताल पर बैठे समाजसेवी अन्ना हजारे ने मीडिया को संबोधित करते हुए बात कही। अन्ना हजारे ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार केवल देश के लोगों को गुमराह कर रही है और देश को निरंकुशता की ओर अग्रसर कर रही है। केन्द्र के साथ ही महाराष्ट्र सरकार पर भी हमला बोलते हुए अन्ना ने कहा कि भाजपा की अगुवाई वाली महाराष्ट्र सरकार पिछले चार सालों से झूठ बोल रही थी। यह झूठ कब तक जारी रहेगा? राज्य सरकार का दावा है कि मेरी 90 प्रतिशत मांगें भी गलत हैं। इस सरकार ने देश के लोगों को निराश किया है।

समाजसेवी हजारे ने आगे कहा कि वह लोग जिनको 2011 और 2014 में उनके आंदोलन को लाभ हुआ, अब उन्होने इन मांगों से मुंह मोड़ लिया और पिछले पांच वर्षों में उन्हें लागू करने के लिए कुछ नहीं किया। अन्ना ने भाजपा की तरफ इशारा करते हुए कहा कि वह कहते रहते हैं कि केंद्र और राज्य सरकार के मंत्री आएंगे और मेरे साथ मुद्दों पर चर्चा करेंगे। लेकिन मैं उन्हें मना कर देता हूं क्योंकि इसेसे लोग भ्रमित होंगे। वह लोग पहले खुद निर्णय लें और मुझे लिखित रूप में सब कुछ दें क्योंकि मैने उनके आश्‍वासनों पर विश्‍वास खो दिया है।

मंत्रियों सहित मिलने पहुंचे मुख्यमंत्री फडणवीस

भूख हड़ताल पर बैठे अन्ना हजारे से मिलने मंगलवार को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह और रक्षा राज्यमंत्री सुभाष भामरे उनके गांव रालेगन सिद्धी पहुंचे। इससे पहले भी राज्य सरकार के प्रतिनिधियों के साथ अन्ना की बैठक हुई थी। हालांकि, ये दोनो मुलाकातें बेअसर नजर आईं, क्योंकि अन्ना हजारे से साफ तौर पर कहा है कि वे अपनी भूख हड़ताल फिलहाल खत्म करने वाले नहीं हैं। अन्ना के आंदोलन पर राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि केंद्र और राज्य ने हजारे की मांगों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। उनकी मांगों के अनुसार, हमने राज्य में लोकायुक्तों के कार्यान्वयन के लिए एक संयुक्त समिति नियुक्त की है। इसी प्रकार केंद्र ने भी लिखित में अपना आश्‍वासन दिया है। मुझे यकीन है कि वह महाराष्ट्र के लोगों की इच्छा का सम्मान करते हुए वे जल्द से जल्द अनशन खत्म करेंगे।

समर्थन में उतरीं शिवसेना-मनसे

इस बीच हजारे का समर्थन करते हुए शिवसेना ने कहा कि सरकार को एक बुजुर्ग इंसान के जीवन के साथ नहीं खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एक बयान में कहा कि उपवास के बजाय, हजारे को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक आंदोलन का नेतृत्व करना चाहिए और उनकी पार्टी पूरी ईमानदारी के साथ उनका समर्थन करेगी। उधर, मनसे भी हजारे के समर्थन में उतर आई है। मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने सोमवार को हजारे से मुलाकात भी की। बैठक के बाद राज ने कहा कि हजारे को अपना उपवास खत्म कर देना चाहिए और इसके बजाय भाजपा सरकार को आड़े हाथ लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैंने उनसे कहा कि इन लोगों के लिए अपनी जान जोखिम में न डालें।

यशवंत सिन्हा का मोदी पर निशाना, बोले- भाजपा में कोई नहीं उठा सकता उनके खिलाफ आवाज

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भाजपा के वरिष्ठ नेता रह चुके पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा इन दिनों खुलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोल रहे हैं। लोकसभा चुनाव से पहले अब विपक्ष के साथ ही भाजपा के अपने नेता भी प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना कर रहे है। शत्रुघन सिन्हा, अरुण शौरी, यशवंक सिन्हा के साथ ही अब केंद्र मंत्री नितिन गडकरी के बयान भी अब पार्टी के लिए मुश्किल खडी कर रहे हैं। इसी बाच अब यशवंत सिन्हा ने एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि मोदी ने सबको मैनेज करके रखा हुआ है। कोई भी उनके खिलाफ आवाज नहीं उठा सकता। लोकसभा चुनाव 2014 का जिक्र करते हुए सिन्हा ने कहा कि उस समय देश की जनता ने पार्टी को जबरदस्त जनादेश दिया था और वो भाजपा की ऐतिहासिक जीत थी इसमें कोई शक नहीं है लेकिन पीएम मोदी ने लोगों के विश्‍वास के साथ धोखा किया और सब बर्बाद कर दिया।

लालकृष्ण आडवाणी के दौर को याद करते हुए सिन्हा ने कहा कि तब ऐसा कुछ नहीं था। तब सब साथ मिलकर चलते थे। हर कोई पार्टी में अपनी बात रखता था। कई मुद्दों पर चर्चा होती थी और हर खबर पर ध्यान दिया जाता था लेकिन मोदी ने सब बिखेर दिया।

नोटबंदी के मुद्दे पर बोलते हुए सिन्हा ने कहा कि मोदी के इस फैसले से जनता का उनसे मोहभंग हुआ। 1000 के बदले 2000 का नोट लाई, इसमें क्या तर्कसंगत था। छोटे व्यापारियों को नुकसान हुआ लेकिन मोदी ने उनका हाल जानने या समझने तक की कोशिश नहीं की।

बता दें कि सिन्हा भाजपा के बागी नेता बन चुके हैं। हाल ही के दिनों में उन्होंने सपा और बसपा को गठबंधन में कांग्रेस को शामिल करने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि अगर मोदी को सत्ता से हटाना है तो उत्तर प्रदेश में तीनों एकसाथ हो जाओ।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने दिल्ली में की प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात

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मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने आज नई दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की है।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फडणवीस ने प्रधानमंत्री मोदी को शेर और विपक्ष को बताया कुत्ते-बिल्ली

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रविवार को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने रविवार को भाजपा युवा मोर्चा के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जंगल का राजा बताते हुए विपक्ष की तुलना कुत्ते- बिल्ली से की। इसके साथ ही उन्होंने विपक्ष पर हमला करते हुए कहा कि भाजपा के खिलाफ जुटे विपक्ष में एक भी राष्ट्रीय स्तर का नेता नहीं है।

देवेन्द्र फडणवीस ने विपक्ष पर जोरदार हमला बोलता हुए कहा कि पीएम मोदी के खिलाफ प्रस्तावित गठबंधन के पास पीएम पद का उम्मीदवार नहीं है। वहां हर दिन एक नया प्रधानमंत्री उम्मीदवार होता है। यह लोग सिर्फ सत्ता के लिए साथ आए हैं। इनके पास देश के लिए कार्य करने की कोई योजना या इच्छाशक्ति नहीं है।

मोदी को बताया जंगल का राजा

फडणवीस का आगे विपक्ष पर हमला बोलते हुए कहा कि डीएमके के नेता एमके स्टालिन, बसपा सुप्रीमों मायावती, एनसीपी प्रमुख शरद पवार या फिर पश्‍चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ये सभी अपने राज्यों में नेता है। वहीं पीएम मोदी जहां भी जाते हैं लाखों लोगों को अपनी तरफ खींचते हैं। वहीं कुत्ते- बिल्ली सिर्फ अपने क्षेत्रों में राज करते हैं। मोदी जंगल के राजा हैं।

बजट की तारीफ करते हुए देवेन्द्र फडणवीस ने कार्यक्रम में कहा कि मोदी सरकार द्वारा पेश किए गए अंतरिम बजट गरीब, किसान और आम आदमी के हित के मुताबिक बनाया गया है।

अगर प्रियंका गांधी प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ बनारस से चुनाव लड़ेंगी तो क्या होगा ?

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राजनीति में प्रियंका गांधी की औपचारिक सक्रियता की घोषणा के बाद भी उनके बारे में अटकलों का दौर खत्म नहीं हुआ है। प्रियंका को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी महासचिव बनाने के अलावा उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी भी नियुक्त किया है। पूर्वांचल का प्रभार प्रियंका गांधी को देने के बाद से यह अटकल जोर पकड़ रही है कि वे लोकसभा चुनावों में वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ सकती हैं।

वाराणसी या बनारस को पूर्वांचल की राजनीति का केंद्र माना जाता है। यहां की राजनीति का असर न सिर्फ पूर्वांचल बल्कि बिहार की कुछ लोकसभा सीटों पर भी होता है। यही वजह थी कि 2014 में नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए बनारस की सीट को चुना था। पूर्वी उत्तर प्रदेश की 40 लोकसभा सीटों में से अधिकांश पर भारतीय जनता पार्टी को 2014 में कामयाबी हासिल हुई थी। भाजपा ने नरेंद्र मोदी के बनारस से लोकसभा चुनाव लड़ने को इसकी एक प्रमुख वजह के तौर पर पेश किया था।

इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रियंका गांधी को बनारस से चुनाव लड़ाने की बात चल रही है। इस बारे में बनारस के कांग्रेस पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने भी प्रियंका गांधी से औपचारिक अपील करके उनसे इस सीट से चुनाव लड़ने का आग्रह किया है। बनारस के कुछ कांग्रेस नेताओं की मानें तो आने वाले दिनों में यहां के कुछ प्रबुद्ध लोगों और मुस्लिम समाज की ओर से भी प्रियंका गांधी से लोकसभा चुनाव लड़ने की अपील की जा सकती है।

कांग्रेस आलाकमान की ओर से अब तक ऐसा संकेत नहीं दिया गया है कि प्रियंका गांधी बनारस से चुनाव लड़ सकती हैं। लेकिन, जमीनी स्तर से जो सूचनाएं मिल रही हैं उनसे यही लगता है कि पार्टी इसकी तैयारी पूरी कर रही है कि अगर प्रियंका गांधी को चुनाव लड़ना पड़े तो उस वक्त कोई दिक्कत नहीं आए।

ऐसे में सवाल उठता है कि अगर प्रियंका गांधी वाराणसी लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ती हैं तो इसके क्या राजनीतिक मायने होंगे। इससे पूरे चुनावी परिदृश्य पर क्या असर पड़ सकता है? जो लोग बनारस से प्रियंका गांधी के चुनाव लड़ने की वकालत कर रहे हैं, उनका कहना है कि इससे न सिर्फ पूरे पूर्वांचल और उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर सकारात्मक असर पड़ेगा बल्कि पड़ोसी राज्यों में भी पार्टी को इससे फायदा मिलेगा।
उत्तर प्रदेश और बिहार, दोनों राज्यों में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा संकट यही है कि उसके कार्यकर्ताओं की संख्या लगातार घटी है और नतीजतन पार्टी का सांगठनिक ढांचा कमजोर हुआ है। जो लोग पार्टी में हैं भी, वे भी सिर्फ पार्टी के नाम पर चुनावी जीत हासिल करने की उम्मीद कम ही रखते हैं। स्थानीय नेताओं के मुताबिक ऐसे में प्रियंका गांधी के मैदान में उतरने की खबर भर से जमीनी कार्यकर्ताओं में उत्साह का जो माहौल बना है वह उनके वाराणसी से चुनावी मैदान में उतरने से और तेजी से बढ़ सकता है।

प्रियंका गांधी के नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनावी मैदान में उतरने का दूसरा असर यह होगा कि राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी बनाम प्रियंका गांधी का विमर्श खड़ा हो जाएगा। कांग्रेस इस विमर्श को आगे नहीं भी बढ़ाना चाहेगी तब भी यह विमर्श चल पड़ेगा। इससे भाजपा और उसके सहयोगी दलों का वह विमर्श फीका पड़ सकता है जिसमें वे 2019 के लोकसभा चुनावों को नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी करके विकल्पहीनता को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाते हुए नरेंद्र मोदी के पक्ष में गोलबंदी करना चाहते हैं। नरेंद्र मोदी के सामने प्रियंका गांधी के उतरते ही आम लोगों में चाहे-अनचाहे यह संदेश चला जाएगा कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ राहुल गांधी के अलावा प्रियंका गांधी भी एक सशक्त विकल्प हैं।

वाराणसी से नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रियंका गांधी के चुनाव में उतरने का एक असर यह भी हो सकता है कि मोदी को वाराणसी में ही उलझाकर रखने के मकसद से सपा-बसपा गठबंधन इस सीट पर अपना उम्मीदवार न उतारे। पहले भी इस गठबंधन ने राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी में और सोनिया गांधी के खिलाफ रायबरेली में उम्मीदवार न उतारने की घोषणा कर दी है। ऐसे में अगर प्रियंका बनारस से चुनाव लड़ती हैं और सपा-बसपा अपना उम्मीदवार नहीं उतारते हैं तो नरेंद्र मोदी के लिए यह सीट आसान नहीं रहेगी। तब नतीजा किसी भी ओर जा सकता है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो प्रियंका गांधी अगर बनारस से लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के खिलाफ उतरती हैं तो इससे न सिर्फ इस सीट पर रोचक चुनावी संघर्ष देखने को मिलेगा, बल्कि इसका असर पूरे उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा।

(सत्याग्रह के लिए हिमांशु शेखर द्वारा लिखे गए आलेख के संपादित अंश साभार)

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