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Wednesday, September 30, 2020

जानें आखिर क्यों प्रियंका गांधी को मिली सिर्फ पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी ?

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सक्रिय राजनीती में प्रियंका गाँधी के प्रवेश के बाद उत्तरप्रदेश के साथ ही देश की राजनीती का परिदृश्य तीजी से बदल रहा है। प्रियंका के आने से जहां कांग्रेस के हौसले बुलंद है तो वहीं भाजपा के साथ ही सपा-बसपा गठबंधन भी अब कांग्रेस के इस मास्टर स्ट्रोक के जवाब तलाश करने में लग गए हैं। ऐसे में एक सवाल सबके अंदर उठ रहा है कि आखिर प्रियंका को देश और उत्तर प्रदेश की जगह पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित क्यों रखा गया।

लोग एक सवाल और पूछ रहे हैं कि अगर प्रियंका को सियासत में आना ही था तो कांग्रेस ने माहौल क्यों नहीं बनाया? जिसे गांधी परिवार का सबसे बड़ा गेमचेंजर माना जा रहा था, उसकी सियासी एंट्री की घोषणा एक पन्ने की प्रेस विज्ञप्ति से हुई और उस पन्ने पर भी केसी वेणुगोपाल को संगठन महासचिव बनाने को ज्यादा प्रमुखता दी गई थी।

उस दिन राहुल गांधी अपने हर भाषण में ऐसे बोलते रहे जैसे प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया का कद कांग्रेस में बराबर हो। पार्टी के एक बुजुर्ग नेता प्रियंका की टाइमिंग पर नहीं कांग्रेस के रवैये पर शक जताते हुए पूछते हैं कि सबसे बड़ा धमाका करने से पहले पार्टी थोड़ी तैयारी करती तो अच्छा होता। संजय गांधी को महासचिव बनाने से पहले भी माहौल बनाया गया था। उनके निधन के बाद राजीव सियासत में आए तो माहौल गमगीन था फिर भी मीडिया को खबर दी गई थी। जब राहुल गांधी पहले महासचिव और फिर अध्यक्ष बनाए गए तो उनको भी तरजीह मिली। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी गांधी के नाम का एलान प्रेस विज्ञप्ति में पांचवी लाइन में किया गया है।

कांग्रेस की मीडिया टीम से जुड़े एक नेता एक अजीब ही बात कहते हैं – ‘पिछले कुछ दिनों में अचानक एक परिवर्तन तेजी से हुआ है। अगर प्रियंका गांधी को ताकतवर बनाना ही था तो उनकी टीम क्यों कमजोर की जा रही है। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला प्रियंका गांधी के बेहद खास माने जाते हैं। लेकिन इधर प्रियंका गांधी के नाम का ऐलान हुआ है और उधर वे हरियाणा के जिंद से विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। जबकि वे पहले से ही विधायक थे। कांग्रेस में कोई तो ऐसा है जो नहीं चाहता कि प्रियंका गांधी पावरफुल हो जाएं।’

भाजपा के नेताओं के पास जब बुधवार की दोपहर खबर पहुंची कि प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है तो उसके भी बड़े-बड़े नेता चौंक गए। एक नेता ने हैरान होते हुए अपने एक करीबी से कहा – ‘कांग्रेस की यही समस्या है। या तो ये बिना ज्यादा सोचे-समझे लिया गया फैसला है या फिर कुछ ज्यादा ही सोचा गया है। अगर प्रियंका गांधी को सियासत में लाना ही था तो उत्तर प्रदेश के एक इलाकाई नेता की तरह क्यों लाए। कम से कम पूरे उत्तर प्रदेश का इंचार्ज बनाते। प्रेस विज्ञप्ति में ये लिखने की क्या जरूरत थी कि प्रियंका सिर्फ पूर्वी उत्तर प्रदेश ही देखेंगी।

प्रियंका गांधी कहां से चुनाव लड़ेंगी इस पर भी सस्पेंस कायम है। कांग्रेस के ताकतवर नेताओं से जब इस बारे में जानना चाहा तो पता चला कि राहुल गांधी रायबरेली जा सकते हैं और प्रियंका गांधी अमेठी से चुनाव लड़ सकती हैं। वैसे प्रियंका की टीम बताती है कि मैडम अभी चुनाव नहीं लड़ना चाहतीं। वे पूरी तरह पूर्वांचल पर फोकस करना चाहती हैं।

उत्तर प्रदेश के कम से कम आधे दर्जन ऐसे नेता हैं जो अपने ड्राइंग रूम में बरसों से सोनिया और राहुल के साथ प्रियंका गांधी की तस्वीर लगाये बैठे थे। इनमें से कई नेता प्रियंका के सक्रिय राजनीति में इस तरह से आने से उतने हैरान-परेशान नहीं हैं। इन्हें लगता है कि 1984 के बाद से पूर्वी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस धीरे-धीरे कमजोर होती गई है। लेकिन अगर प्रियंका ने वहां अपनी पूरी ताकत झोंक दी तो उसे ज़िंदा किया जा सकता है।

प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ-साथ अवध की भी जिम्मेदारी मिली है मतलब कि कुल मिलाकर 42 सीटें उनके पास हैं। 2014 में कांग्रेस इनमें से सिर्फ दो सीटें – अमेठी और रायबरेली ही – जीत पाई थी। लेकिन 2009 में उसे इनमें से 15 सीटें मिली थीं। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को पूर्वी उत्तर प्रदेश और अवध में 10 फीसदी वोट मिले थे, जबकि पश्चिम उत्तर प्रदेश में उसे सिर्फ पांच फीसदी वोटों से ही संतोष करना पड़ा था। अगर इन आंकड़ों का विश्लेषण करें तो प्रियंका गांधी को पूर्वांचल में सोच-समझकर लाया गया है। यहां की 42 में से 40 सीटें कांग्रेस के पास नहीं है लेकिन उसका पुराना वोट बैंक पूरी तरह खिसका नहीं है। 2009 में उसके इसी वोट बैंक ने चमत्कार करते हुए उसे 15 सीटें दिलवाई थीं।

कांग्रेस के पूर्वांचल के एक नेता कहते हैं प्रियंका गांधी के सियासत में आने का एलान भले ही धमाकेदार ना हुआ हो लेकिन लखनऊ में दस फरवरी को होने वाली रैली धमाका करेगी। प्रियंका की बड़े पर्दे पर एंट्री उसी दिन समझिए। अब तक कांग्रेस के कार्यकर्ता में ना जोश था, ना चुनाव जीतने का यकीन। 2017 के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी के नाम पर वोट मांग चुके हैं और हार भी चुके हैं। इस बार कुछ नया और अलग कहने को है। कांग्रेस के दफ्तर की खबर रखने वाले एक पत्रकार बताते हैं कि अगर 2014 में अमित शाह उत्तर प्रदेश की 80 में से 73 सीटें जीतने का फॉर्मूला गढ़ सकते हैं तो प्रियंका गांधी भी ऐसा कर ही सकती हैं। इस बार आर या पार होगा। गांधी परिवार ने बंद मुट्ठी खोल दी है। अब ये मुट्ठी लाख की होगी या खाक की, उत्तर प्रदेश का वोटर तय करेगा। अगर राहुल गांधी की किस्मत में प्रधानमंत्री बनना लिखा है तो 2019 से बेहतर मौका नहीं मिलेगा और प्रियंका से बढ़िया कोई और नहीं जो कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश जीत सके।

इसीलिए पूरे देश में राहुल गांधी घूमेंगे और उत्तर प्रदेश – बल्कि उस पूर्वांचल को जहां से कांग्रेस को जीतने की सबसे ज्यादा उम्मीद है – प्रियंका गांधी संभालेंगी। राहुल गांधी ने अमेठी में अपने वोटरों से भी कुछ इसी अंदाज़ में कहा कि अब वे अमेठी कम ही आएंगे क्योंकि उन्हें बाकी जगहों पर भी ध्यान देना है। प्रियंका उत्तर प्रदेश में ही रहेंगी क्योंकि वे बाकी देश में अभी नहीं जाएंगी।

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