कांग्रेस ने 2019 के चुनाव के लिए लंबे इंतेजार के बाद आखिरकार अपनी सियासी ट्रंप कार्ड चल ही दिया। अपने युवा चेहरे प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के हाथ यूपी को दो हिस्सों में बांटकर कमान सौंप दी। वेस्टर्न यूपी में कांग्रेस के लिए खोई हुई सियासी जमीन तलाशना सिंधिया के लिए आसान नही होगा। कमजोर संगठन के बल पर मध्य प्रदेश की तरह परिणाम देने, पुराना वोट बैंक सहेजने और किसान- नौजवान का नारा बुलंद करने का दबाव सिंधिया पर रहेगा।

वेस्टर्न यूपी में तीन दशक से कमजोर होगी कांग्रेस

वेस्टर्न यूपी में करीब तीन दशक से कांग्रेस के पंजे की पकड़ बेहद कमजोर है। एक-दो जिलों को छोड़ दें तो ज्यादातर जगह क्षेत्रीय दलों के आगे भी पार्टी कहीं नहीं टिक पाती। हालात ऐसे हो गए हैं कि संसद और विधानसभा में पार्टी की नुमाइंदगी ही न के बराबर रह गई। हालांकि राहुल गांधी अपने स्तर से वेस्टर्न यूपी में गंभीर मुद्दे पर सक्रिय रहे। किसानों की जमीन अधिगृहण के मुद्दे पर जेवर इलाके के भट्टा-पारसौल में आंदोलन का हिस्सा बने। सहारनपुर के दलित उत्पीड़न के मामले पर दस्तक देकर लोगों को ध्यान खींचा, लेकिन तमाम प्रयास के बाद भी कांग्रेस को उम्मीद के मुताबिक मजबूती नहीं मिली।

दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण को कांग्रेस के साथ लाना बड़ी चुनौती

मध्यप्रदेश में महाराज के नाम से जाने जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को वेस्ट यूपी में कभी कांग्रेस के वोट बैंक रहे दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण को साधने के लिए करिश्मा दिखाना होगा। कमजोर हो चुकी कांग्रेस का वोटर दलित बीएसपी, ब्राह्म्ण बीजेपी और मुस्लिम, एसपी तथा बीएसपी की तरफ खिसक गया। कांग्रेस के एक प्रदेश पदाधिकारी के मुताबिक पुराने वोट बैंक से साथ की किसान और नौजवान इस बार पार्टी के खास अजेंडे में रहेगी।

युवाओं पर भी रहेगी नजर

युवाओं को साधने के लिए ही नौजवान चेहरे को यहां उतारा है। इसी के साथ चुनावी मेनिफेस्टों में किसानों के लिए कर्जमाफी सरीखे काफी लुभावने वादे भी पार्टी सामने लाकर करिश्मा करने की सोच रही है। खुद राहुल गांधी का कहना है कि युवा प्रियंका और ज्योतिरादित्य यूपी को सियासत को बदलें। वह बहुत डायनामिक है। एसपी तथा बीएसपी के मजबूत होने और बीजेपी के मुख्य सियासी दल के तौर पर सामने के बाद से कांग्रेस के हालत ऐसे हो गए कि वेस्टर्न यूपी की ज्यादातर सीटों पर वह नंबर 4 की पार्टी बनकर रह गई। बीजेपी, एसपी और बीएसपी ही अलग अलग जगह पहले दूसरे और तीसरे नंबर पर काबिज रही। ज्यादातर सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। 2014 में मेरठ से सिने तारिका नगमा तक अपनी जमानत नहीं बचा पाई थी। 2017 के चुनाव में एसपी के साथ लड़ने के बाद कई सीटों पर कांग्रेस बुरी तरह हारी थी।

एक बार फिर संगठन खड़ा करने की चुनौती

वेस्टर्न यूपी में कांग्रेस को खड़ा करने के लिए यहां के जनाधार वाले नेताओं को संगठन में तरजीह देने की तैयारी हैं। हर जिले से चर्चित और पुराने चेहरों की तलाश शुरू हो गई हैं। कांग्रेस के एक प्रदेश पदाधिकारी के मुताबिक जल्द ही वेस्ट जोन को दो या तीन जोन में बांटकर दूसरी पंक्ति को मजबूत किया जाएगा। जोन प्रभारी अपनी रिपोर्ट सिंधिया को देंगे। इसी के साथ मंडल, जिला, तहसील, ब्लॉक और बूथ स्तर पर जल्द नए चेहरों को भी लगाया जाएगा।

वेस्टर्न यूपी में कांग्रेस का हाल

वेस्टर्न यूपी में 20 साल से अधिक वक्त से ज्यादातर जिलों में कांग्रेस की सियासी नुमाइंदगी नहीं है। फिलहाल सहारनपुर में दो विधायक नरेश सैनी और मसूद अहमद हैं। वहां 2012 में भी दो विधायक थे। बाकी इस जिले में किसी विधानसभा में कोई सदस्य नहीं है। इससे पहले 2012 में बुलंदशहर के स्याना से दिलनवाज खां, खुर्जा से बंशी पहाड़िया, शामली से पंकज मलिक, मथुरा से प्रदीप माथुर विधायक रहे। बीते बीस सालों में हापुड़ से गजराज सिंह, गाजियाबाद से सुरेंद्र मुन्नी, रामपुर के बिलासपुर से संजय कपूर और मिलक से काजिम अली खां, एमएलए बने। बिजनौर, मुरादाबाद, बदायूं, अमरोहा, संभल, बागपत, गौतमबुद्धनगर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, अलीगढ़, आगरा आदि जिलों से लंबे वक्त से कोई एमएलए नहीं बना। अलीगढ़ से विवेक बंसल एमएलसी जरूर रहे। एमपी के तौर पर रामपुर से नूर बानो, गाजियाबाद से सुरेंद्र गोयल, मेरठ से अवतार सिंह भड़ाना, मुरादाबाद से पूर्व क्रिकेटर अजहरुद्दीन जरूर जीते। बाकी सीटों पर जीत का मुंह की ताकना पड़ा।

सिंधिया को यूपी भेजने का सियासी मतलब

कांग्रेस के सीनियर नेताओं की माने तो महाराज को वेस्ट यूपी की कमान एक खास रणनीति के तहत सौंपी हैं। सिंधिया मध्य प्रदेश के रहने वाले हैं। उनका जिला ग्वालियर और वेस्ट यूपी के आगरा जिले की सीमा मिलती है। वह वेस्ट यूपी की सियासत पर बारीकी से नजर रखने हैं। युवा चेहरे हैं। सियासत में उनकी साफ छवि है। राहुल गांधी के बहुत करीबी हैं। पार्टी में पहली पक्ति से असरदार नेता हैं। मध्य प्रदेश के हाल के चुनाव में हुई जीत के पीछे सिंधिया का जुझारूपन किसी से छिपा नहीं है।

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