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बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की फाइल फोटो


पूर्वोत्तर में कांग्रेस के आख़िरी किले में अगले महीने विधानसभा चुनाव होने है। अमित शाह समेत भाजपा के कई वरिष्ठ नेता मिज़ोरम का दौरा कर रहे है। भाजपा यहाँ नरेन्द्र मोदी की योजनाओं के सहारे मैदान में उतर रही है। पिछले चुनाव में सभी सीटों पर जमानत जब्त होने के बाद भी भाजपा इस चुनाव में आत्मविश्वास से भरी हुई है। आत्मविश्वास इतना कि पहली बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और अमित शाह सभी 40 सीटें जीतने की बात कर रहे है। भाजपा यह सब जितना आसान दिखा रही है उतना आसान यह है नही। कांग्रेस पिछले 10 सालों से मिज़ोरम की सत्ता में है। 4 विधायकों के पार्टी छोड़ने के बाद भी कांग्रेस के पास 30 विधायक है। दरअसल भाजपा मिज़ोरम में जीतने और सरकार बनाने के लिए नही बल्कि और कांग्रेस को हराने और खाता खोलकर मिज़ो नेशनल फ्रंट के साथ मिज़ोरम की राजनीति में एंट्री मारना चाहती है।

मिज़ोरम में पिछले विधानसभा चुनाव में नोटा से भी कम वोट पाने वाली भाजपा इस विधानसभा चुनाव में पहली बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन के संस्थापक और बीजेपी नेता हिमंता बिस्वा ने कहा है की पार्टी मिज़ोरम विधानसभा चुनाव जीतेगी और पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएगी। वहीं कुछ दिनों पहले मिज़ोरम में पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद करके आए अमित शाह ने दावा किया था की पार्टी इस बार मिज़ोरम में सभी 40 सीटों पर जीत दर्ज करेगी।


मिज़ोरम में भाजपा अब तक 5 विधानसभा चुनाव लड़ चुकी है। 1993 में 8, 98 में 12, 2003 में 8, 2008 में 9 और 2013 में 17 सीटों पर भाजपा ने चुनाव लड़ा था। 5 विधानसभा चुनाव लड़ने के बाद भी भाजपा अब तक मिज़ोरम में अपना खाता तक नही खोल पाई है। पिछले विधानसभा चुनाव में  17 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा की सभी 17 सीटों पर जमानत जब्त हो गयी थी। उस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 1 से भी कम, 37% था। जो की नोटा से भी कम था। ऐसे में अगर हेमंत बिसवा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने और अमित शाह सभी 40 सीटें जीतने का दावा करते है तो प्रश्न उठता है कि यह भाजपा का आत्मविश्वास है या फिर सिर्फ राजनैतिक जुमला है  ?

कांग्रेस मुक्त पूर्वोत्तर  

केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद कांग्रेस धीरे-धीरे पूर्वोत्तर से साफ़ होती जा रही है। अब सिर्फ मिज़ोरम में ही कांग्रेस की सरकार है। दरअसल मई 2016 में भाजपा ने  पूर्वोत्तर   के गैर कांग्रेसी दलों को एकजुट करने के लिए पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन (एनईडीए- नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस) की स्थापना की थी। इस गठबंधन में भाजपा के साथ नागा पीपल्स पार्टी, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट, पीपल्स पार्टी ऑफ़ अरुणाचल और मिज़ो नेशनल फ्रंट आदी दल शामिल है। दरअसल पूर्वोत्तर में अपने पैर पसारने में हमेशा नाकाम रहने वाली भाजपा ने मोदी सरकार आने के बाद असम, मणिपुर और त्रिपुरा में सरकार बना ली। इसके साथ ही नागालैंड और मेघालय में भी भाजपा के समर्थन के साथ पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन की सरकार है। 


भाजपा ने पूर्वोत्तर में कांग्रेस विरोधी दलों को एक करके कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने की रणनीति पर काम किया है। इसी रणनीति के तहत भाजपा अब पूर्वोत्तर में कांग्रेस का आखरी किला भी गिराना चाहती है। इसके लिए खुद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने मिज़ोरम जाकर पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद किया। अमित शाह के अलावा राम माधव, असम के मुख्यमंत्री सरबानंद सोनोवाल और मंत्री हिमांता बिस्वा शर्मा मिज़ोरम का दौरा कर रहे है। भाजपा किसी भी तरह से कांग्रेस को मिज़ोरम की सत्ता से बाहर करना चाहती है।

ललथनहवला भरोसे कांग्रेस

कांग्रेस पिछले 10 सालों से मिज़ोरम की सत्ता पर काबिज है। ललथनहवला 10 साल से प्रदेश के मुख्यमंत्री है और 1973 से मिज़ोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष है। इतने लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले वह शायद देश के पहले व्यक्ति है। राजनीति में आने के पहले वह मिज़ोरम के एक कोऑपरेटिव बैंक में असिस्टेंट के तौर पर भी काम कर रहे थे। बाद में वह मिज़ो नेशनल फ्रंट के आंदोलन से जुड़कर इसके विदेश सचिव बन गये। जिसको लेकर ललथनहवला जेल भी गये। 1967 में जेल से छूटने के बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए। उनको पार्टी की ओर से आइजोल जिले का मुख्य संगठनकर्ता बना गिया गया।


1984-86 तक दो साल के लिए ललथनहवला पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। जिसके बाद वह 1989 से 1998 फिर 2008 से लेकर अब तक राज्य के मुख्यमंत्री है। ललथनहवला को मिजोरम में करिश्माई नेता माना जाता है। वह अब तक 9 विधानसभा चुनाव जीत चुके है। मिजोरम में कांग्रेस एक बार फिर ललथनहवला के भरोसे ही चुनाव लड़ रही है।

बागियों का सहारा 

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2013 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 44.63% वोट पाकर 40 में से 34 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी मिज़ो नेशनल फ्रंट, 28.65% वोट पाकर सिर्फ 5 सीटें ही जीत पायी। वहीं 1 सीट एमपीसी के खाते में गई थी। मिजोरम में पिछले काफी समय से कांग्रेस में बगावत का सिलसिला चल रहा है। एक के बाद एक कांग्रेस के मौजूदा विधायक पार्टी छोड़ रहे है। कुछ भाजपा में जा रहे है तो ज्यादातर मिज़ो नेशनल फ्रंट का दामन थाम रहे है। 


अमित शाह के दौरे के ठीक पहले राज्य के पूर्व मंत्री बुद्धा धन चकमा कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा के साथ चले गये थे। चकमा के पहले कांग्रेस के दो अन्य विधायक पार्टी से इस्तीफ़ा दे चुके है। इसमें पूर्व गृहमंत्री आर. लालजीर्लियना और लालरिनलियाना सैलो शामिल है। यह दोनों नेता एमएनएफ (मिज़ो नेशनल फ्रंट) में शामिल हो गये थे। इन तीनों नेताओं के बाद कांग्रेस विधायक हमिंगडेलोवा खियांगटे ने सोमवार को मिज़ोरम विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। खियांगटे के इस्तीफे के बाद अब विधानसभा में कांग्रेस के कुल 30 विधायक बचे है।

कुल मिलाकर भाजपा यहाँ अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में बिलकुल नही है। खाता खोलने के लिए भी भाजपा को काफी पापड़ बेलने पड़ेंगे। 10 सालों से विपक्ष में बैठी मिज़ो नेशनल फ्रंट के बलबूते भाजपा यहाँ सत्ता में बैठने का ख्वाब देख सकती है लेकिन चुनाव पूर्व गठबंधन न करना भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित होगा। मिज़ो को पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले फायदा होता दिख रहा है लेकिन बहुमत के आंकड़े को पाना मुश्किल है। अन्य छोटे दल अगर कांग्रेस कि कुछ सीटें जीतने में कामयाब हो जाते है तो वह छोटे दल ही मिजोरम में किंग मेकर बनेंगे। ऐसे में मुकाबला फिर राहुल गाँधी बनाम अमित शाह का होगा। अमित शाह के पास खोने के लिए कुछ नही होगा। तो वहीं राहुल गाँधी भी कर्नाटक की तर्ज पर सत्ता बचाने के लिए त्याग से पीछे नही हटेंगें।

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