उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की बढ़ती लोकप्रियता ने भाजपा के गुजराती नेतृत्व की नींद उड़ा दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दोनों को ही योगी  को अपने लिए भविष्य की चुनौती दिखने लगे हैं। दिल्ली नगर निगम चुनाव प्रचार में योगी के तय रोड-शो को रद्द कर दिए जाने से इन अटकलों को बल मिला है। टीवी चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया सभी जगह योगी का जिस अंदाज में महिमा मंडन चल रहा है, वह वाकई भाजपा के कद्दावर नेताओं को हैरान परेशान कर रहा है।
आदित्यनाथ योगी की छवि एक कट्टर हिंदू नेता की रही है। वे 1998 से लगातार पांचवीं बार गोरखपुर से लोकसभा के सदस्य हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद उनकी कार्यशैली में बदलाव दिखा है। वे टकराव के बजाए सुशासन पर फोकस कर रहे हैं। उनकी सरकार देश में भाजपा की अकेली सरकार है जिसमें पार्टी ने दो-दो उपमुख्यमंत्री बनाए हैं। केशव मौर्य जहां पार्टी के सूबेदार हैं, वहीं दिनेश शर्मा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष। दोनों के साथ ही योगी का अच्छा तालमेल बरकरार है। पर पार्टी आला कमान को ज्यादा हैरानी श्रीकांत शर्मा और सिद्धार्थनाथ सिंह के नजरिए में आए बदलाव से हुई है। श्रीकांत शर्मा और सिद्धार्थनाथ सिंह दोनों ही उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री बनने से पहले तक भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता थे। जहां वे मोदी और शाह के प्रचार-प्रसार पर ही पूरा ध्यान लगा रहे थे, लेकिन उत्तर प्रदेश में मंत्री पद संभालने के बाद उन्होंने अपनी वफादारी योगी के प्रति बढ़ा दी। पार्टी के शिखर नेतृत्व को लगता है कि योगी की मीडिया में विराट छवि उभारने में इन दोनों की भी बड़ी भूमिका है। वजह है दोनों का मीडिया के साथ अच्छा तालमेल होना। केंद्र की राजनीति में चूंकि इन दोनों को अब अपनी ज्यादा संभावना नहीं दिख रही लिहाजा वे योगी के साथ बेहतर तालमेल दिखा चुके हैं।
योगी को मुख्यमंत्री बनाने के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपने गृहमंत्री राजनाथ सिंह के कद को तराशने की मंशा भी देखी गई थी। राजनाथ की तरह योगी भी राजपूत हैं। उत्तर प्रदेश ही नहीं उत्तर व पश्चिम भारत के कई राज्यों में राजपूतों की संख्या खासी है, लेकिन एक महीने के भीतर ही यूपी ही नहीं सारे देश में योगी की लोकप्रियता का ग्राफ जिस तेजी से ऊपर गया है, उसने गैरों से ज्यादा बेचैनी अपनों की ही बढ़ाई है। सोशल मीडिया पर तो लगातार इस तरह के जुमले प्रचारित हो रहे हैं जिनमें मोदी और अमित शाह को इस फैसले पर पछतावा करते दिखाया जा रहा है।दरअसल, भाजपा के भीतर अभी तक किसी भी नेता का व्यक्तित्व और लोकप्रियता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टक्कर देने लायक नहीं है। मोदी भाषणों में बेशक सबका साथ और सबका विकास का नारा दोहराते हों पर उनकी कार्यप्रणाली में अपने समकक्ष किसी को नहीं उभरने देना अहम रहा है। गुजरात में केशु भाई पटेल, कांशीराम राणा, शंकर सिंह वाघेला, एके पटेल व हरिन पाठक जैसे तमाम कद्दावर पार्टी नेताओं को उन्होंने हाशिए पर पहुंचा दिया था। दिल्ली में भी बड़ों को जहां मार्गदर्शक मंडल में पहुंचा दिया वहीं अपनी सरकार के साथ-साथ पार्टी पर भी अपना एकछत्र वर्चस्व बना रखा है, लेकिन योगी भविष्य में दिल्ली की सत्ता के दावेदार न बन जाएं, इसकी चिंता उन्हें अभी से हो रही है। उत्तर प्रदेश में योगी ने दो मुद्दों पर फोकस किया है। पहला भ्रष्टाचार पर चोट और दूसरा कानून व्यवस्था में सुधार। तकरीबन निराश हो चुके सूबे के लोग एक महीने के भीतर ही कानून व्यवस्था की हालत में दिख रहे सुधार से बम बम हैं। सत्ता संभालते ही तबादलों की झड़ी लगाने की परंपरा को भी तोड़ा है। जो पुलिस वाले अपराधियों और अराजक तत्वों से सांठगांठ के लिए बदनाम थे वे ही अचानक कर्तव्य परायण हो गए हैं। ऊपर से सूबे का पुलिस महानिदेशक सबसे वरिष्ठ व ईमानदार छवि के सुलखान सिंह को बना कर योगी ने अपने मंसूबों को धरातल पर उतारा है।
गैरों से ज्यादा अपने ही बेचैन
’आदित्यनाथ योगी की छवि एक कट्टर हिंदू नेता की रही है। वे 1998 से लगातार पांचवीं बार गोरखपुर
से लोकसभा के सदस्य हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद उनकी कार्यशैली में बदलाव दिखा है।
’एक महीने के भीतर ही यूपी ही नहीं सारे देश में योगी की लोकप्रियता का ग्राफ जिस तेजी से ऊपर
गया है, उसने गैरों से ज्यादा बेचैनी अपनों की बढ़ाई है। सोशल मीडिया पर तो लगातार इस तरह
के जुमले चले रहे हैं जिनमें मोदी और शाह को इस फैसले पर पछतावा करते दिखाया जा रहा है।
’टीवी चैनलों, अखबारों और सोशल मीडिया सभी जगह योगी का जिस अंदाज में महिमा मंडन चल रहा
है, वह वाकई भाजपा के कद्दावर नेताओं को हैरान और परेशान कर रहा है।

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