बुधवार को मिजोरम में पार्टी के चुनाव अभियान का शंखनाद करने के लिए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पहुंचे. इस मौके पर शाह ने पार्टी के प्रदेश मुख्यालय भवन का उद्घाटन किया और पार्टी के बूथ स्तरीय कार्यकर्ताओं के एक सम्मेलन को संबोधित भी किया. शाह ने कहा की राज्य सरकार ने प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू की गयी विकास योजनाओं को लागु नही किया. जनता के अंदर कांग्रेस को लेकर असंतोष है और भाजपा इस बार सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और जीत दर्ज करेगी.

अमित शाह के दौरे के ठीक पहले राज्य के पूर्व मंत्री बुद्धा धन चकमा कांग्रेस का हाँथ छोड़कर भाजपा के साथ आ गये है. पिछले 10 साल से राज्य में सरकार चला रही कांग्रेस के अंदर बगावत का सिलसिला थम नही रहा है. चकमा के पहले कांग्रेस के दो अन्य विधायक पार्टी से इस्तीफ़ा दे चुके है. इसमें पूर्व गृहमंत्री आर. लालजीर्लियना और लालरिनलियाना सैलो शामिल है. यह दोनों नेता मिजोरम एमएनएफ (मिज़ो नेशनल फ्रंट) में शामिल हो गये थे. विपक्षी पार्टीयों का दावा है की कांग्रेस के कुछ और विधायक चुनाव के पहले पार्टी का साथ छोड़ सकते है. पिछले 10 साल से मिजोरम की सत्ता में काबिज कांग्रेस को इस विधानसभा चुनाव में सत्ता विरोधी लहर, भाई- भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोपों से जूझना पड़ रहा है. इसी कारण कांग्रेस ने इस विधानसभा चुनाव में अपने 7 मौजूदा विधायकों की टिकट काटी है. कांग्रेस द्वारा घोषित किये गये 36 प्रत्याशियों में से 12 युवा है, जिनकी उम्र 40 वर्ष के कम है. मुख्यमंत्री लाल थान्हावला 2013 की तरह इस बार भी दो विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरेंगे.

मिज़ो नेशनल फ्रंट राज्य में मुख्य विपक्षी दल है. 1959 में राज्य में अकाल पड़ा था. जिसमे केंद्र सरकार के असहयोग के खिलाफ राज्य की जनता ने आन्दोलन किया. इस आन्दोलन का का नेतृत्व कर मिज़ो नेशनल फ्रंट ने सक्रिय राजनीती में एंट्री मारी. एमएनएफ ने चुनाव लड़कर राज्य में अब तक तीन बार सरकार बनाई है. पहले 1986-88 और फिर 1998 से 2008. 2008 में राज्य के अंदर सरकार कस खिलाफ जबरदस्त एंटी इनकमबेंसी का माहौल बना और पार्टी 40 में से सिर्फ 3 ही सीट जीत पाई. राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री लाल थान्हावला भी मिज़ो नेशनल फ्रंट आंदोलन से ही निकले है.

राज्य में कांग्रेस पिछले 10 साल से राज कर रही है. लाल थान्हावला 10 साल से प्रदेश के मुख्यमंत्री है और 1973 से मिजोरम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष है. इतने लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले थान्हावला शायद देश के पहले व्यक्ति है. राजनीती में आने के पहले वह मिजोरम के एक कोऑपरेटिव बैंक में असिस्टेंट के तौर पर भी काम कर रहे थे. बाद में वह मिजो नेशनल फ्रंट के आंदोलन से जुड़कर इसके विदेश सचिव बन गये. जिसको लेकर लथनहवला जेल भी गये. 1967 में जेल से छूटने के बाद वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए. उनको पार्टी की ओर से आईजोल जिले का मुख्य संगठनकर्ता बना गिया गया.


1984-86 तक दो साल के लिए थान्हावला पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने. जिसके बाद वह 1989 से 1998 फिर 2008 से लेकर अब तक राज्य के मुख्यमंत्री है. लथनहवला को मिजोरम में करिश्माई नेता माना जाता है. वह अब तक 9 विधानसभा चुनाव जीत चुके है. मिजोरम में कांग्रेस एक बार फिर लथनहवला के भरोसे ही चुनाव लड़ रही है.

अमित शाह मिजोरम में लथनहवला के विजय रथ को रोकने के लिए पूरी ताकत लगा रहे है. पार्टी पहली बार मिजोरम में सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. इससे पहले पार्टी 1993 में 8, 98 में 12, 2003 में 8, 2008 में 9 और 2013 में 17 सीटों पर चुनाव लड़ चुकी है. पांच विधानसभा चुनाव लड़ने के बाद भी भाजपा मिजोरम में खाता खोलने तक में कामयाब नही हो पाई. 2013 में 17 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली भाजपा की सभी 17 सीटों पर जमानत जप्त हो गयी थी. इस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 1 से भी कम, 0.37% था, जो की नोटा से भी कम था. ऐसे में अगर अमित शाह कहते है की भाजपा इस विधानसभा चुनाव में सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और सभी 40 सीटें जीतेगी तो इस बात पर भरोसा करना थोडा मुश्किल होता है.

वैसे तो भाजपा मिजोरम में कांग्रेस को टक्कर देने की स्तिथि में नही है लेकिन कांग्रेस और एमएनएफ के बगिओं के सहारे राज्य में कुछ विधानसभा सीटें जरूर जीतना चाहती है. शाह किसी भी तरह से राज्य में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करना चाहते है. चुनाव में अगर कांग्रेस को बहुमत से थोड़ी भी कम सीटें मिलती है तो शाह एमएनएफ और बाकी विपक्षी पार्टिओं को साथ लेकर राज्य की राजनीती में बेकडोर एंट्री मारना चाहते है.ReplyForward

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