Newbuzzindia: तीन असंबद्ध, अलग विषय। किन्तु एक ही पाठ पढ़ा रहे हैं। कि जल्दबाज़ी बहुत ही बुरी होती है। कहा जा सकता है कि हम सभी इस कालजयी कहावत को जानते हैं, इसमें नया क्या है? यही समझने का प्रयास है कि हम जानते तो हैं, किन्तु मानते नहीं। और इसीलिए ज़ल्दबाज़ी करते चले जाते हैं। पिछला सप्ताह कोहिनूर हीरे से दमकता रहा। देश की विरासत को वापस लाने से सुप्रीम कोर्ट में सरकार के इनकार से काफी हल्ला मचा। और चौबीस घंटे में सरकार ने कहा कि वह हीरा वापस लाएगी।

ऐसा क्यों हुआ?
केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल ने वैसा जवाब सुप्रीम कोर्ट में दे दिया था। कि महाराजा रणजीत सिंह के वंशज ने कोहिनूर ब्रिटिश राजघराने को भेंट किया था। अब आप सोचिए, क्या सॉलिसिटर जनरल ऐसा कह सकते हैं? और यदि किया, तो यह घातक जल्दबाज़ी ही तो हुई।

वास्तव में सॉलिसिटर जनरल ने ऐसा तथ्य पेश करने में कोई जल्दबाज़ी नहीं की थी। वे तो 1956 के पं. नेहरू के मत को ही केन्द्र सरकार के अधिकृत मत के रूप में व्यक्त कर रहे थे। जिसमें कहा गया था कि उपहार में दिया गया हीरा वापस मांगना अनुचित होगा। जल्दबाज़ी तो यह थी कि सॉलिसिटर जनरल ने तत्काल सारी जानकारी पेश कर दी। वर्तमान सरकार से पूछे बग़ैर। क्योंकि यदि पूछते तो पाते कि मोदी सरकार उल्टा पक्ष रखती। कहती कि भले ही पं. नेहरू ने ऐसा तय किया था- किन्तु हम इसे, ‘भारत का गौरव’ मानकर वापस लाएंगे।

यदि पूछते तो मोदी सरकार यह भी तथ्य सुप्रीम कोर्ट को बताती कि कैसे वह 10वीं शताब्दी की दुर्लभ दुर्गा प्रतिमा जर्मनी से वापस लाई। फिर उसने कैनेडा से 400 वर्ष पुरानी ‘पैरेट लेडी’ शिल्प प्राप्त किया। अॉस्ट्रेलिया से भी देवी-देवताओं की प्राचीन मूर्तियां वापस लीं। यह, सॉलिसिटर जनरल के कथन के बाद प्रचारित भी किया गया। 

प्रश्न हालांकि और भी हैं।
चाहिए किसे कोहिनूर?

लाना ही है मोदी सरकार को, तो विदेश और देश से भी, निवेश लाए। 
लाना ही है मोदी सरकार को, तो नौकरियां लाए।

और विदेश में मौजूद यदि हमारे यहां से गया हुआ, भेजा हुआ कुछ ला सकती है मोदी सरकार, तो हजारों करोड़ का काला धन वापस लाए।
और, हत्यारों-हमलावरों की एक पूरी पंक्ति बसी-बसाई है पाकिस्तान, दुबई या कि ऐसे ही किसी देश में। दाऊद इब्राहिम को खींचकर लाए। पैसे लेकर, बांटकर खून बहाने वाले कई हैं लखवी या मसूद या दाऊद गिलानी हेडली।

इन्हें वापस लाए।
जल्दबाज़ी न करें, किन्तु यहां भी।
जल्दी कर सकें, तो बेहतर होगा।
जल्दी और जल्दबाज़ी में महीन किन्तु स्पष्ट अंतर है।
जल्दी में गति है।
जल्दबाज़ी में दुर्गति है।
जल्दी का अर्थ तत्काल करना है।
जल्दबाज़ी तात्कालिक है।

जैसे, कोहिनूर (यदि भेंट किया गया हो तो) जल्दबाज़ी थी। उस समय का -तात्कालिक लाभ को ध्यान में रखते हुए- लिया निर्णय था। जिसमें निश्चित ही बहुत सारे स्वर शामिल नहीं होंगे।
किन्तु कोहिनूर को सीधे ब्रिटेन पहुंचाया या कि ब्रिटिश ताज में जड़ देना -जल्दी उठाया कदम था। कारोबारी बनकर आए धूर्त ब्रितानी समझते थे कि यह भारी-भरकम नायाब हीरा कल भावनाओं को आहत करने का कारण बनेगा।

एक जल्द फैसला रोचक भी है।
ब्रिटेन ने इसे ‘अशुभ’ मानते हुए टावर ऑफ लंदन में रखवा दिया। और राजघराने ने तय किया कि केवल महारानियां ही इसे पहनेंगी! रोचक इसलिए कि हो सकता है, इतने बड़े हीरे को राजा-युवराज अपने पास रख लें -और महारानी इसे कभी पा ही न सके- ऐसी आशंका से तो उनकी महारानी द्वारा कहीं इसे ‘अशुभ’ प्रचारित नहीं किया गया! एक जल्दी में किया गया प्रचार -और संभवत: जल्दबाज़ी में पाया गया निर्णय।

कोहिनूर के लिए, किन्तु हमें कोई न जल्दी है। न जल्दबाज़ी।
कोहिनूर आ भी जाए तो क्या? म्यूज़ियम में रखा जाएगा।
अब बात पीएफ की।

बजट में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने पीएफ को लेकर बड़ी ग़लतियां की थीं। टैक्स तो जल्दबाज़ी में लगाया था। फिर वापस लेना पड़ा भारी रोष के कारण। यहां उन्हें जल्दी करना चाहिए था निर्णय। जो उन्होंने नहीं किया। और इस तरह वेतन पाने वाले देश के महत्वपूर्ण मध्यम वर्ग को उन्होंने भारी नाराज़ कर दिया। 

एक जल्दबाज़ी तब की थी। फिर पीएफ को लेकर की गई नई जल्दबाज़ी का और नुकसान उन्होंने पिछले पखवाड़े में झेला। 
नए नियमों के अंतर्गत उन्होंने पीएफ निकालने पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। 58 वर्ष की उम्र से पहले नहीं निकाल सकते। नौकरी चली जाने या छोड़ने के बाद ‘बिटविन द जॉब्स’ यानी नई नौकरी पाने से पहले के समय में रकम नहीं निकाल सकते आदि। 

भारी आक्रोश के बाद मोदी सरकार को इसे भी वापस लेना पड़ा। 
वापस जल्दी लेना चाहिए था। क्योंकि इस बीच देश को भारी उग्र प्रदर्शन, हिंसक वातावरण  का सामना करना पड़ा। 

प्रश्न यह है कि लोगों के बचत के पैसे पर सरकार का अधिकार ही कैसे है? फूटी कौड़ी की सुविधाएं छोटी बचत के लिए सरकार दे नहीं रही। एक नियम, एक रुपए तक का लाभ किसी बचत के लिए ला नहीं रही। कोई प्रोत्साहन है ही नहीं। फिर जब आप कुछ दे नहीं सकते, तो लेने-छीनने और रोक लगाने का गलत अधिकार कहां से ले आए?

और देश में दो तरह के मापदण्ड, दोहरे भेदभाव वाले नियम कैसे हो सकते हैं? तनख्वाह पाने वाले सरकारी तो सवा सौ-डेढ़ सौ प्रतिशत की वेतनवृद्धियां लें -और उन्हें उनके जीपीएफ पर न कोई टैक्स का प्रावधान कभी प्रस्ताव तक के रूप में न झेलना पड़े। जबकि निजी क्षेत्र में तनख्वाह पाने वालों को उन्हीं के पैसे बच्चों की शादियां, घर बनाने और कोई आपात स्थिति में निकालने तक पर रोक लगे- ऐसा कैसे हो सकता है?

स्पष्ट है, जेटली ने बगैर प्रभावित पक्षों की दलील सुने, जल्दबाज़ी में ऐसा फैसला कर लिया। और बहुत ही बुरे परिणाम सामने आए। 
ताज़ा मामला उत्तराखंड की खंडित राजनीति का है। 
रातोरात मोदी मंत्रिमंडल ने एक आपात बैठक बुलाकर वहां राष्ट्रपति शासन लागू किया था। कांग्रेस की हरीश रावत सरकार बगावत के बाद वहां अल्पमत में आ गई थी। नौ विधायकों को अयोग्य करार देने के बाद भारी नाटकीय स्थितियों में हर कदम जल्दबाज़ी भरा लिया गया। 

इसी कारण हाईकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन रद्द करते हुए भारी फटकार लगाई। 
किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी।

क्योंकि यहां कारण रावत की जल्दबाज़ी थी। हाईकोर्ट के जिस फैसले में रावत को पुन: मुख्यमंत्री बनाने की बात कही गई थी उसकी प्रति प्राप्त किए बग़ैर ही रावत ने मुख्यमंत्री पद का काम संभाल लिया। देर रात मंत्रिमंडल बैठक की। 

कई फैसले भी ले लिए। 
प्रश्न यह उठता है कि जो कुछ फैसले लिए गए, वे यदि उतने ही आवश्यक थे, तो उन्होंने मुख्यमंत्री रहते क्यों नहीं लिए? 

सरकार बचाने के लिए करोड़ों की खरीद करने के प्रयास के आरोप -कैमरे में दर्ज स्टिंग- के बाद रावत हाईकोर्ट से लौटें या कि सदन में बहुमत सिद्ध कर, उनकी विश्वसनीयता पर संदेह नहीं हटेगा। जैसे कि सुप्रीम कोर्ट से रोक मिल भी गई हो, मोदी सरकार क्यों धारा 356 में इंदिरा गांधी शैली में विरोधी सरकारें बर्खास्त करने पर लौट रही है, यह प्रश्न बना ही रहेगा। 

जल्दबाज़ी करने में जितना कम समय लगता है – उतना ही लम्बा समय जल्दबाज़ी के कारण पछतावे में लगाना पड़ता है। 
जहां हमें जल्दी करनी हो, वहां हम जल्दी करें – असंभव है। किन्तु करनी ही होगी। जल्दबाज़ी रोकना असंभव है। किन्तु रोकनी ही होगी। 

हम इन्सान हैं। 
जल्दबाज़ी का काम किसका है, यह अलग से लिखने की अावश्यकता नहीं है।

ये लेख कल्पेश याग्निक (दैनिक भास्कर) द्वारा लिखा गया है ।

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